राजस्थान में राज्य वृक्ष खेजड़ी को बचाने के लिए इन दिनों आंदोलन से लेकर जन-जागरूकता तक की आवाजें बुलंद हैं। बीकानेर से लेकर जैसलमेर और जालोर तक खेजड़ी संरक्षण को लेकर संत, किसान और पर्यावरण प्रेमी सड़कों पर उतर आए हैं। इसी बीच जालोर जिले के सायला उपखंड के हरमू गांव से एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जो खेजड़ी संरक्षण की जीवंत कहानी बन चुकी है।
खेजड़ी के लिए नहीं की खेती
हरमू गांव के एक किसान परिवार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी 140 बीघा उपजाऊ जमीन पर 17 वर्षों तक खेती नहीं की और वहां खेजड़ी का जंगल खड़ा कर दिया। आज इस जमीन पर करीब 3,500 से अधिक खेजड़ी और नीम के पेड़ लहलहा रहे हैं, जिनके बीच नीलगाय, हिरण और अन्य वन्य जीव खुलेआम विचरण करते नजर आते हैं।
'तुलसी को काटा नहीं जाता, पूजा जाता है'
हरमू गांव निवासी पाबूदान इस प्रेरक पहल के सूत्रधार थे। वर्ष 1998 में उन्होंने खेजड़ी संरक्षण का बीड़ा उठाया। हालांकि आज वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच और विचार उनके बेटे मुराददान और पोते चदनादान आगे बढ़ा रहे हैं। चदनादान बताते हैं, 'मेरे दादा कहा करते थे कि खेजड़ी मारवाड़ की तुलसी है। तुलसी को काटा नहीं जाता, पूजा जाता है। उसी विचार के साथ उन्होंने खेती छोड़कर खेजड़ी का जंगल बसाया। आज हम उसी परंपरा को निभा रहे हैं।' मुराददान बताते हैं कि उनकी जमीन अनार, सरसों और अरंडी जैसी नकदी फसलों के लिए बेहद उपजाऊ है। इसके बावजूद पिछले 17 वर्षों से इस भूमि पर एक भी फसल नहीं उगाई गई। 'अगर हमने खेती की होती, तो खेजड़ी कभी इतनी संख्या में नहीं पनप पाती। हमने आर्थिक नुकसान सहा, लेकिन पर्यावरण को प्राथमिकता दी।'
'पेड़ों की परवरिश बच्चे की तरह की'
वहीं, मुराददान मीडिया से बात करते हुए कहते हैं कि इस जमीन पर आज 3,500 से अधिक पेड़ खड़े हैं, जिनमें अधिकांश खेजड़ी के हैं, जिन्हें संस्कृत में 'समी' कहा जाता है। खेजड़ी केवल धार्मिक या पर्यावरणीय महत्व ही नहीं रखती, बल्कि खेती के लिए भी बेहद लाभकारी है। खेजड़ी की गहरी जड़ें मिट्टी में नमी बनाए रखती हैं, जिससे आसपास की फसलों की पैदावार बढ़ती है। इसके पत्तों से जैविक खाद तैयार होती है। एक खेजड़ी के पेड़ से सालाना एक ट्रॉली तक पत्तियां मिल जाती हैं। यह सस्टेनेबल फार्मिंग का बेहतरीन मॉडल है, जिसे किसानों को अपनाना चाहिए। खेजड़ी के इस जंगल में शिकार पूरी तरह प्रतिबंधित है। नीलगाय, हिरण, पक्षी और अन्य जीव यहां सुरक्षित हैं। मुराददान बताते हैं कि इन पेड़ों की छांव वन्य जीवों के लिए प्राकृतिक आश्रय बन चुकी है। 'हमने इन पेड़ों की परवरिश बच्चे की तरह की है। हमारा उद्देश्य सिर्फ पेड़ लगाना नहीं, बल्कि पूरे इकोसिस्टम को बचाना है।
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राज्य और समाज ने सराहा पहल
खेजड़ी संरक्षण के लिए किए गए इस असाधारण कार्य को सरकार और समाज ने भी सराहा है। 27 जुलाई 2025 को जयपुर में आयोजित 76वें राज्य स्तरीय वन महोत्सव में मुराददान को अमृता देवी विश्नोई स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें ग्रीन आइकन अवॉर्ड, पर्यावरण मित्र सम्मान सहित जिला स्तर पर 15 से अधिक सम्मान मिल चुके हैं। मुराददान बताते हैं कि वे केवल अपने खेत तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने हरमू गांव और आसपास के क्षेत्रों में किसानों को खेजड़ी के महत्व के प्रति जागरूक किया। 'सोलर प्लांट्स और शहरीकरण के कारण खेजड़ी तेजी से खत्म हो रही है। अगर अभी नहीं चेते, तो मरुस्थल से हरियाली हमेशा के लिए गायब हो जाएगी।'