Bihar: अंग्रेजों से लड़े, 9 बार जेल गए पर नहीं मिली पहचान! आजादी के इस गुमनाम नायक की कहानी कर देगी भावुक
अररिया जिले के भरगामा प्रखंड के जयनगर गांव निवासी पंडित कुशेश्वर झा ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। 1899 में जन्मे कुशेश्वर झा ने युवावस्था में पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने युवाओं को संगठित कर गांव-गांव आंदोलन की अलख जगाई और अगस्त क्रांति व भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय रहे।
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15 अगस्त आते ही देश स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को याद करता है। तिरंगा फहराया जाता है, देशभक्ति के गीत गूंजते हैं और आजादी के आंदोलन में योगदान देने वाले सेनानियों को श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन गांव-कस्बों में ऐसे भी अनेक स्वतंत्रता सेनानी रहे, जिनका योगदान समय के साथ इतिहास की मुख्यधारा से दूर होता चला गया। अररिया जिले के भरगामा प्रखंड के जयनगर गांव निवासी पंडित कुशेश्वर झा की कहानी भी ऐसे ही एक गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी की है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। बताया जाता है कि आंदोलन के दौरान उन्हें करीब नौ बार जेल जाना पड़ा और यातनाएं भी सहनी पड़ीं, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा।
पढ़ाई छोड़ आजादी की लड़ाई में कूद पड़े कुशेश्वर झा
15 अगस्त 1899 को जन्मे पंडित कुशेश्वर झा बचपन से ही देश और समाज से जुड़े कार्यों में रुचि रखते थे। परिवार और पुराने प्रकाशित विवरणों के अनुसार, युवावस्था में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन में खुद को समर्पित कर दिया था। उन्होंने आसपास के युवाओं को संगठित किया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनजागरण अभियान चलाया। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना था।
युवाओं को संगठित कर गांव-गांव पहुंचाई आजादी की अलख
बताया जाता है कि कुशेश्वर झा ने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक गतिविधि तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे आम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया। युवाओं की टोली बनाकर वे लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ जागरूक करते थे। उस दौर में ग्रामीण इलाकों में स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाना आसान नहीं था। अंग्रेजी शासन की सख्ती और गिरफ्तारी के खतरे के बावजूद उन्होंने आंदोलन का रास्ता नहीं छोड़ा।
अगस्त क्रांति और भारत छोड़ो आंदोलन में भी रहे सक्रिय
पुराने समाचार पत्रों में प्रकाशित विवरण और परिजनों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुशेश्वर झा ने अगस्त क्रांति और भारत छोड़ो आंदोलन समेत स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न अभियानों में हिस्सा लिया। आंदोलन के दौरान वे अंग्रेजी शासन की निगरानी में रहे और कई बार गिरफ्तार किए गए। परिजनों के अनुसार, उन्हें करीब नौ बार जेल जाना पड़ा। जेल में उन्हें विभिन्न प्रकार की यातनाएं सहनी पड़ीं, लेकिन देश की आजादी का उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ।
सीमांचल के कई सेनानियों के साथ मिलकर लड़ी लड़ाई
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कुशेश्वर झा के साथ क्षेत्र के कई अन्य सेनानी भी सक्रिय थे। पुराने समाचार प्रकाशनों और स्थानीय विवरणों में बोकाई मंडल, अनूप लाल मेहता, गरीबदास, नक्षत्र मालाकार, रामदेव तिवारी और द्विजदेनी जी समेत कई नामों का उल्लेख मिलता है। इन सेनानियों ने सीमांचल क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन को जनस्तर तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई।
फॉरबिसगंज में गांधीजी के आगमन से जुड़ी है याद
परिवार के अनुसार, महात्मा गांधी के फॉरबिसगंज दौरे के दौरान कुशेश्वर झा भी उनके संपर्क में आए थे। गांधीजी के विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन के संदेश से वे प्रभावित हुए और देश की आजादी तक संघर्ष में सक्रिय रहे। हालांकि, इस प्रसंग से जुड़े उपलब्ध दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि होने पर ही इसे क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का प्रमाणित हिस्सा माना जा सकेगा।
