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Nainital News: तो रामनगर में होगी तेंदुओं की नसबंदी
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Updated Thu, 25 Jun 2026 12:34 AM IST
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रामनगर। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) और उसके आसपास के वन प्रभागों में तेंदुओं की लगातार बढ़ती आबादी वन प्रबंधन के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरी है। जंगलों में तेंदुओं के बढ़ने से न केवल वन्यजीवों का आपसी संतुलन प्रभावित हो रहा है बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में भी चिंताजनक वृद्धि हुई है। वन विभाग अब तेंदुओं की आबादी को नियंत्रित करने के लिए नसबंदी की योजना पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
हाल ही में ढिकुली स्थित एक रिजॉर्ट में आयोजित अंतर-राज्यीय उच्च स्तरीय बैठक में विभिन्न राज्यों के वन्यजीव अधिकारियों ने बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष पर चिंता जताई थी। इस बैठक में महाराष्ट्र में तेंदुओं की नसबंदी को लेकर चल रहे पायलट प्रोजेक्ट पर चर्चा हुई थी। अब उत्तराखंड में भी इस दिशा में संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह योजना अभी अपने शुरुआती चरण में है, इसलिए इस पर कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले गहन वैज्ञानिक अध्ययन, वन्यजीव विशेषज्ञों की राय और इसके व्यावहारिक व पारिस्थितिक प्रभावों का कड़ा परीक्षण किया जा रहा है।
तेंदुए को जंगलों में छोड़ा गया कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे रामनगर और तराई पश्चिमी वन प्रभाग के रिहायशी इलाकों में तेंदुओं की आवाजाही लगातार बनी हुई है। जंगलों में टेरिटरी (क्षेत्र) की कमी और आपसी संघर्ष के कारण तेंदुए आबादी वाले क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं जिससे मवेशियों और पालतू जानवरों के शिकार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। हाल के दिनों में कई तेंदुओं को रिहायशी इलाकों से सुरक्षित रेस्क्यू कर वापस जंगलों में छोड़ा गया है।
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दो सालों में बाघ व तेंदुओं के हमले में 14 लोगों की मौत
जिले के अलग-अलग वन प्रभागों में बीते दो वर्षों में बाघ और तेंदुओं ने 14 लोगों को अपना शिकार बनाया है। इसमें वर्ष 2025 में धारी, भीमताल और रामनगर के आठ लोगों को जान गंवानी पड़ी है। वर्ष 2026 में अब तक ज्योली, सूर्या गांव, भद्यूनी और लालकुआं क्षेत्रों में छह लोग वन्यजीवों के हमले में अपनी जान गवां चुके हैं।
ऐसे किया जा रहा बधियाकरण का कार्य
बताया जाता है कि महाराष्ट्र के अलग-अलग वन प्रभाग में उन तेंदुओं को बधियाकरण के लिए चिह्नित किया जा रहा है जो बार-बार रिहाइशी इलाकों या गन्ने के खेतों में देखे जाते हैं और जिनसे संघर्ष का खतरा सबसे अधिक होता है। वन विभाग की ओर से तेंदुओं को पिंजरे लगाकर या ट्रैंक्यूलाइज कर पकड़ा जाता है। इसके बाद तेंदुए का स्वास्थ्य परीक्षण कर सर्जरी की जाती है।
तेंदुओं के हमले की घटनाएं बीते कुछ सालों में काफी बढ़ी हैं। अब तक प्रदेश में तेंदुओं की सटीक संख्या का कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है। बधियाकरण की योजना से पूर्व तेंदुओं की गणना और धारण क्षमता का मानक बनाना जरूरी है।
- एजी अंसारी, पूर्व सदस्य, टाइगर कंजरवेशन फाउंडेशन।
