इलाज न मिलने से मौत: 24 घंटे खुले में पड़ा रहा UP के इम्तियाज का शव, सरकारी अस्पताल और पुलिस ने झाड़ा पल्ला
Saharsa News: सहरसा सदर अस्पताल में यूपी के घायल युवक मो. इम्तियाज की इलाज के अभाव में मौत हो गई। मौत के बाद शव 24 घंटे खुले में पड़ा रहा। मीडिया पहुंचने पर अस्पताल और पुलिस ने जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाली।
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बिहार के सहरसा सदर अस्पताल से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बेहद भयावह और संवेदनहीन तस्वीर सामने आई है। यहां ट्रेन से गिरकर जख्मी हुए यूपी के एक युवक ने इलाज के अभाव में तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। सिस्टम की बेरुखी यहीं खत्म नहीं हुई, मौत के बाद शव को मॉर्चरी या डीप फ्रीजर में रखने के बजाय करीब 24 घंटे से अधिक समय तक इमरजेंसी गेट के बरामदे में लावारिस छोड़ दिया गया।
चलती ट्रेन से गिरने के बाद अस्पताल पहुंचा था युवक
जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का रहने वाला 30 वर्षीय मो. इम्तियाज शनिवार सुबह सहरसा-मानसी रेलखंड पर सिमरी बख्तियारपुर थाना क्षेत्र के महखड़ ढाला के पास चलती ट्रेन से गिर गया था। हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गया। स्थानीय लोगों ने तत्परता दिखाते हुए उसे तुरंत सिमरी बख्तियारपुर अनुमंडलीय अस्पताल पहुंचाया। वहां प्राथमिक उपचार के बाद हालत गंभीर देखते हुए डॉक्टरों ने उसे सहरसा सदर अस्पताल रेफर कर दिया।
बेहतर इलाज नहीं मिला, अस्पताल में तोड़ा दम
बेहतर इलाज की उम्मीद में सहरसा सदर अस्पताल लाए गए मो. इम्तियाज को समुचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिल सकी। लापरवाही और देखरेख के अभाव के चलते उसने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया। यह आरोप अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है कि गंभीर घायल मरीज को समय पर पर्याप्त इलाज क्यों नहीं मिला।
मौत के बाद भी नहीं मिला सम्मान
संवेदनहीनता की हद तब पार हो गई जब मौत के बाद शव को अस्पताल के इमरजेंसी गेट के बरामदे में ही छोड़ दिया गया। परिजनों के न पहुंचने का हवाला देकर शव को खुले में पड़ा रहने दिया गया। करीब 24 घंटे से अधिक समय तक शव को मोर्चरी या डीप फ्रीजर में नहीं रखा गया, जिससे अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली कटघरे में आ गई है।
मीडिया पहुंची तो हरकत में आया प्रशासन
जब शव घंटों पड़े रहने का मामला तूल पकड़ने लगा और मीडियाकर्मी मौके पर पहुंचे, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। इसके बाद अस्पताल और पुलिस के बीच जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोपने का खेल शुरू हो गया। मामले ने अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन दोनों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए।
अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस पर डाली जिम्मेदारी
सदर अस्पताल की प्रबंधक सिम्पी ने अपना पल्ला झाड़ते हुए पुलिस पर ठीकरा फोड़ा। उन्होंने कहा कि पुलिस को सूचना दे दी गई थी और आगे की कानूनी कार्रवाई उन्हें ही करनी थी। उनके बयान के बाद जिम्मेदारी तय करने की बहस और तेज हो गई है।
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पुलिस ने अस्पताल प्रशासन को बताया जिम्मेदार
दूसरी तरफ, सहरसा सदर थाना अध्यक्ष सुबोध कुमार ने कहा कि मृतक के परिजनों की तलाश की जा रही है। परिजनों के आने और शिनाख्त करने के बाद ही शव का पोस्टमार्टम कराया जाएगा। थानाध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि शव को फ्रीजर में सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं, बल्कि अस्पताल प्रशासन की है।
पूरे सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
यह हृदयविदारक घटना सिर्फ सहरसा सदर अस्पताल की खामियों को ही उजागर नहीं करती, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या गरीब और परदेसी मरीजों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है। मौत के बाद भी एक इंसान को सम्मानजनक जगह न मिलना हमारी लचर व्यवस्था की सबसे कड़वी और डरावनी सच्चाई है।
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