बंगाल: मासूम की मौत और शुभेंदु सरकार के सामने चुनौतियां
Bengal: सच्चाई यह है कि किसी बच्ची के साथ होने वाला अपराध न भाजपा का होता है, न तृणमूल का और न किसी अन्य दल का। वह केवल अपराध होता है। यदि राजनीतिक दल पीड़िता को भी राजनीतिक चश्मे से देखने लगें, तो सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र और समाज दोनों का होता है।
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बारुईपुर की 12 वर्षीय बच्ची अब इस दुनिया में नहीं है। वह घर से सामान खरीदने निकली थी, लेकिन अगले दिन उसका शव तालाब से मिला। इस एक घटना ने बंगाल की कानून-व्यवस्था, राजनीति और समाज तीनों के सामने असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
पहला सवाल अपराध का है। पीड़ित परिवार दुष्कर्म के बाद हत्या का आरोप लगा रहा है। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है और एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। दुष्कर्म की धाराएं पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद जोड़ी जाएंगी या नहीं, यह जांच का विषय है। लेकिन जनता का भरोसा किसी बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष और तेज जांच से बनेगा।
दूसरा सवाल कानून के राज का है। घटना के बाद भीड़ ने एक संदिग्ध युवक को पीट-पीटकर मार डाला। यदि वह अपराधी था, तब भी उसे सजा देने का अधिकार अदालत को था और यदि वह निर्दोष था, तो यह कानून के शासन पर गंभीर आघात है। भीड़ का न्याय, न्याय नहीं बल्कि अराजकता है।
तीसरा और सबसे बड़ा सवाल राजनीति का है। किसी भी जघन्य अपराध के बाद राजनीतिक दल सक्रिय हो जाते हैं। बयान आते हैं, आरोप लगते हैं और घटनाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाती हैं। बारुईपुर में भी यही हो रहा है।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन अपराधियों का मनोबल बढ़ता जा रहा है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि बारुईपुर की घटना पर वैसी राष्ट्रीय प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखी, जैसी कुछ अन्य मामलों में देखने को मिली थी। यह प्रश्न केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने कई ऐसे मामले देखे हैं, जहां अपराध से अधिक चर्चा इस बात की हुई कि घटना किस राज्य में हुई और वहां किस दल की सरकार है। कहीं सड़कें विरोध से भर गईं, तो कहीं चुप्पी छाई रही। कहीं तत्काल इस्तीफे की मांग उठी, तो कहीं वही दल मौन हो गए। इस चयनात्मक राजनीति ने न्याय की नैतिक शक्ति को कमजोर किया है।
सच्चाई यह है कि किसी बच्ची के साथ होने वाला अपराध न भाजपा का होता है, न तृणमूल का और न किसी अन्य दल का। वह केवल अपराध होता है। यदि राजनीतिक दल पीड़िता को भी राजनीतिक चश्मे से देखने लगें, तो सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र और समाज दोनों का होता है।
बारुईपुर मामले में अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रशासन की है। जांच निष्पक्ष हो, वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर हो और दोषियों को शीघ्र सजा मिले। यदि किसी स्तर पर राजनीतिक दबाव या लापरवाही हुई है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता को दिखाई भी देना चाहिए।
यह मामला विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के लिए भी एक राजनीतिक परीक्षा है। महिलाओं की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर वे लंबे समय से ममता बनर्जी सरकार पर हमलावर रहे हैं। अब जनता यह भी देखेगी कि वे इस मामले को केवल राजनीतिक मुद्दा बनाते हैं या निष्पक्ष जांच, पीड़ित परिवार को न्याय और कानून के राज की स्थापना के लिए रचनात्मक दबाव भी बनाते हैं। लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की भूमिका केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं होती, उसे न्याय की प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में भी जिम्मेदार भूमिका निभानी होती है।
महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल कठोर कानूनों से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए संवेदनशील पुलिस व्यवस्था, तेज जांच, प्रभावी अभियोजन, सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति-इन सभी की आवश्यकता है। हर बार अपराध के बाद आक्रोश व्यक्त करना आसान है, लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाना कठिन है जिसमें अपराध होने की संभावना ही कम हो।
बारुईपुर की यह मासूम अब लौटकर नहीं आएगी। लेकिन उसकी मौत बेकार नहीं जानी चाहिए। यदि इस घटना से राजनीति अपनी चयनात्मक संवेदनशीलता छोड़ सके, प्रशासन जवाबदेही स्वीकार करे और समाज कानून को अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति से बचे, तभी उस बच्ची के साथ सच्चा न्याय होगा।
आखिर किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं होती कि उसके नेता क्या कहते हैं, बल्कि यह होती है कि उसके सबसे कमजोर नागरिक को कितना न्याय मिलता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।