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जब झूठ लगे सच से भी सच्चा: डीपफेक का बढ़ता खतरा, एआई के दौर में सच्चाई की सबसे कठिन परीक्षा
Sat, 04 Jul 2026 08:01 AM IST
Devesh Tripathi
एली सैस्लो, द न्यूयॉर्क टाइम्स
एली सैस्लो, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 04 Jul 2026 08:01 AM IST
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पश्चिम एशिया संघर्ष
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नीले आसमान में उड़ती एक मिसाइल, इमारत के पास भीषण धमाका, चारों ओर धुआं और चीख-पुकार। एक सुबह दुनिया इसी भयावह वीडियो को देखकर सन्न रह गई। वीडियो में दावा किया गया था कि ईरान की एक इमारत पर अमेरिकी मिसाइल गिराई गई है, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे। इंटरनेट पर फैले इस ‘सच या झूठ’ की जांच का जिम्मा कैलिफोर्निया के बर्कले स्थित डिजिटल फोरेंसिक विशेषज्ञ हनी फरीद के पास पहुंचा।60 वर्षीय फरीद पिछले दो दशकों से डीपफेक और वास्तविक वीडियो के बीच अंतर करने वाले दुनिया के सबसे भरोसेमंद विशेषज्ञों में गिने जाते हैं। फरीद ने वीडियो का फ्रेम-दर-फ्रेम विश्लेषण शुरू किया। पहली नजर में 500 मील प्रति घंटे की गति से उड़ती मिसाइल असामान्य रूप से इतनी साफ थी कि वह किसी वीडियो गेम के ग्राफिक्स जैसी लग रही थी। पहली ही नजर में वह समझ गए कि यह वीडियो एआई जनित है, यानी एक झूठ है। परंतु, संदेह के बावजूद, बारीकी से जांच करने पर कैमरे की हलचल, रोशनी-परछाइयों का संतुलन और ध्वनि की गति के अनुसार, धमाके व चीखों की आवाज बिल्कुल स्वाभाविक थी। लाखों तस्वीरों वाले डाटाबेस से लोकेशन की जांच करने तथा तकनीकी विश्लेषण और अन्य विजुअल विशेषज्ञों से सलाह के बाद भी फरीद अंतिम निष्कर्ष देने से हिचक रहे थे। आखिरकार, उन्होंने एक सावधानीपूर्ण टिप्पणी लिखी कि कुल मिलाकर उन्हें ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो सके कि यह वीडियो नकली है या इसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ की गई है।
आज के एआई युग की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जब सबूत मौजूद हों, तब भी सच को साबित करना कठिन होता जा रहा है। फरीद का शोध यह साबित कर चुका है कि अब अधिकांश लोग असली और एआई से तैयार की गई तस्वीरों, आवाजों और वीडियो के बीच फर्क नहीं कर पाते और चिंताजनक बात यह है कि हाल के महीनों में खुद फरीद भी कई बार इस परीक्षा में असफल होने लगे थे।
सोशल मीडिया पर नकली कंटेंट अब इतना आम हो गया है कि सच्चाई की पहचान कर पाना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। जब डीपफेक तकनीक फैलने लगी, तब फरीद ने ‘गेटरियल सिक्योरिटी’ नामक कंपनी की स्थापना की और ऐसे अत्याधुनिक टूल विकसित किए, जो रोशनी, परछाइयों और वैनिशिंग पॉइंट्स के जरिये वास्तविक दुनिया की भौतिकी के नियमों की जांच करते थे। इन्सान के बोलते समय आंखों की पुतलियों का फैलना या चेहरे में रक्त का प्रवाह मापना उनके एल्गोरिदम का हिस्सा था, पर अब सबसे बड़ी चुनौती ‘समय की कमी’ बन चुकी है। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट अक्सर 90 सेकंड से भी कम की होती है और जब तक वैज्ञानिक जांच पूरी होती है, तब तक झूठ लाखों लोगों तक पहुंचकर सच का रूप ले चुका होता है।
इंटरनेट अब फर्जी दावों और डीपफेक के अंतहीन चक्र में फंस चुका है, जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की फर्जी कॉल, डोनाल्ड ट्रंप की बनावटी तस्वीरें, स्कूली छात्राओं की एआई-जनरेटेड नग्न तस्वीरें और टॉम हैंक्स के फर्जी विज्ञापन इसके उदाहरण हैं। तकनीक की यह रफ्तार डरावनी हो चुकी है और स्वयं फरीद भी इसका शिकार बन चुके हैं। हुआ कुछ यों कि एक बार एक साइबर अपराधी ने एआई से उनकी आवाज की हूबहू नकल तैयार कर उनकी पत्नी से गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश की थी। इस घटना के बाद फरीद और उनकी पत्नी एमिली कूपर, जो स्वयं एक विजन साइंटिस्ट हैं, को फोन कॉल पर एक गुप्त ‘सेफ वर्ड’ का नियम बनाना पड़ा। ऐसे तनाव भरे माहौल और मानसिक तनाव से तंग आकर फरीद और कूपर ने सिलिकॉन वैली को छोड़कर वर्मोंट के एक शांत ग्रामीण इलाके में बसने की योजना बनाई, ताकि वे प्रकृति के करीब मानसिक शांति पा सकें। वर्मोंट के जंगलों में लकड़ियां काटने और शांति तलाशने के बावजूद फरीद इस डिजिटल दुःस्वप्न से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि उनके इनबॉक्स में लगातार वैश्विक हादसों, विस्फोटों और गंभीर अपराधों से जुड़े वीडियो पुष्टिकरण के लिए आ रहे हैं।
माहौल को बदलने की हर कोशिश के बाद, आखिरकार फरीद को फिर से अपने कंप्यूटर की मॉनिटर लाइट के सामने झुकना ही पड़ता है। और वह एक बार फिर सच और झूठ के बीच की उस धुंधली रेखा को पहचानने की जद्दोजहद में जुट जाते हैं, जिससे वह चाहकर भी बच नहीं पा रहे।