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Pauri News: पहाड़ों में जैविक खेती बन रही नई उम्मीद, मिलेगा स्वरोजगार
संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी
Updated Thu, 21 May 2026 04:36 PM IST
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- वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विवि भरसार में आयोजित हुई कार्यशाला
थलीसैंण। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विवि भरसार में आयोजित प्रशिक्षण कार्यशाला में कृषि विशेषज्ञों ने काश्तकारों को जैविक व प्राकृतिक खेती के गुर सिखाए। कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता पलायन, खेती से घटती आय, जंगली जानवरों का खतरा और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच जैविक व प्राकृतिक खेती रोजगार की नई उम्मीद बनकर उभर रही है। कृषि - बागवानी कौशल विकास एवं उद्यमिता के माध्यम से ग्रामीण समृद्धि का सशक्तिकरण विषय पर आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि यदि पहाड़ों की पारंपरिक खेती को वैज्ञानिक तकनीकों और बेहतर बाजार व्यवस्था से जोड़ा जाए तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार हल्दी, अदरक, लहसुन, लेमनग्रास, तुलसी, एलोवेरा और अश्वगंधा जैसी औषधीय व सुगंधित फसलें पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बेहतर विकल्प बन सकती हैं। इसके अलावा मंडुवा, झंगोरा समेत मोटे अनाज की फसलें भी पहाड़ों के लिए उपयोगी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कृषि को लाभकारी बनाया जाए तो पर्वतीय क्षेत्रों से होने वाले पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है। जबकि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी जैविक व प्राकृतिक खेती को महत्वपूर्ण है। इस मौके पर फल विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. मंजू नेगी, उद्यान विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सविता, सहायक प्राध्यापक (सस्य विज्ञान) डॉ. गार्गी गोस्वामी, डॉ. केसी सिंह, डॉ. एससी पंत, डॉ. वैशाली आदि मौजूद रहे।
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थलीसैंण। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विवि भरसार में आयोजित प्रशिक्षण कार्यशाला में कृषि विशेषज्ञों ने काश्तकारों को जैविक व प्राकृतिक खेती के गुर सिखाए। कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता पलायन, खेती से घटती आय, जंगली जानवरों का खतरा और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच जैविक व प्राकृतिक खेती रोजगार की नई उम्मीद बनकर उभर रही है। कृषि - बागवानी कौशल विकास एवं उद्यमिता के माध्यम से ग्रामीण समृद्धि का सशक्तिकरण विषय पर आयोजित कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि यदि पहाड़ों की पारंपरिक खेती को वैज्ञानिक तकनीकों और बेहतर बाजार व्यवस्था से जोड़ा जाए तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार हल्दी, अदरक, लहसुन, लेमनग्रास, तुलसी, एलोवेरा और अश्वगंधा जैसी औषधीय व सुगंधित फसलें पर्वतीय क्षेत्रों के लिए बेहतर विकल्प बन सकती हैं। इसके अलावा मंडुवा, झंगोरा समेत मोटे अनाज की फसलें भी पहाड़ों के लिए उपयोगी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कृषि को लाभकारी बनाया जाए तो पर्वतीय क्षेत्रों से होने वाले पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता है। जबकि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी जैविक व प्राकृतिक खेती को महत्वपूर्ण है। इस मौके पर फल विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. मंजू नेगी, उद्यान विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. सविता, सहायक प्राध्यापक (सस्य विज्ञान) डॉ. गार्गी गोस्वामी, डॉ. केसी सिंह, डॉ. एससी पंत, डॉ. वैशाली आदि मौजूद रहे।