कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीक और मशीनों के बढ़ते उपयोग के बावजूद झालावाड़ जिले के डग और अकलेरा क्षेत्र में आज भी पारंपरिक तरीके से दरांतियां बनाने की परंपरा जीवित है। सोयाबीन समेत अन्य खरीफ फसलों की कटाई का मौसम नजदीक आते ही यहां के लोहार परिवार दिन-रात मेहनत कर हस्तनिर्मित दरांतियां तैयार करने में जुट गए हैं।
कभी ताले, सरौते और अन्य लोहे के पारंपरिक औजार बनाने के लिए प्रसिद्ध रहे डग के लोहार अब बदलते समय में मुख्य रूप से दरांती निर्माण के सहारे अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। स्थानीय लोहार मन्नालाल और दिनेश कुमार बताते हैं कि क्षेत्र में करीब 100 लोहार परिवार सोयाबीन की कटाई शुरू होने से पहले कई दिनों तक लगातार दरांतियां बनाने का काम करते हैं।
उन्होंने बताया कि यह पूरी तरह हस्तनिर्मित प्रक्रिया है, जिसमें किसी मशीन का उपयोग नहीं होता। एक-एक दरांती तैयार करने में मेहनत, समय और वर्षों का अनुभव लगता है। यही कारण है कि आज भी किसानों के बीच इनकी गुणवत्ता पर पूरा भरोसा है।
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लोहार उमराव के अनुसार दरांती बनाने का काम कई चरणों में पूरा होता है। सबसे पहले कबाड़ के लोहे की पत्तियों को काटकर आवश्यक आकार दिया जाता है। इसके बाद उन्हें भट्टी में तेज तापमान पर गर्म किया जाता है और हथौड़े से पीट-पीटकर दरांती का आकार तैयार किया जाता है। अंत में उसमें धार लगाकर मजबूत लकड़ी का हत्था फिट किया जाता है, जिससे किसान आसानी से फसल की कटाई कर सकें। एक दरांती तैयार करने में लगभग 50 से 60 रुपये तक की लागत आती है।
कई राज्यों में होती है सप्लाई
डग में तैयार होने वाली दरांतियां केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं। यहां के व्यापारी इन्हें गुजरात, मध्य प्रदेश (भोपाल और ग्वालियर) तथा राजस्थान के कोटा, जोधपुर और अलवर सहित कई शहरों में भेजते हैं, जहां सोयाबीन, गेहूं और अन्य फसलों की कटाई के दौरान इनकी अच्छी मांग रहती है।
सरकारी मदद की उम्मीद
लोहार परिवारों का कहना है कि यदि सरकार आर्थिक सहायता, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण उपलब्ध कराए तो वे उत्पादन बढ़ाने के साथ अपनी वर्षों पुरानी पारंपरिक कला को नई पहचान दे सकते हैं। उनका कहना है कि अब तक उन्हें इस कार्य के लिए किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिली है। उचित सहयोग मिलने पर यह परंपरागत उद्योग ग्रामीण रोजगार का मजबूत माध्यम बन सकता है और नई पीढ़ी भी इस पुश्तैनी हुनर से जुड़ी रह सकती है।
दरांती निर्माण से जुड़े दिनेश कुमार बताते हैं कि लगातार बढ़ती महंगाई और लोहे के दाम बढ़ने से लागत काफी बढ़ गई है, जबकि कमाई अपेक्षाकृत कम होती है। इसके बावजूद वे अपने पुश्तैनी व्यवसाय को छोड़ना नहीं चाहते और इसी से परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। किसान जयेंद्र सिंह का कहना है कि आधुनिक कृषि यंत्रों के दौर में भी ग्रामीण इलाकों में लगभग हर किसान के घर में दरांती मौजूद रहती है। इसका उपयोग केवल फसल कटाई ही नहीं, बल्कि चारा और अन्य कृषि कार्यों में भी किया जाता है। सस्ती, टिकाऊ और उपयोग में आसान होने के कारण इसकी मांग आज भी बनी हुई है।