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E-Buses: सिर्फ बसें बदलना पर्याप्त नहीं, बढ़ती दुर्घटनाओं के बीच ड्राइवरों की अधूरी ट्रेनिंग को लेकर बड़े सवाल

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुयश पांडेय Updated Mon, 09 Feb 2026 04:34 PM IST
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सार

Electric Bus Accidents: भारत में प्रदूषण कम करने के लिए इलेक्ट्रिक बसों को तेजी से अपनाया जा रहा है, लेकिन हाल के महीनों में सामने आए हादसों ने इस 'ग्रीन ट्रांसपोर्ट' मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बंगलूरू, मुंबई, गुजरात और ओडिशा जैसे राज्यों में हुए जानलेवा एक्सीडेंट यह दिखाते हैं कि समस्या किसी एक शहर तक सीमित नहीं है।

Rising Electric Bus Accidents Raise Safety Concerns in India’s Green Transport Push
इलेक्ट्रिक बस (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एक्स
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विस्तार

भारत के महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई और बंगलूरू में प्रदूषण कम करने के लिए इलेक्ट्रिक बसों (ई-बसों) को तेजी से अपनाया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह 'ग्रीन' बनाया जाए। लेकिन इन बसों के साथ एक बड़ी चुनौती भी है, इन्हें चलाने का तरीका आम बसों से बिल्कुल अलग है।

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बढ़ते हादसे और चौंकाने वाले आंकड़े

इलेक्ट्रिक बसों का सफर जितना आरामदायक दिखता है, हाल के आंकड़ों ने उतनी ही चिंता बढ़ा दी है। अगर हम पिछले कुछ महीनों के हादसों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी गंभीर है।

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बंगलूरू: यहां अगस्त 2025 तक के पिछले 15 महीनों में इलेक्ट्रिक बसों से 18 एक्सीडेंट हुए। सबसे दुखद बात यह है कि इनमें से 6 हादसों में लोगों की मौत हो गई।
मुंबई: यहां तो स्थिति और भी भयानक रही। दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच (सिर्फ दो महीनों में) महज दो हादसों में ही 12 लोगों की जान चली गई।
गुजरात: अप्रैल 2025 में एक तेज रफ्तार ई-बस ने कहर बरपाया, जिसमें 4 लोगों की मौत हो गई।
ओडिशा: जनवरी 2025 में एक खड़ी ऑटो को ई-बस ने इतनी जोर से टक्कर मारी कि 2 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।
ये आंकड़े बताते हैं कि ये हादसे अब किसी एक शहर की बात नहीं रह गए हैं। चाहे बड़ा महानगर हो या छोटा राज्य, हर जगह ये बसें लोगों की जान के लिए खतरा बनती दिख रही हैं। इससे यह साफ हो जाता है कि बसों की नई तकनीक के साथ-साथ उन्हें चलाने वालों की लापरवाही या ट्रेनिंग की कमी एक बहुत बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

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क्या बसें खराब हैं या चलाने वाले?

अक्सर जब भी सड़क पर कोई दुर्घटना होती है तो हमारा ध्यान सबसे पहले बस की खराबी या तकनीक की ओर जाता है। लेकिन एक्सपर्ट्स और अधिकारियों का मानना है कि इन हादसों का असली विलेन मशीनी खराबी नहीं, बल्कि ड्राइवरों को मिलने वाली अधूरी ट्रेनिंग है। 'वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट' के एक्सपर्ट पवन मुकुलुटला के मुताबिक, चाहे पुरानी बस हो या नई इलेक्ट्रिक बस, 10 में से 6 हादसे सिर्फ ड्राइवर की किसी न किसी चूक की वजह से होते हैं। इस मामले में तकनीक को दोष देना इसलिए भी गलत है क्योंकि ओलेक्ट्रा और PMI जैसी भारतीय कंपनियां अपनी बसें चीन और पोलैंड जैसे देशों में भी सफलतापूर्वक चला रही हैं, जहां इस तरह के हादसे नहीं हो रहे। इससे यह साफ हो जाता है कि बसों का डिजाइन और तकनीक तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की है लेकिन कमी हमारे ड्राइवरों को इस आधुनिक तकनीक के हिसाब से तैयार करने में रह गई है।

