Bihar BJP CM: बिहार में पहली बार भाजपा का सीएम; किसकी सींची फसल काटेंगे सम्राट, कौन थे पार्टी के भीष्म पितामह
Samrat Choudhary : हसरत, अरमान, सपना... जो कहें, भाजपा लंबे समय से बिहार के लिए देख रही थी। आज सम्राट चौधरी बिहार में भाजपा के नए मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं तो देखने वाली बात है कि पार्टी का यह सफर किनकी बदौलत मुकाम तक पहुंचा है?
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और आखिरकार भारतीय जनता पार्टी का मिशन सफल रहा। बिहार में भाजपा का पहली बार मुख्यमंत्री बनाने का मिशन पूरा हुआ। यह लक्ष्य आज का नहीं। दशकों पुराना है। आज सम्राट चौधरी के नाम की घोषणा के बाद बिहार भाजपा के भीष्म पितामह कहे जाने वाले दिवंगत कैलाशपति मिश्र और अर्जुन की तरह लक्ष्य का पीछा करने वाले दिवंगत सुशील कुमार मोदी की चर्चा बरबस चल निकली। सम्राट चौधरी के जयकारे की गूंज के बीच बिहार में भाजपा को मजबूत करने वाले सारे नामों को याद किया जाता रहा, लेकिन सबसे ज्यादा याद लोगों ने कैलाशपति मिश्र और सुशील मोदी को किया। भाजपा के संगठन ने अपने विधायकों की संख्या कैसे बढ़ाई, यह भी आज लोग सोच रहे हैं। तो, आइए जानते हैं कैसे-किसकी बदौलत आज यह दिन सामने आया है।
बिहार में भी भाजपा ने शुरुआत जनसंघ के जमाने से की, लेकिन आज जब भाजपाई सीएम की बात करें तो रोचक बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने 1980 में अपनी शुरुआत के साथ ही बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया था। यह दौर कैलाशपति मिश्र का था। वह भाजपा के गठन से पहले विधायक बन चुके थे। भाजपा का गठन हुआ तो प्रदेश अध्यक्ष बने। एक पार्टी को जमाने में जितनी मेहनत करनी थी, उससे ज्यादा ही की। तभी तो उन्हें बिहार भाजपा का भीष्म पितामह कहा जाता है। कैलाशपति मिश्र ने जो काम किया था, उसका पुरस्कार उन्हें भाजपा ने नई सदी में राज्यपाल बनाकर दिया। 1980 में भाजपा ने तत्कालीन बिहार की 246 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे और 21 सीटें जीती थीं। यह उस दौर में भाजपा के लिए बड़ी बात ही थी, क्योंकि तब कांग्रेस के सामने किसी का वजूद मुश्किल था।
1985 में भाजपा ने 234 प्रत्याशी दिए तो जीत की संख्या 16 पर आ गई। इन दोनों चुनाव ें में भाजपा के क्रमश: 173 और 172 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई थी। समझा जा सकता है कि तब भाजपा के लिए बिहार कितनी मुश्किल जमीन थी। लेकिन, 1990 से तमाम मेहनत का नतीजा सामने आने लगा। कांग्रेस की पकड़ ढीली होती गई और भाजपा की साख बढ़ती गई। 1990 में 237 सीटों पर प्रत्याशी देकर भाजपा ने 39 विधायकों से संतोष किया, जबकि लालू प्रसाद यादव के उभरने के दौर 1995 में 315 सीटों पर प्रत्याशी देकर 41 सीटें जीतने का अवसर हासिल किया।
लालू खड़े हुए तो सुशील मोदी भी बढ़े
बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी को आगे-पीछे का, लेकिन समकक्ष माना जाता है। लालू के हाथ पहले सफलता मिली, नीतीश के पास बाद में सफलता आई। और, सुशील कुमार मोदी लगातार मेहनत के बावजूद दूसरे नंबर से आगे नहीं बढ़ सके। वर्ष 2000 का चुनाव कुछ अलग था, क्योंकि तब लालू-राबड़ी के सामने सुशील मोदी बहुत ताकत के साथ खड़े थे। नीतीश कुमार का साथ था। भाजपा ने 168 सीटों पर प्रत्याशी दिए और 67 सीटों पर जीत मिली। यह पहला मौका था जब जमानत जब्त होने वाले भाजपा प्रत्याशियों की संख्या तिहाई के आंकड़े से बहुत कम 33 पर रही। इस दौर में सुशील कुमार मोदी के आसपास कई दिग्गज नेता रहे, लेकिन उनकी बराबरी कोई नहीं कर सका।
नीतीश को बॉस मान हमेशा विश्वसनीय रहे सुमो
सुशील मोदी ने नीतीश कुमार को अपना बॉस मान लिया और फिर लंबी लड़ाई शुरू हुई। बड़ी जीत के साथ। 2005 के फरवरी में चुनाव हुआ तो भाजपा ने झारखंड बंटवारे के बाद बची सीटों में से 103 पर प्रत्याशी दिए। इनमें से 37 पर जीत मिली, जबकि 34 पर जमानत जब्त हो गई। संघर्ष को और गति दी गई। इसी साल अक्टूबर में फिर चुनाव हुआ। इस बार भाजपा ने 102 सीटों पर प्रत्याशी दिए और 55 पर जीत दर्ज की। जमानत जब्त होने वालों की संख्या नौ पर उतर आई। मतलब, पार्टी को एक झटके में मजबूती मिल गई। इसके बाद भाजपा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2010 में 102 सीटों पर प्रत्याशी दिए और 91 पर धमाकेदार जीत हासिल की। 2005 से नीतीश कुमार के साथ चल रही सरकार ठीकठाक ढर्रे पर थी, लेकिन तभी केंद्र में होने वाले चुनाव के लिए 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आगे किया गया। नीतीश कुमार गोधरा कांड के बाद से उनपर नाराज थे, सो अलग हो गए। नतीजा यह रहा कि 2015 में जदयू से अलग होकर उतरी भाजपा 157 में से 53 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी।
नीतीश दूर हुए तो करीब आए भी सुशील मोदी के कारण
सुशील मोदी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से दूरी को लेकर सहज नहीं थे, इसलिए महागठबंधन सरकार में लालू यादव की नई पीढ़ी पर लगातार हमलावर रहे। उनके नए घोटाले सामने लाए। नीतीश कुमार को उनकी बातें रास आईं। नीतीश 2017 में वापस एनडीए में लौटे। तब 2020 के चुनाव में भाजपा ने 110 सीटों पर प्रत्याशी दिए और 74 सीटों पर जीत हासिल की। इसके बाद, अचानक भाजपा ने सुशील मोदी को नीतीश कुमार की इच्छा के बावजूद बिहार की राजनीति से हटा दिया। सुशील मोदी के राज्यसभा जाने के बाद सम्राट चौधरी का कद बहुत तेजी से बढ़ा। वह 2018 में भाजपा में शामिल हुए थे, लेकिन 2022 के बाद उनका ग्राफ और ज्यादा तेज हुआ। 2023 आते-आते सम्राट चौधरी ने बिहार भाजपा की पहचान वाली जगह ले ली। लाभ मिला, जब 2024 में एनडीए सरकार लौटी। इस बार सम्राट उप मुख्यमंत्री बने तो 2025 के बिहार चुनाव में भाजपा की 89 सीटों पर जीत के बाद भी पार्टी ने उन्हें बदलने का प्रयोग नहीं किया। अब तो भाजपा ने पहली बार प्रयोग किया और अपने उप मुख्यमंत्री को ही मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी।