आजादी के बाद मिला सरकारी सम्मान
देश स्वतंत्र हुआ तो लंबे संघर्ष का दौर समाप्त हुआ, लेकिन कुशेश्वर झा का सादगी और सेवा से जुड़ा जीवन जारी रहा। वर्ष 1972 में स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ताम्रपत्र और खादी वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन भी मिलने लगी। इस सम्मान से जुड़ा प्रमाण आज भी परिवार के पास सुरक्षित बताया जाता है। ताम्रपत्र की तस्वीर उनके स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानित किए जाने की स्मृति को संरक्षित किए हुए है।
पेंशन भी जरूरतमंदों की मदद में कर देते थे खर्च
कुशेश्वर झा के व्यक्तित्व का सबसे अलग पहलू उनका परोपकारी स्वभाव बताया जाता है। परिजनों के अनुसार, वे अपनी पेंशन को निजी सुख-सुविधाओं पर खर्च करने के बजाय जरूरतमंदों की सहायता में लगा देते थे। गरीब और असहाय लोगों की मदद करना उनके जीवन का हिस्सा था। यही वजह थी कि स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान मिलने के बावजूद उनका जीवन बेहद सादगीपूर्ण रहा।
मां दुर्गा के भक्त थे, गीता के श्लोकों से जुड़ा था जीवन
देशभक्ति के साथ कुशेश्वर झा धार्मिक प्रवृत्ति के भी थे। वे मां दुर्गा के अनन्य भक्त बताए जाते हैं और प्रतिदिन पूजा-अर्चना करते थे। परिवार के अनुसार, भगवद्गीता के श्लोकों का भी वे नियमित स्मरण करते थे। उनके लिए राष्ट्रसेवा, समाजसेवा और आध्यात्मिक जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं थे।
5 जुलाई 1983 को हुआ निधन
करीब आठ दशक से अधिक समय तक जीवन जीने के बाद 5 जुलाई 1983 को पंडित कुशेश्वर झा का निधन हो गया। उनके निधन के साथ स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे अध्याय का अंत हुआ, जिसकी चर्चा आज सीमित दायरे में रह गई है। उनके पास मौजूद सम्मान और परिवार की स्मृतियां आज भी उस दौर की कहानी कहती हैं।
पिता के रास्ते पर चले जागेश्वर झा, अब गुमनामी में जीवन
कुशेश्वर झा के पुत्र जागेश्वर झा ने भी अपने पिता के आदर्शों और सादगी को जीवन में अपनाया। परिवार के अनुसार, उन्होंने सामाजिक मूल्यों के साथ जीवन बिताया और पिता की विरासत को संभालने का प्रयास किया। लेकिन विडंबना यह है कि आज स्वतंत्रता सेनानी का यह परिवार ही गुमनामी के साये में है।
बढ़ती उम्र में जागेश्वर झा का जीवन यह सवाल खड़ा करता है कि देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले परिवारों की विरासत को किस तरह संरक्षित किया जा रहा है। स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान की चर्चा राष्ट्रीय अवसरों पर तो होती है, लेकिन उनकी अगली पीढ़ी की स्थिति पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
ताम्रपत्र सुरक्षित, लेकिन धुंधली पड़ रही इतिहास की याद
परिवार के पास मौजूद पंडित कुशेश्वर झा का पुराना चित्र और उन्हें मिला ताम्रपत्र उनके संघर्ष और सरकारी सम्मान के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। परिवार के पास उनके पुत्र जागेश्वर झा की तस्वीरें भी उपलब्ध हैं। इन दस्तावेजों और तस्वीरों के जरिए एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी की कहानी सामने आती है, जिसका जीवन देश के लिए संघर्ष और समाज की सेवा को समर्पित रहा।
गुमनाम नायकों को इतिहास में उचित स्थान देने की जरूरत
स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल उन नामों तक सीमित नहीं है, जिन्हें देशभर में जाना जाता है। गांवों और कस्बों में हजारों ऐसे लोग थे, जिन्होंने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया, जेल गए और यातनाएं सहीं। पंडित कुशेश्वर झा की कहानी भी इसी व्यापक इतिहास का हिस्सा है।
आज जब देश आजादी के इतने वर्षों का सफर तय कर चुका है, तब ऐसे गुमनाम सेनानियों के जीवन और योगदान को उपलब्ध दस्तावेजों के साथ संकलित करना जरूरी है। इससे आने वाली पीढ़ी समझ सकेगी कि आजादी केवल कुछ बड़े आंदोलनों या नेताओं की देन नहीं थी, बल्कि इसके पीछे देश के कोने-कोने में रहने वाले अनगिनत लोगों का त्याग, संघर्ष और बलिदान था।