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Rishikesh News: मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल से सामाजिक रूप से कट रहे युवा
संवाद न्यूज एजेंसी, ऋषिकेश
Updated Tue, 24 Mar 2026 02:39 AM IST
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मोबाइल फोन की लत ने युवाओं की सामाजिक दुनिया को गहराई से प्रभावित किया है। एम्स ऋषिकेश के सोशल आउटरीच सेल के एक शोध में स्पष्ट हुआ है कि युवाओं का एक बड़ा समूह ऐसा है जिसके पास कोई करीबी मित्र नहीं है। शोध में यह सामने आया कि युवा भावनात्मक, वित्तीय और डिजिटल तनावों के दबाव में जी रहा है।
एम्स ऋषिकेश के सोशल आउटरीच सेल ने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में 15 से 26 वर्ष आयु वर्ग के 418 युवाओं पर शोध किया गया, जिसमें स्पष्ट हुआ कि भावनात्मक, वित्तीय और डिजिटल तनावों से युवाओं पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। प्रमुख शोधकर्ता एम्स सोशल आउटरीच सेल डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि शोध में स्पष्ट हुआ कि 23.2 फीसदी युवाओं ने बार-बार चिंता या घबराहट, 10.8 फीसदी शैक्षणिक अपेक्षाओं का बोझ, 4.3 फीसदी ने आत्महत्या का प्रयास भी किया है।
इसके अलावा, 45.7 फीसदी युवाओं ने परिवार या करीबी लोगों के साथ बार-बार गलतफहमियों की बात कही, जो भावनात्मक संतुलन की कमी को दर्शाता है। वहीं शोध में स्पष्ट हुआ कि 47.8 फीसदी युवाओं को लगता है कि उनकी बातों और विचारों को महत्व नहीं दिया जाता।
32.5 फीसदी युवा सामाजिक समारोहों में असहज महसूस करते हैं। 12.2 युवाओं के पास कोई करीबी मित्र नहीं है, यह दर्शाता है कि सामाजिक उपस्थिति के बावजूद भावनात्मक समर्थन की कमी है। 51.9 युवाओं ने माना कि डिजिटल तकनीक उनकी दिनचर्या और पढ़ाई में बाधा डालती है। विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं की समस्याओं को अलग-अलग देखने की बजाए समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें शारीरिक गतिविधि, वित्तीय सशक्तीकरण और जिम्मेदार डिजिटल उपयोग शामिल हों।
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दीर्घकालिक रोगों के प्रबंधन में नर्सिंग की महत्वपूर्ण भूमिका
ऋषिकेश। एम्स कॉलेज ऑफ नर्सिंग की ओर से नर्सिंग परिप्रेक्ष्य में मधुमेह : शिक्षा, सशक्तीकरण एवं रोगी अधिकारिता विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। सोमवार को कॉलेज ऑफ नर्सिंग में आयोजित कार्यशाला में मुख्य अतिथि एम्स, ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने शिरकत की। विशिष्ट अतिथियों के तौर पर संकायाध्यक्ष (अकादमिक) प्रो. सौरभ वार्ष्णेय एवं चिकित्सा अधीक्षक प्रो. सत्य श्री बलिजा शामिल रहे। उन्होंने अपने संबोधन में दीर्घकालिक रोगों के प्रबंधन में नर्सिंग की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। कॉलेज ऑफ नर्सिंग की प्राचार्य डॉ. स्मृति अरोड़ा के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यशाला में आयोजन सचिव के तौर पर मनीष शर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संवाद
एम्स ऋषिकेश के सोशल आउटरीच सेल ने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में 15 से 26 वर्ष आयु वर्ग के 418 युवाओं पर शोध किया गया, जिसमें स्पष्ट हुआ कि भावनात्मक, वित्तीय और डिजिटल तनावों से युवाओं पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। प्रमुख शोधकर्ता एम्स सोशल आउटरीच सेल डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि शोध में स्पष्ट हुआ कि 23.2 फीसदी युवाओं ने बार-बार चिंता या घबराहट, 10.8 फीसदी शैक्षणिक अपेक्षाओं का बोझ, 4.3 फीसदी ने आत्महत्या का प्रयास भी किया है।
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इसके अलावा, 45.7 फीसदी युवाओं ने परिवार या करीबी लोगों के साथ बार-बार गलतफहमियों की बात कही, जो भावनात्मक संतुलन की कमी को दर्शाता है। वहीं शोध में स्पष्ट हुआ कि 47.8 फीसदी युवाओं को लगता है कि उनकी बातों और विचारों को महत्व नहीं दिया जाता।
32.5 फीसदी युवा सामाजिक समारोहों में असहज महसूस करते हैं। 12.2 युवाओं के पास कोई करीबी मित्र नहीं है, यह दर्शाता है कि सामाजिक उपस्थिति के बावजूद भावनात्मक समर्थन की कमी है। 51.9 युवाओं ने माना कि डिजिटल तकनीक उनकी दिनचर्या और पढ़ाई में बाधा डालती है। विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं की समस्याओं को अलग-अलग देखने की बजाए समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें शारीरिक गतिविधि, वित्तीय सशक्तीकरण और जिम्मेदार डिजिटल उपयोग शामिल हों।
दीर्घकालिक रोगों के प्रबंधन में नर्सिंग की महत्वपूर्ण भूमिका
ऋषिकेश। एम्स कॉलेज ऑफ नर्सिंग की ओर से नर्सिंग परिप्रेक्ष्य में मधुमेह : शिक्षा, सशक्तीकरण एवं रोगी अधिकारिता विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया। सोमवार को कॉलेज ऑफ नर्सिंग में आयोजित कार्यशाला में मुख्य अतिथि एम्स, ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने शिरकत की। विशिष्ट अतिथियों के तौर पर संकायाध्यक्ष (अकादमिक) प्रो. सौरभ वार्ष्णेय एवं चिकित्सा अधीक्षक प्रो. सत्य श्री बलिजा शामिल रहे। उन्होंने अपने संबोधन में दीर्घकालिक रोगों के प्रबंधन में नर्सिंग की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। कॉलेज ऑफ नर्सिंग की प्राचार्य डॉ. स्मृति अरोड़ा के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यशाला में आयोजन सचिव के तौर पर मनीष शर्मा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संवाद