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Uttarakhand: माता-पिता सावधान...मोबाइल में उलझे बच्चे उठा रहे खौफनाक कदम, सामने आया चौंकाने वाला आंकड़ा

Sat, 11 Jul 2026 11:33 AM IST
Heera कैलाश पाठक
कैलाश पाठक Published by: Heera Updated Sat, 11 Jul 2026 11:33 AM IST
सार

मोबाइल और सोशल मीडिया की लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है। अकेलापन, तनाव और भावनात्मक असंतुलन बढ़ रहा है, जिससे कई बच्चे आत्मघाती कदम उठाने तक पहुंच जाते हैं।

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Mobile addiction has ruined the mental balance of children
सांकेतिक तस्वीर।

विस्तार

 

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मोबाइल और सोशल मीडिया ने बच्चों की दुनिया तो बदल दी है लेकिन उनके रिश्ते, दिनचर्या और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाला है। घंटों स्क्रीन पर बिताने की आदत बच्चों को परिवार, दोस्तों और वास्तविक जीवन से दूर कर रही है। नतीजा यह है कि अकेलापन, तनाव और भावनात्मक असंतुलन बढ़ रहा है जो कई मामलों में आत्मघाती प्रयासों जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन रहा है।

सुशीला तिवारी अस्पताल (एसटीएच) के बाल रोग विभाग में हर महीने औसतन तीन से चार बच्चों को आत्मघाती कदम उठाने के बाद भर्ती किया जा रहा है। पिछले छह महीनों में ऐसे 15 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें अधिकतर बच्चों की उम्र 10 से 16 वर्ष है। बच्चों में दवा या जहर का ओवरडोज लेना, फांसी लगाने का प्रयास और खुद को नुकीली वस्तुओं से नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं सामने आई हैं।

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बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पूजा अग्रवाल कहती हैं कि कई बच्चे लंबे समय तक मोबाइल पर रील्स, गेम और सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं। इससे उनका सामाजिक जीवन सीमित हो रहा है और वे तनाव की ओर बढ़ रहे हैं। पढ़ाई का दबाव और परिवार के भीतर संवाद की कमी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रही है। 

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केस एक
11वीं में पढ़ने वाले एक छात्र को 8 से 10 घंटे मोबाइल देखने पर घर वालों ने डांट दिया। इससे परेशान होकर उसने घर छोड़ दिया। दो दिन बाद वह वापस लौटा जिसके बाद परिजन उसे जांच के लिए अस्पताल लेकर आए। परिजनों ने बताया कि बच्चा पढ़ाई छोड़कर लगातार मोबाइल पर चिपके रहता था। जब उसे डांटा तो वह नाराज होकर चला गया।

केस दो
13 वर्षीय किशोरी घंटों मोबाइल पर रील्स देखती थी। घर वालों के बार-बार मना करने के बावजूद वह नहीं मान रही थी। परेशान होकर परिजनों ने उसका मोबाइल ले लिया। मोबाइल छीने जाने से किशोरी गुस्से में आ गई और इसी बात से आहत होकर उसने जहर खा लिया। परिजनों ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाया जहां इलाज के बाद उसकी हालत अब स्थिर है।

केस तीन
चार महीने पहले जहर खाने के कारण दसवीं का छात्र अस्पताल में भर्ती हुआ। काउंसिलिंग के दौरान पता चला कि उसका एंड्रॉयड फोन पानी में गिरकर खराब हो गया और वह घर वालों से बार-बार उसे ठीक करने के लिए कह रहा था। उसकी मोबाइल चलाने की आदत से परेशान परिजनों ने फोन ठीक नहीं कराया तो उसने कीटनाशक गटक लिया।

बच्चे अकेलेपन, तुलना और असफलता के डर से मानसिक रूप से टूट रहे हैं। मोबाइल ने उनकी नींद, खेलकूद और परिवार के साथ संवाद को प्रभावित किया है। जब उन्हें अपनी बात सुनने वाला कोई नहीं मिलता तो वे गलत कदम उठाने तक पहुंच जाते हैं। - डॉ. युवराज पंत, मनोवैज्ञानिक

विशेषज्ञों की सलाह

  • रोजाना कम से कम एक घंटा बच्चों के साथ बिना मोबाइल के बिताएं
  • उनसे खुलकर बातचीत करें और उनकी छोटी-छोटी बातों को भी गंभीरता से सुनें।
  • मोबाइल में पैरेंटल कंट्रोल लगाएं और रात 9 बजे के बाद स्क्रीन टाइम बंद करें
  • बच्चों को आउटडोर खेल, रचनात्मक गतिविधियों और अन्य हॉबी से जोड़ें।
  • मोबाइल को न तो इनाम बनाया जाए और न ही सजा का माध्यम।
  • बच्चा चुप रहने लगे या खाना-पीना, सोना कम कर दे तो तुरंत मनोचिकित्सक से संपर्क करें
  • दिन में कम से कम एक बार, विशेषकर रात का भोजन सभी सदस्य साथ बैठकर करें।
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