ई-बस की स्टीयरिंग थामना आसान नहीं 

जानकारों का मानना है कि पुरानी डीजल या सीएनजी बस को छोड़ नई इलेक्ट्रिक बस की स्टीयरिंग थामना उतना आसान नहीं है जितना कि हमें लगता है। दरअसल, इन दोनों को चलाने के अनुभव में जमीन-आसमान का फर्क होता है। इस बदलाव को और इसमें आने वाली चुनौतियों को गहराई से समझने के लिए हमें इन चार मुख्य बातों पर गौर करना होगा, जो ई-बस ड्राइविंग को पूरी तरह अलग बना देती हैं।

1. पिक-अप और रफ्तार का अंतर

डीजल या सीएनजी बसें धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ती हैं, लेकिन इलेक्ट्रिक बसें 'इंस्टेंट टॉर्क' पर काम करती हैं। इसका मतलब है कि जैसे ही ड्राइवर एक्सीलरेटर दबाता है, बस बहुत तेज झटके के साथ आगे बढ़ती है। अगर ड्राइवर को इसका अभ्यास न हो तो भीड़भाड़ वाले रास्तों पर दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है।

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2. स्मार्ट ब्रेकिंग सिस्टम

इलेक्ट्रिक बसों में 'रीजेनरेटिव ब्रेकिंग' होती है। इसमें जैसे ही ड्राइवर पैर हटाता है, बस अपने आप धीमी होने लगती है ताकि बिजली पैदा हो सके। पुराने ड्राइवरों को इस सिस्टम की आदत नहीं होती, जिससे कभी बस अचानक रुक जाती है तो कभी समय पर ब्रेक नहीं लग पाता।

3. ट्रेनिंग की भारी कमी

आजकल ज्यादातर शहरों में इलेक्ट्रिक बसों को चलाने की जिम्मेदारी निजी ऑपरेटरों के पास है। समस्या यह है कि ये कंपनियां अक्सर ड्राइवरों को सिर्फ एक-दो दिन की मामूली जानकारी देकर बसें सड़कों पर उतार देती हैं, जबकि एक ई-बस ड्राइवर के लिए इस नई तकनीक को गहराई से समझना बेहद जरूरी है। उसे न केवल बैटरी की बारीकियों और उसकी स्थिति का अंदाजा होना चाहिए, बल्कि किसी भी आपातकालीन स्थिति में इलेक्ट्रिक सिस्टम को तुरंत बंद (कट-ऑफ) करने का हुनर भी आना चाहिए। साथ ही भीड़भाड़ वाले रास्तों पर बस को झटकों से बचाकर 'स्मूथ' तरीके से चलाने का प्रशिक्षण भी अनिवार्य है ताकि सफर सुरक्षित बना रहे।

4. मानसिक और शारीरिक दबाव

अक्सर देखा गया है कि ड्राइवरों पर ज्यादा से ज्यादा चक्कर (ट्रिप्स) लगाने का दबाव होता है। ई-बसों का शांत वातावरण और लंबी ड्यूटी की वजह से ड्राइवरों में 'थकान' और 'एकाग्रता की कमी' जैसे मुद्दे भी सामने आ रहे हैं, जो हादसों का एक बड़ा कारण बनते हैं।

