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Chandigarh News: बच्चों के कोमल मन पर शब्दों का गहरा असर, प्यार से बढ़ता है आत्मविश्वास
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चंडीगढ़। जीएमएचएस-48 की शिक्षिका मनिका शर्मा ने बच्चों के जीवन में शब्दों की शक्ति को महत्वपूर्ण बताया है। उनके अनुसार, तीन से आठ साल की उम्र में बच्चों का सामाजिक, संवेगात्मक और मानसिक विकास होता है। इस दौरान बोले गए शब्द ही उनके भविष्य को आकार देते हैं।
मनिका शर्मा ने अभिभावकों और अध्यापकों से छोटे बच्चों के साथ जुड़ाव को प्रमुख बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों की गलती पर नकारात्मक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे शब्द बच्चों के कोमल मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास टूटता है और वे खुद को बुरा समझने लगते हैं। बच्चे कक्षा में बोलने से डरने लगते हैं और दोस्तों से भी कट जाते हैं। यह उनके सामाजिक, मानसिक और संवेगात्मक विकास को बाधित करता है। इसके विपरीत, प्यार भरे शब्द बच्चों में सुरक्षा और स्वीकार्यता की भावना जगाते हैं। यह भावना उन्हें शिक्षक से जोड़ती है और सीखने की ललक पैदा करती है।
वैज्ञानिक आधार
मनिका शर्मा ने इसका वैज्ञानिक कारण भी स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि सकारात्मक शब्दों से बच्चों के दिमाग में डोपामाइन नामक रसायन निकलता है। यह रसायन सीखने की प्रक्रिया को आसान और आनंददायक बनाता है। सामाजिक संवेगात्मक शिक्षा (एसईएल) की शुरुआत भी भाषा से ही होती है। बच्चे उन्हीं से सीखते हैं जिनसे वे जुड़ाव महसूस करते हैं।
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शिक्षा की नींव
मनिका शर्मा ने ''''कनेक्शन बिफोर करेक्शन'''' को शिक्षा की असली नींव बताया। उनका कहना है कि बच्चा जितना शिक्षक से जुड़ाव महसूस करेगा, उसका संपूर्ण विकास उतना ही बेहतर होगा। हर शिक्षक और माता-पिता का यह दायित्व है कि वे बच्चों की तारीफ करें। उन्हें प्रोत्साहित करें और सुधार भी प्यार तथा समझदारी से करें।
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मनिका शर्मा ने अभिभावकों और अध्यापकों से छोटे बच्चों के साथ जुड़ाव को प्रमुख बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों की गलती पर नकारात्मक शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसे शब्द बच्चों के कोमल मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास टूटता है और वे खुद को बुरा समझने लगते हैं। बच्चे कक्षा में बोलने से डरने लगते हैं और दोस्तों से भी कट जाते हैं। यह उनके सामाजिक, मानसिक और संवेगात्मक विकास को बाधित करता है। इसके विपरीत, प्यार भरे शब्द बच्चों में सुरक्षा और स्वीकार्यता की भावना जगाते हैं। यह भावना उन्हें शिक्षक से जोड़ती है और सीखने की ललक पैदा करती है।
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वैज्ञानिक आधार
मनिका शर्मा ने इसका वैज्ञानिक कारण भी स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि सकारात्मक शब्दों से बच्चों के दिमाग में डोपामाइन नामक रसायन निकलता है। यह रसायन सीखने की प्रक्रिया को आसान और आनंददायक बनाता है। सामाजिक संवेगात्मक शिक्षा (एसईएल) की शुरुआत भी भाषा से ही होती है। बच्चे उन्हीं से सीखते हैं जिनसे वे जुड़ाव महसूस करते हैं।
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शिक्षा की नींव
मनिका शर्मा ने ''''कनेक्शन बिफोर करेक्शन'''' को शिक्षा की असली नींव बताया। उनका कहना है कि बच्चा जितना शिक्षक से जुड़ाव महसूस करेगा, उसका संपूर्ण विकास उतना ही बेहतर होगा। हर शिक्षक और माता-पिता का यह दायित्व है कि वे बच्चों की तारीफ करें। उन्हें प्रोत्साहित करें और सुधार भी प्यार तथा समझदारी से करें।