राजस्थान के राज्य पक्षी और दुनिया के सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के संरक्षण अभियान में एक और बड़ी सफलता मिली है। जैसलमेर स्थित ब्रीडिंग सेंटरों में दो नए गोडावण चूजों के जन्म ने वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षण टीमों का उत्साह बढ़ा दिया है। इन नवजात चूजों के साथ अब कृत्रिम प्रजनन केंद्रों में पल रहे गोडावणों की कुल संख्या बढ़कर 86 हो गई है।
रेगिस्तान की पहचान माने जाने वाले इस दुर्लभ पक्षी का अस्तित्व पिछले कुछ वर्षों से गंभीर संकट में है। प्राकृतिक आवास में लगातार घटती संख्या ने वन विभाग, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संस्थाओं की चिंता बढ़ा दी थी। ऐसे में जैसलमेर के रामदेवरा और सम स्थित ब्रीडिंग सेंटर अब गोडावण संरक्षण की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इस बार जन्मे दोनों चूजों को आर्टिफिशियल इंसेमिनेशन (AI) तकनीक के जरिए तैयार किया गया है। रामदेवरा ब्रीडिंग सेंटर में एक और सम केंद्र में एक गोडावण चूजे का जन्म हुआ। अब तक कुल 26 गोडावण चूजों का जन्म AI तकनीक से कराया जा चुका है। वन्यजीव वैज्ञानिकों का कहना है कि प्राकृतिक परिस्थितियों में गोडावणों का प्रजनन बेहद धीमा और चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में कृत्रिम प्रजनन तकनीक इस प्रजाति को बचाने का प्रभावी माध्यम बनती जा रही है।
जैसलमेर के रामदेवरा ब्रीडिंग सेंटर में फिलहाल 61 गोडावण मौजूद हैं, जबकि सम केंद्र में इनकी संख्या 25 तक पहुंच चुकी है। दोनों केंद्रों में विशेषज्ञों की निगरानी में इन पक्षियों की देखभाल की जा रही है। इन सेंटरों का उद्देश्य केवल चूजों को जन्म देना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित तरीके से बड़ा कर भविष्य में खुले प्राकृतिक वातावरण में छोड़ने के लिए तैयार करना भी है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। रामदेवरा सेंटर में एक विशाल संरक्षित टनल तैयार की गई है, जहां नन्हें गोंडावणों को शुरुआती अवस्था से रखा जाता है। यहां उन्हें प्राकृतिक वातावरण जैसा माहौल दिया जाता है, ताकि भविष्य में जंगल में छोड़े जाने के बाद वे आसानी से खुद को अनुकूल बना सकें।
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संरक्षण परियोजना से जुड़े अधिकारियों के अनुसार ब्रीडिंग सेंटर में पले गोडावणों को सीधे जंगल में नहीं छोड़ा जाएगा। पहले उन्हें विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी। इस दौरान उन्हें प्राकृतिक परिस्थितियों में भोजन खोजने, शिकारियों से बचने और समूह में रहने जैसी गतिविधियों का अभ्यास कराया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया सफल रही, तो आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में गोडावण फिर से रेगिस्तान के खुले आसमान में उड़ते नजर आ सकते हैं।
हालांकि ब्रीडिंग सेंटरों में मिल रही सफलता राहत देने वाली है लेकिन प्राकृतिक आवास में गोडावणों की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की हालिया गणना के अनुसार खुले प्राकृतिक क्षेत्र में गोडावणों की संख्या करीब 128 रह गई है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्राकृतिक वातावरण में इनकी संख्या अपेक्षित गति से नहीं बढ़ रही। पूरे वर्ष में फील्ड में केवल दो नए चूजे ही दिखाई दिए हैं, जो प्राकृतिक प्रजनन की कमजोर स्थिति को दर्शाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाईटेंशन बिजली लाइनें, बदलता पर्यावरण, अवैध शिकार, मानवीय दखल और सिकुड़ते आवास क्षेत्र गोडावणों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं।
इस साल 18 चूजों का जन्म
ब्रीडिंग सेंटरों में इस वर्ष अब तक कुल 18 गोडावण चूजों का जन्म हो चुका है। इनमें से 13 चूजे AI तकनीक से पैदा हुए हैं, जबकि 4 चूजे प्राकृतिक ब्रीडिंग प्रक्रिया से जन्मे। इसके अलावा एक चूजा फील्ड से सुरक्षित लाए गए अंडे से तैयार किया गया।
यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि वैज्ञानिक प्रयास अब सकारात्मक परिणाम देने लगे हैं। संरक्षण टीमों का मानना है कि यदि आने वाले वर्षों में यही गति बनी रही, तो गोडावणों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि संभव हो सकती है।
रेगिस्तान की पहचान बचाने की जंग
गोडावण केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि राजस्थान की प्राकृतिक विरासत और मरुस्थलीय जैव विविधता का प्रतीक है। कभी पश्चिमी राजस्थान के विशाल रेगिस्तानी इलाकों में बड़ी संख्या में दिखाई देने वाला यह पक्षी आज विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुका है।
ऐसे में जैसलमेर के ब्रीडिंग सेंटरों से आ रही हर नई खुशखबरी संरक्षण अभियान के लिए नई उम्मीद लेकर आ रही है। विशेषज्ञों को भरोसा है कि यदि वैज्ञानिक तकनीकों, सुरक्षित आवास और सतत संरक्षण प्रयासों को इसी तरह जारी रखा गया, तो आने वाले समय में गोडावण फिर से राजस्थान के आसमान में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराएगा।