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Balen Shah Takes Major Action Against China; Xi Jinping Stunned!
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बालेन शाह ने चीन पर लिया बड़ा एक्शन, शी जिनपिंग को लगा झटका!
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: Adarsh Jha Updated Sun, 26 Apr 2026 09:10 PM IST
नेपाल की सत्ता बदली और इसके बदलने के साथ ही अब खुलने लगे हैं पुराने समझौतों के राज! क्या चीन के साथ हुए बड़े-बड़े डील्स सिर्फ विकास के नाम पर थे, या इसके पीछे कोई बड़ा रणनीतिक खेल चल रहा था? क्यों अब नई सरकार इन परियोजनाओं की एक-एक फाइल खंगाल रही है? और क्या नेपाल-चीन रिश्तों में आने वाला है बड़ा मोड़?
हिमालयी देश नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद अब चीन के साथ हुए पुराने समझौतों की परतें खुलनी शुरू हो गई हैं। नई सरकार ने साफ संकेत दिए हैं कि चीन के साथ हुए कई अहम प्रोजेक्ट्स और डील्स की गहन जांच की जाएगी।
दिल्ली स्थित थिंक टैंक Institute for Conflict Research and Resolution की एक रिपोर्ट ने इस पूरे मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में चीन की भूमिका सिर्फ आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह धीरे-धीरे रणनीतिक और राजनीतिक प्रभाव तक पहुंच गई।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तिब्बत और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चीन ने नेपाल पर राजनयिक दबाव बनाया, वहीं देश के आंतरिक फैसलों को प्रभावित करने की भी कोशिश की गई।
दरअसल, के.पी. शर्मा ओली के कार्यकाल में नेपाल और चीन के बीच कई बड़े समझौते हुए थे। उस वक्त इन्हें नेपाल की आर्थिक स्वतंत्रता और विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया था। लेकिन अब वही समझौते सवालों के घेरे में हैं।
नई सरकार यह जानना चाहती है कि आखिर क्यों इन परियोजनाओं में देरी हुई, कई प्रोजेक्ट्स अधर में लटक गए या फिर बिना किसी स्पष्ट कारण के रुक गए। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि जब तक इन सभी परियोजनाओं की पूरी समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक चीन के साथ कोई नया समझौता नहीं किया जाएगा।
नेपाल-चीन रिश्तों में असली बदलाव 2016 से 2018 के बीच देखने को मिला, जब Belt and Road Initiative के तहत नेपाल ने बीजिंग के साथ अपने संबंध और मजबूत किए। उस समय इसे नेपाल को क्षेत्रीय कनेक्टिविटी हब बनाने का बड़ा अवसर बताया गया था।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही निकली। कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स आज भी अधूरे हैं। उदाहरण के तौर पर बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना जिसका ठेका 2017 में चीन की कंपनी को दिया गया, फिर रद्द किया गया, दोबारा बहाल हुआ और अब 2022 से लगभग ठप पड़ा है।
इसी तरह केरंग-काठमांडू रेलवे परियोजना, जिसे नेपाल के लिए गेमचेंजर माना जा रहा था, तकनीकी चुनौतियों और वित्तीय अस्पष्टता के कारण 2026 तक भी आगे नहीं बढ़ पाई है।
ट्रांस-हिमालयी कनेक्टिविटी नेटवर्क, सीमा पार ट्रांसमिशन लाइनें और रसुवागढ़ी-केरंग सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास ये सभी प्रोजेक्ट्स कागजों और शुरुआती चर्चाओं से आगे नहीं बढ़ सके हैं।
इसके अलावा, डिजिटल विस्तार के नाम पर Huawei और ZTE जैसी कंपनियों की भागीदारी भी जांच के दायरे में है। इन परियोजनाओं के असमान कार्यान्वयन ने सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं को जन्म दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल अब एक संतुलित विदेश नीति की ओर बढ़ना चाहता है, जहां वह किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बच सके।
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है। अगर नेपाल चीन के साथ अपने समझौतों की समीक्षा करता है, तो यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल, जांच जारी है लेकिन इतना तय है कि आने वाले दिनों में नेपाल-चीन रिश्तों की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं।
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