तेंदुओं की बढ़ती संख्या को संतुलित रखना जरूरी है लेकिन किसी भी कदम को उठाने से पहले वैज्ञानिक आधार पर पूरी समीक्षा की जाएगी। महाराष्ट्र में तेंदुओं की संख्या नियंत्रित करने को लेकर किए गए प्रयासों का अध्ययन किया जा रहा है। विशेषज्ञों की राय और परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो सीटीआर में भी नसबंदी के उपायों पर आगे बढ़ा जा सकता है।
-डॉ. साकेत बडोला, निदेशक, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व
हाल ही में ढिकुली स्थित एक रिजॉर्ट में आयोजित अंतर-राज्यीय उच्च स्तरीय बैठक में विभिन्न राज्यों के वन्यजीव अधिकारियों ने बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष पर चिंता जताई थी। इस बैठक में महाराष्ट्र में तेंदुओं की नसबंदी को लेकर चल रहे पायलट प्रोजेक्ट पर चर्चा हुई थी। अब उत्तराखंड में भी इस दिशा में संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह योजना अभी अपने शुरुआती चरण में है, इसलिए इस पर कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले गहन वैज्ञानिक अध्ययन, वन्यजीव विशेषज्ञों की राय और इसके व्यावहारिक व पारिस्थितिक प्रभावों का कड़ा परीक्षण किया जा रहा है।
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तेंदुए को जंगलों में छोड़ा गया कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे रामनगर और तराई पश्चिमी वन प्रभाग के रिहायशी इलाकों में तेंदुओं की आवाजाही लगातार बनी हुई है। जंगलों में टेरिटरी (क्षेत्र) की कमी और आपसी संघर्ष के कारण तेंदुए आबादी वाले क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं जिससे मवेशियों और पालतू जानवरों के शिकार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। हाल के दिनों में कई तेंदुओं को रिहायशी इलाकों से सुरक्षित रेस्क्यू कर वापस जंगलों में छोड़ा गया है।
दो सालों में बाघ व तेंदुओं के हमले में 14 लोगों की मौत
जिले के अलग-अलग वन प्रभागों में बीते दो वर्षों में बाघ और तेंदुओं ने 14 लोगों को अपना शिकार बनाया है। इसमें वर्ष 2025 में धारी, भीमताल और रामनगर के आठ लोगों को जान गंवानी पड़ी है। वर्ष 2026 में अब तक ज्योली, सूर्या गांव, भद्यूनी और लालकुआं क्षेत्रों में छह लोग वन्यजीवों के हमले में अपनी जान गवां चुके हैं।
ऐसे किया जा रहा बधियाकरण का कार्य
बताया जाता है कि महाराष्ट्र के अलग-अलग वन प्रभाग में उन तेंदुओं को बधियाकरण के लिए चिह्नित किया जा रहा है जो बार-बार रिहाइशी इलाकों या गन्ने के खेतों में देखे जाते हैं और जिनसे संघर्ष का खतरा सबसे अधिक होता है। वन विभाग की ओर से तेंदुओं को पिंजरे लगाकर या ट्रैंक्यूलाइज कर पकड़ा जाता है। इसके बाद तेंदुए का स्वास्थ्य परीक्षण कर सर्जरी की जाती है।
तेंदुओं के हमले की घटनाएं बीते कुछ सालों में काफी बढ़ी हैं। अब तक प्रदेश में तेंदुओं की सटीक संख्या का कोई भी आंकड़ा मौजूद नहीं है। बधियाकरण की योजना से पूर्व तेंदुओं की गणना और धारण क्षमता का मानक बनाना जरूरी है।
- एजी अंसारी, पूर्व सदस्य, टाइगर कंजरवेशन फाउंडेशन।
तेंदुओं की बढ़ती संख्या को संतुलित रखना जरूरी है लेकिन किसी भी कदम को उठाने से पहले वैज्ञानिक आधार पर पूरी समीक्षा की जाएगी। महाराष्ट्र में तेंदुओं की संख्या नियंत्रित करने को लेकर किए गए प्रयासों का अध्ययन किया जा रहा है। विशेषज्ञों की राय और परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो सीटीआर में भी नसबंदी के उपायों पर आगे बढ़ा जा सकता है।
-डॉ. साकेत बडोला, निदेशक, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व