सिरोही जिले में आबूरोड शहर के तलेटी क्षेत्र में पहाड़ी पर स्थित एक अनोखे मंदिर के बारे में बता रहे हैं। जहां पर चामुंडा माता विराजमान हैं। इन्हें मुखरी माता के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां वह गुफा है, जो पूर्व में माउंट आबू तक जाती थी। यह मंदिर माउंट आबू का प्रवेश द्वार हुआ करता था।
माता के माउंट आबू के प्रवेश द्वार पर विराजमान होने से इन्हें मुखरी माता के नाम से भी जाना एवं पहचाना जाता है। इस मंदिर के नाम के साथ मोर-मोरनी की तपस्या को लेकर भी इतिहास है। इस मंदिर में वैसे तो साल भर श्रद्धालुओं की आवजाही लगी रहती है। लेकिन जब बात नवरात्रि की हो तो भीड़भाड़ और बढ़ जाती है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने तथा धार्मिक एवं सामाजिक आयोजन करने की भी सुविधा उपलब्ध है।
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गौरतलब है कि सिरोही जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर आबूरोड के तलेटी में पहाड़ी के ऊपर गुफा में चामुंडा माता (मुखरी माता) विराजमान हैं। आबूरोड रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से पांच किलोमीटर सड़क मार्ग का सफर तय कर यहां पहुंचा जा सकता है। अगर आप माउंट आबू जा रहे हैं तो तलेटी तिराहा से महज 500 मीटर के बाद मुख्य रोड के समीप ही मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार नजर आ जाएगा। यहां से अंदर की ओर जाने के बाद संपर्क सड़क मंदिर तक ले जाएगी। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। इसके लिए पहाड़ी पर सीढ़ियों तक सड़क बनी है, जहां तक वाहन जाते हैं। ऐसे में हर उम्र के श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के यहां तक पहुंच सकते हैं। मंदिर के पास ही श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए करीब एक दर्जन कमरे और बरामदा भी बना है। जहां पर श्रद्धालु अपने धार्मिक, पारिवारिक और सामाजिक आयोजन करते हैं।
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चामुंडा माता का इसलिए नाम पड़ा मुखरी माता
आबूरोड के तलेटी से माउंट आबू की चढ़ाई शुरू होती है। इसलिए इसे माउंट आबू का मुख या प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। चामुंडा माता के विराजमान स्थल के पास ही गुफा है, जो माउंट आबू तक जाती है। मंदिर पुजारी के अनुसार, पहाड़ी की एक शिला के नीचे चामुंडा माता के विराजमान स्थल के पास ही एक गुफा भी है, जो माउंट आबू में अधरदेवी (अर्बुदा देवी) मंदिर के समीप तक जाती है। यह करीब 22 किलोमीटर लंबी गुफा है। हालांकि, बीते लंबे समय से यह गुफा बंद है। यहां बकायदा लोहे का भी गेट है। सवेरे शाम दोनों समय इसकी भी पूजा अर्चना की जाती है। चामुंडा माता के यहां विराजमान होने से इस मंदिर का नाम मुखरी माता हो गया।
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मोर-मोरनी की तपस्या को लेकर प्रचलित है कहानी
मंदिर की दूसरी खासियत यह है कि यहां मोर-मोरनी की तपस्या की भी कहानी है। मंदिर पुजारी सीताराम का कहना है कि सालों पहले शाम होते ही एक मोर-मोरनी का जोड़ा मंदिर में रात्रि विश्राम करने आता था। ये मोर-मोरनी बड़े तपस्वी थे। उनकी इच्छा थी अंतिम समय इसी मंदिर में व्यतीत हो सके। एक दिन सवेरे दोनों मोर मोरनी मृत अवस्था में मिले। तत्कालीन पुजारी द्वारा मोर-मोरनी की इच्छानुसार जहां उनकी मौत हुई थी, वहीं पर उनकी समाधि बना दी गई।