आसमान साफ, फिर भी डूबे मकान: सहरसा में बिना बारिश आई 'पानी वाली तबाही' 80 घर कोसी में विलीन; खौफनाक त्रासदी
आंगन में चार-चार फीट पानी बह रहा है, फसलें बर्बाद हो चुकी हैं और चूल्हे ठंडे पड़े हैं। बिहार का सहरसा जिला बिना एक बूंद बारिश के बाढ़ की खौफनाक त्रासदी झेल रहा है। पढ़ें पूरी खबर
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सहरसा में कोसी तटबंध के अंदर की स्थिति बेहद गंभीर है। नवहट्टा प्रखंड की सत्तौर पंचायत का बिरजाईन गांव पूरी तरह कोसी नदी के कटाव की जद में आ चुका है। देखते ही देखते करीब 80 परिवारों के आशियाने नदी में समा गए। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने एक जून को ही जिला प्रशासन को आवेदन देकर कटाव निरोधी कार्य कराने की गुहार लगाई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि बेघर हुए 80 परिवार अब तटबंध की ढलानों पर तिरपाल तानकर नए सिरे से घर बनाने में लगे हैं।
मुख्य और ग्रामीण सड़कें पानी में बह चुकी हैं। स्थिति यह है कि केदली, बकुनिया नौलाडीह, डरहार, हांटी और शाहपुर जैसी छह पंचायतों तक जाने के लिए अब सिर्फ देसी नाव ही एकमात्र सहारा बची है।
बिना बारिश कहां से आया पानी?
स्थानीय स्तर पर बारिश न होने के बावजूद इस तबाही का मुख्य कारण नेपाल का जलग्रहण क्षेत्र है। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में हो रही मूसलाधार बारिश से सप्तकोशी नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया, जिसके बाद सुपौल जिले में स्थित वीरपुर बैराज के गेट खोलकर लाखों क्यूसेक पानी छोड़ दिया गया।
तटबंध के बीच बसे दियारा क्षेत्र के नवहट्टा, महिषी, सिमरी बख्तियारपुर और सलखुआ प्रखंडों के दर्जनों गांवों में यह पानी तेजी से फैल गया। सहरसा जिले के इन चार प्रखंडों के एक लाख से अधिक लोग इस समय पानी से घिरे हैं।
तटबंध के अंदर बेहाल जिंदगी
कोसी तटबंध के भीतर हर साल 1 जून से 31 अक्टूबर तक जिंदगी पूरी तरह पटरी से उतर जाती है। चापाकल डूब जाने के कारण लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। घरों में पानी भरने से राशन सड़ चुका है, जिससे भुखमरी की स्थिति बन रही है। इंसानों के साथ-साथ मवेशियों के रहने और खाने का भी बड़ा संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि हरे चारे के खेत डूब चुके हैं। इसके अलावा विषैले जीव-जंतुओं और जलजनित बीमारियों का खतरा भी मंडरा रहा है। प्रशासनिक दावों के उलट अंदरूनी गांवों तक सरकारी मदद पहुंचने में काफी देरी हो रही है।
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आगे का खतरा और अर्थव्यवस्था पर असर
सहरसा से बहता हुआ कोसी का यह पानी आगे निचले इलाकों में खगड़िया जिले के अलौली और चौथम क्षेत्रों को प्रभावित करेगा। इससे न केवल धान और मक्के की मौजूदा फसलें बर्बाद होंगी, बल्कि आने वाली रबी फसल की बुआई में भी महीनों की देरी हो सकती है। इससे इलाके की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।
दीर्घकालिक समाधान की मांग
सहरसा की यह स्थिति बिहार की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है, जहां समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। जब तक भारत और नेपाल के बीच ‘हाई डैम’ परियोजना और कोसी नदी के गाद (सिल्ट) प्रबंधन पर कोई ठोस और स्थायी नीति नहीं बनती, तब तक सहरसा और कोसी क्षेत्र के लोगों के लिए बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल बना रहेगा।