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Pithoragarh News: खरीदार घटे, व्यापारी नहीं लौटे... सिमटने लगा मशहूर बासुकीनाग मेला

संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़ Updated Sat, 28 Mar 2026 11:17 PM IST
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Buyers dwindled, traders didn't return... the famous Basukinag fair began to shrink.
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गणाई गंगोली (पिथौरागढ़)। सुविधाओं के अभाव में पहाड़ के गांवों से बढ़ते पलायन का असर अब धार्मिक परंपराओं और स्थानीय संस्कृति पर भी साफ दिखाई देने लगा है। गणाई गंगोली क्षेत्र के प्रसिद्ध बासुकीनाग मंदिर में लगने वाले मशहूर मेले की रौनक भी पलायन की भेंट चढ़ गई है। जहां कभी शिवरात्रि पर विशाल व्यापारिक मेला लगता था, वहां अब केवल महादेव की पूजा-अर्चना कर परंपरा निभाई जा रही है।
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सीमा चकलेटी, काकड़पानी, बाजड़ और ढलौनासेरा गांवों के बीच स्थित बासुकीनाग मंदिर में शिवरात्रि पर बड़ा मेला आयोजित होता था। जिला मुख्यालय के अलावा लोहाघाट, बागेश्वर और अल्मोड़ा से व्यापारी लोहे, तांबे के बर्तन, कपड़े और अन्य सामान लेकर पहुंचते थे। मेले में आसपास के गांवों के साथ दूरदराज के लोग भी खरीदारी के लिए उमड़ते थे जिससे क्षेत्र में खासा व्यापारिक माहौल रहता था।
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सड़क और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इन गांवों से दो दशक में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। सीमा चकलेटी से 57, काकड़पानी से 40, बाजड़ से 60 और ढलौनासेरा से 50 परिवार गांव छोड़कर शहरों की ओर चले गए। घरों में ताले लगने लगे तो मेले में खरीदारों की संख्या लगातार घटती गई। खरीदार कम हुए तो व्यापारियों ने भी आना बंद कर दिया। नतीजतन अब व्यापारिक मेला पूरी तरह बंद हो चुका है।
वर्तमान में सीमा चकलेटी में 40, काकड़पानी में 45, बाजड़ में 60 और ढलौनासेरा में 40 परिवार ही रह गए हैं। इनमें भी अधिकतर बुजुर्ग ही घरों के दरवाजे खोलते दिखाई देते हैं, जबकि कई बाखलियां वीरान पड़ी अपनों का इंतजार कर रही हैं। संवाद

जिस गांव के नाम से योजना, वहीं नहीं मिला पानी
क्षेत्र के अधिकांश गांव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। ग्रामीणों की प्यास बुझाने के लिए बासुकीनाग पंपिंग पेयजल योजना बनाई गई, लेकिन विडंबना यह है कि जिस सीमा चकलेटी गांव के नाम से योजना बनी, उसी गांव को इससे नहीं जोड़ा जा सका। गांव के अधिक ऊंचाई पर होने का हवाला देकर इसे योजना से बाहर रखा गया है।

सड़क के अभाव में डोली का सहारा
सीमा चकलेटी, काकड़पानी, बाजड़ और ढलौनासेरा गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित हैं। ग्रामीणों को बाजार तक पहुंचने के लिए तीन से चार किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। बीमारों और गर्भवतियों को अस्पताल पहुंचाने के लिए आज भी डोली का सहारा लेना पड़ता है। इन कठिन परिस्थितियों से परेशान होकर लोगों ने गांव छोड़ना ही बेहतर समझा।
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