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आर्थिक दबाव और श्रम संकट

इलेक्ट्रिक बस चलाने वाले ड्राइवरों की चुनौती सिर्फ नई तकनीक सीखने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे कम वेतन और काम के भारी बोझ से भी जूझ रहे हैं। जहां सरकारी बसों के ड्राइवर हर महीने करीब ₹30,000 कमा लेते हैं, वहीं निजी कंपनियों के ड्राइवरों को नई और महंगी बसें चलाने के बावजूद सिर्फ ₹22,000 के आसपास ही वेतन मिलता है। इस कम कमाई के साथ-साथ ड्यूटी के लंबे घंटे उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से थका देते हैं। थकान और तनाव की वजह से अब पुराने और अनुभवी ड्राइवर अब इस काम से किनारा कर रहे हैं और बेहतर विकल्प के तौर पर उबर या ओला जैसी कंपनियों में गाड़ी चलाना पसंद कर रहे हैं। अनुभवी ड्राइवरों के इस पलायन की वजह से उनकी जगह नए और कम अनुभवी लोगों को भर्ती किया जा रहा है, जिससे सड़कों पर हादसों का खतरा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। साफ है कि जब तक ड्राइवरों को सही वेतन और काम के तय घंटे नहीं मिलेंगे तब तक सड़कों पर सुरक्षा का दावा करना मुश्किल होगा।

ई-बस ड्राइवर्स के लिए 'रिफ्रेशर कोर्स' अनिवार्य किया गया

हादसों की गंभीर स्थिति के बीच राहत की बात यह है कि जानकार इसे केवल एक बदलाव का दौर मान रहे हैं और हालात सुधारने की कोशिशें भी शुरू हो चुकी हैं। जैसे-जैसे नई तकनीक की समझ बढ़ेगी, यह संकट कम होने की उम्मीद है, जिसके लिए सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाए हैं। इसी दिशा में जनवरी 2025 में सड़क परिवहन मंत्रालय ने ई-बस ड्राइवरों के लिए कड़े नियम लागू किए हैं ताकि बिना पूरी तैयारी और सख्त ट्रेनिंग के कोई भी ड्राइवर बस लेकर सड़क पर न उतरे। साथ ही, मुंबई और बंगलूरू जैसे शहरों की सरकारों ने अब ड्राइवरों के लाइसेंस की दोबारा गहन जांच करने का फैसला किया है। अब चाहे ड्राइवर सरकारी विभाग का हो या किसी निजी कंपनी का, उसके लिए समय-समय पर 'रिफ्रेशर कोर्स' यानी दोबारा ट्रेनिंग लेना अनिवार्य कर दिया गया है ताकि नई तकनीक और सुरक्षित ड्राइविंग के नियम उन्हें हमेशा याद रहें।

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सार्वजनिक परिवहन सिर्फ व्यापार नहीं, जिम्मेदारी भी

जानकारों का तर्क है कि अब हमें इलेक्ट्रिक बसों को देखने का अपना नजरिया बदलने की सख्त जरूरत है। सरकारी और निजी कंपनियों को यह समझना होगा कि बसें चलाना सिर्फ मुनाफा कमाने का एक व्यापार नहीं, बल्कि जनता को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाने की एक जिम्मेदारी और सेवा है। आज के समय में ड्राइवरों पर ज्यादा से ज्यादा किलोमीटर तय करने और ज्यादा राजस्व जुटाने का जो भारी दबाव रहता है, उसका सीधा असर उनकी मानसिक स्थिति पर पड़ता है। इसी तनाव के चलते वे अक्सर बस को तेज भगाते हैं, जो हादसों का सबसे बड़ा कारण बनता है।

जब तक कंपनियां केवल अपनी कमाई पर ध्यान देंगी और ड्राइवरों की ट्रेनिंग व उनकी सुरक्षा पर निवेश नहीं करेंगी तब तक ये बसें पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पाएंगी। गौर करने वाली बात यह भी है कि ये इलेक्ट्रिक बसें बिल्कुल शांत (साइलेंट) होती हैं, जो इन्हें सड़क पर और भी चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। इसलिए अगर ड्राइवर पूरी ट्रेनिंग के साथ शांत दिमाग से बस नहीं चलाएगा तो ये आधुनिक बसें लोगों के लिए सुविधा बनने के बजाय एक बड़ा खतरा बनी रहेंगी।

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