Viral Story: दो लाख रुपये महीना कमाने वाला 27 साल का इंजीनियर, कैसे 20 लाख के कर्ज में डूब गया?
Viral Post: करीब पांच साल पहले राहुल ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। उस समय उनकी इन-हैंड सैलरी महज 40 हजार रुपये प्रति माह थी। नई नौकरी, बड़े सपने और बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ उन्होंने लगातार खुद को बेहतर बनाने पर काम किया। मेहनत रंग लाई और उन्हें एक के बाद एक अच्छे अवसर मिलने लगे। फिर जो हुआ...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बड़ी सैलरी, शानदार लाइफस्टाइल, हर वीकेंड आउटिंग और महंगे गैजेट्स महानगरों में काम करने वाले आईटी प्रोफेशनल्स की जिंदगी बाहर से देखने पर अक्सर किसी सपने जैसी लगती है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे कई बार ऐसी आर्थिक परेशानियां छिपी होती हैं, जिनका अंदाजा लगाना आसान नहीं होता। ऐसी ही एक कहानी दिल्ली-एनसीआर में काम करने वाले 27 वर्षीय राहुल की है, जिसकी हर महीने 2 लाख रुपये की इन-हैंड सैलरी होने के बावजूद महीने के अंत तक अकाउंट लगभग खाली हो जाता है। इतना ही नहीं वह इस समय करीब 20 लाख रुपये के कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। तो आइए जानते हैं कि पूरी कहानी क्या है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई यह कहानी
राहुल की कहानी पांच साल पहले शुरू हुई थी, जब उन्होंने सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर अपने करियर का पहला कदम रखा। उस समय उनकी मासिक सैलरी 40 हजार रुपये थी। मेहनत, बेहतर प्रदर्शन और दो बार नौकरी बदलने के बाद उनकी आय लगातार बढ़ती गई और आज वह हर महीने 2 लाख रुपये घर लेकर आते हैं। इतनी कमाई आमतौर पर आर्थिक रूप से मजबूत भविष्य की नींव मानी जाती है, लेकिन राहुल के लिए यही बढ़ती आय धीरे-धीरे एक बड़ी फाइनेंशियल चुनौती में बदल गई।
बड़ी सैलरी से बढ़ते हैं खर्च
अपनी पूरी कहानी राहुल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर साझा की। उन्होंने लिखा, "जैसे-जैसे सैलरी बढ़ती है, वैसे-वैसे आपका सोशल सर्कल भी बदलने लगता है। दोस्तों को देखकर मैंने सबसे पहले क्रेडिट कार्ड लिया। उसके बाद बिना ज्यादा सोचे-समझे लोन पर एक लग्जरी कार खरीद ली। उस वक्त मुझे लगा कि जब हर महीने 2 लाख रुपये आ रहे हैं, तो ईएमआई देना कोई मुश्किल काम नहीं होगा।"
ऐसे शुरू हुई आर्थिक संकट
यहीं से उनके आर्थिक संकट की शुरुआत हुई। शुरुआत में आसान लगने वाले फैसले धीरे-धीरे भारी पड़ने लगे। 'बाय नाउ, पे लेटर' और आसान ईएमआई जैसी सुविधाओं ने खर्च करना बेहद आसान बना दिया, लेकिन इन्हीं विकल्पों ने उनके ऊपर कर्ज का बोझ भी लगातार बढ़ाया। देखते ही देखते स्थिति ऐसी हो गई कि अच्छी-खासी सैलरी होने के बावजूद हर महीने कमाई का बड़ा हिस्सा केवल कर्ज और ईएमआई चुकाने में जाने लगा।