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सुखवंत आत्महत्या प्रकरण : मरते मरते कई अनसुलझे सवाल छोड गया, कौन देगा इनका जवाब...?

चंद्रेश पांडे-राघवेंद्र शुक्ला Published by: गायत्री जोशी Updated Thu, 15 Jan 2026 10:42 AM IST
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सार

काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह मरने से ठीक चंद समय पहले आधी रात को एक ई-मेल किया। वह ई-मेल मुख्य सचिव, पुलिस महानिरीक्षक से लेकर हर उस बड़े व्यक्ति को भेजा जिससे उसे न्याय की उम्मीद थी। 

The Sukhwant suicide case has left behind many unanswered questions. Who will provide the answers
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 काशीपुर का किसान सुखवंत सिंह सिस्टम से हार गया। अब वह इस दुनिया में नहीं रहा लेकिन मरते-मरते वह कई अनसुलझे सवाल छोड़ गया जिसका जवाब सिस्टम के अफसरों से मिलना संभव नहीं है। इन सवालों का जवाब केवल सीबीआई ही सॉल्व कर सकती है।

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मरने से पहले सुखवंत ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर वीडियो अपलोड किया था। इसमें धोखाधड़ी करने वाले 26 लोगों के नाम का जिक्र किया गया था। इसके अलावा उसने बताया कि जिस पुलिस से उसे मदद मिलनी चाहिए थी उसने किस तरह से उसे प्रताड़ित किया। उसके साथ गाली-गलौच की।

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इस मामले में नया तथ्य यह सामने आया है कि मरने से ठीक चंद समय पहले आधी रात को सुखवंत ने एक ई-मेल किया। वह ई-मेल मुख्य सचिव, पुलिस महानिरीक्षक से लेकर हर उस बड़े व्यक्ति को भेजा जिससे उसे न्याय की उम्मीद थी। दिलचस्प यह है कि उसके मरने के बाद ई-मेल को लेकर पूरा सिस्टम खामोश है। क्योंकि अफसरों के स्तर पर शायद ही उस मेल की जांच संभव हो।

मेल में सुखवंत ने यह उल्लेख किया है कि जब वह थानेदार के पास पहुंचा तो वहां उसके और उसके भाई के साथ बहुत गाली गलौच की गई। मानसिक तौर पर घिनौनी प्रताड़ना दी गई। साथ ही उस दारोगा ने कहा कि तुम कहीं भी चले जाओ हमारा कोई कुछ बिगाड़ने वाला नहीं है। सुखवंत के इन तमाम सवालों का जवाब तब तक नहीं मिलेगा जब तक ऊधमसिंह नगर में जमीनों के काले कारोबार का धंधा यूं ही फलता फूलता रहेगा और पुलिस उसकी फसल को काटती रहेगी।

अफसर आएंगे जाएंगे, सामने आना चाहिए आत्महत्या का असली सच

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने मई 1996 में लोकसभा में कहा था कि सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए। इसी तरह कुमाऊं के जिलों में भी अफसर आएंगे-जाएंगे लेकिन ऊधमसिंह नगर के दिवंगत किसान सुखवंत सिंह की आत्महत्या का असली सच सामने आना चाहिए। जब तक सच सामने नहीं आएगा तब तक आगे भी इस तरह से मौत होती रहेंगी। मरने से पहले के सुखवंत के ऐसे अनसुलझे सवालों और पुलिस से आला अधिकारियों पर लगाए गए गंभीर आरोपों का जवाब केवल सीबीआई ही सामने ला सकती है। जब तक इस प्रकरण की सीबीआई जांच नहीं होती तब तक दोषी यूं ही बचते जाएंगे। सुखवंत की मौत से पहले भी ऐसे कई मामले हुए हैं जिनमें खानापूर्ति के नाम पर जांचें तो हुई लेकिन दोषी हमेशा ही बचते आए हैं।

दोषी पुलिस अफसरों के खिलाफ क्यों दर्ज नहीं हुई प्राथमिकी

दिवंगत सुखवंत ने मरने से पहले जो वीडियो जारी किया था उसमें मौत के लिए ऊधमसिंह नगर के एसएसपी से लेकर कई अधिकारियों व निजी लोगों को जिम्मेदार ठहराया था। पुलिस ने उन सभी लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली जिनके नाम वीडियो में थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि उसी वीडियो में जिस एसएसपी, थानेदार समेत पुलिस के अधिकारियों के नाम उजागर हुए थे उनके खिलाफ अभी तक प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं हुई है? सुखवंत यूं ही नहीं मरा। पुलिस से उसे न्याय नहीं मिला तो वह आत्महत्या के लिए मजबूर हो गया। तो क्या पुलिस के खिलाफ सुखवंत को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए?

 

...यह कैसी जांच

सुखवंत सिंह आत्महत्या मामले में मृतक की ओर से मरने से पहले जो वीडियो जारी किया गया उसमें आत्महत्या के लिए ऊधमसिंह नगर के एसएसपी को भी जिम्मेदार ठहराया गया है। अब जिस अधिकारी को मौत का जिम्मेदार ठहराया गया है वही इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या कोई आरोपी अधिकारी ऐसे गंभीर और संगीन मामले में जांच के आदेश दे सकता है?

वनभूलपुरा कांड:-

8 फरवरी 2024 को प्रशासन और नगर निगम की टीम पुलिस फोर्स के साथ हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में अतिक्रमण कर बनाए गए एक मदरसे को हटाने पहुंची थी। इस अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान उपद्रवियों ने पुलिस और अधिकारियों पर पथराव शुरू कर दिया। तब यहां जमकर आगजनी और हिंसा हुई थी जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी। बाद में सरकार को कानून व्यवस्था की स्थिति को काबू में करने के लिए हल्द्वानी में कर्फ्यू तक लगाना पड़ा था। सरकार ने कुमाऊं कमिश्नर को इस प्रकरण की जांच सौंपी थी लेकिन आज तक यह जांच न तो सार्वजनिक हुई और न ही हिंसा के दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हुई।

पेपर लीक कांड:-

पिछले वर्षों के दौरान राज्य में पटवारी भर्ती, उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग, स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा समेत कई परीक्षाओं के पेपर लीक हुए। इसे लेकर राज्य भर में युवाओं ने जबरदस्त आंदोलन भी किए। सरकार ने पुलिस से अलग अलग पेपर लीक मामलों की जांच कराई लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। बाद में सरकार को ही ऐसे मामलों की जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी थी।

 

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