मंदिर अर्थव्यवस्था: क्या आस्था की पूंजी को भी चाहिए कॉर्पोरेट गवर्नेंस?
भारत में धार्मिक पर्यटन सबसे तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में है। अनुमान है कि धार्मिक यात्राओं से प्रतिवर्ष लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। होटल, परिवहन, प्रसाद उद्योग, फूल व्यवसाय, हस्तशिल्प, स्थानीय बाजार और छोटे व्यापारियों की आजीविका का बड़ा हिस्सा धार्मिक स्थलों पर निर्भर है।
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विस्तार
भारत को यदि विश्व की सबसे बड़ी आध्यात्मिक सभ्यता कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। देश में प्रतिदिन करोड़ों लोग मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों, चर्चों और दरगाहों में श्रद्धा अर्पित करते हैं। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं बल्कि आर्थिक शक्ति भी है।
आज भारत की “धार्मिक अर्थव्यवस्था” हजारों करोड़ रुपये के दान, लाखों लोगों के रोजगार, धार्मिक पर्यटन, स्थानीय व्यापार और सामाजिक सेवा का आधार बन चुकी है। किन्तु जब किसी धार्मिक संस्था के वित्तीय प्रबंधन पर प्रश्न उठते हैं, तब विवाद केवल धन का नहीं होता, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का होता है।
हाल के दिनों में अयोध्या के श्रीराम मंदिर से जुड़े दान और वित्तीय प्रबंधन को लेकर सार्वजनिक बहस तथा विभिन्न आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं।
इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण न्यायालयों और सक्षम संस्थाओं का विषय है। किंतु इस बहस ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य खड़ा किया है- क्या भारत की धार्मिक अर्थव्यवस्था अब आधुनिक वित्तीय प्रशासन, स्वतंत्र ऑडिट और सार्वजनिक जवाबदेही की मांग करती है?
मंदिर अर्थव्यवस्था अब केवल धर्म नहीं, एक बड़ा आर्थिक तंत्र
भारत में धार्मिक पर्यटन सबसे तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में है। अनुमान है कि धार्मिक यात्राओं से प्रतिवर्ष लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। होटल, परिवहन, प्रसाद उद्योग, फूल व्यवसाय, हस्तशिल्प, स्थानीय बाजार और छोटे व्यापारियों की आजीविका का बड़ा हिस्सा धार्मिक स्थलों पर निर्भर है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारतीय नागरिकों द्वारा किया जाने वाला व्यक्तिगत दान सबसे अधिक धार्मिक संस्थाओं को प्राप्त होता है।
दूसरे शब्दों में, मंदिरों में आने वाला दान केवल मंदिर की आय नहीं बल्कि भारत की सामाजिक पूंजी है।
तिरुपति: पेशेवर धार्मिक प्रशासन का मॉडल
यदि भारत में किसी धार्मिक संस्था ने आधुनिक प्रशासन और पारदर्शिता का उदाहरण प्रस्तुत किया है तो वह है तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् (टीटीडी)।
- टीटीडी का 2025-26 का बजट लगभग ₹5,394 करोड़ है, जो अनेक भारतीय नगर निगमों और सरकारी संस्थाओं के बजट से भी बड़ा है।
- सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार केवल नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच TTD को लगभग ₹918.6 करोड़ का दान प्राप्त हुआ और पहली बार ऑनलाइन दान नकद दान से अधिक रहा। यह डिजिटल भुगतान और पारदर्शी लेखांकन की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन माना गया।
- टीटीडी का अन्नप्रसादम् कार्यक्रम प्रतिवर्ष करोड़ों श्रद्धालुओं को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराता है। दान केवल मंदिर तक सीमित नहीं रहता बल्कि अस्पताल, वेद विद्यालय, शिक्षा, गौशालाओं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों में भी व्यय होता है।
वैष्णो देवी: बोर्ड आधारित उत्तरदायित्व
श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड भारत में धार्मिक प्रशासन का दूसरा सफल मॉडल है।
श्राइन बोर्ड के अनुसार 2024-25 में श्रद्धालुओं द्वारा किए गए दान में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और दान लगभग ₹172 करोड़ तक पहुँच गया। यह राशि तीर्थयात्रियों की सुविधाओं, अस्पतालों, विश्वविद्यालय, आधारभूत संरचना और सुरक्षा व्यवस्था पर व्यय की जाती है।
यह मॉडल दर्शाता है कि पारदर्शी संस्थागत व्यवस्था श्रद्धालुओं का विश्वास बढ़ाती है।
स्वर्ण मंदिर: सेवा आधारित धार्मिक अर्थव्यवस्था
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) धार्मिक दान को सामाजिक सेवा में बदलने का अद्वितीय उदाहरण है।
एसजीपीसी ने वर्ष 2025-26 के लिए लगभग ₹1,386 करोड़ का बजट पारित किया है। इस बजट का बड़ा भाग गुरुद्वारों, शिक्षा, चिकित्सा, धार्मिक प्रचार, छात्रवृत्ति और जनकल्याण पर खर्च किया जाता है।
विश्वविख्यात हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) का लंगर प्रतिदिन लगभग 75,000 से 1,00,000 लोगों को निःशुल्क भोजन कराता है। विशेष अवसरों पर यह संख्या कई लाख तक पहुँच जाती है। दुनिया में इतनी विशाल सामुदायिक रसोई शायद ही कहीं और हो।
मस्जिदें, वक्फ और चर्च
भारत में केंद्रीय वक्फ परिषद तथा विभिन्न राज्य वक्फ बोर्ड लाखों वक्फ संपत्तियों के नियमन की जिम्मेदारी निभाते हैं। वक्फ व्यवस्था में भी पारदर्शिता और पेशेवर प्रबंधन को लेकर समय-समय पर सुधारों की मांग उठती रही है।
इसी प्रकार चर्च-आधारित ट्रस्ट और डायोसीज़ शिक्षा, स्वास्थ्य, अनाथालयों और सामाजिक सेवा संस्थानों का संचालन करते हैं। भारत के अनेक प्रतिष्ठित विद्यालय और अस्पताल इन्हीं संस्थाओं द्वारा संचालित हैं। धार्मिक दान को सामाजिक पूंजी में बदलने का यह भी एक महत्वपूर्ण मॉडल है।
समस्या किसी धर्म की नहीं, व्यवस्था की है
यह कहना अनुचित होगा कि केवल मंदिरों में भ्रष्टाचार है या केवल किसी अन्य धार्मिक समुदाय की व्यवस्था आदर्श है।
जहाँ भी हजारों करोड़ रुपये का प्रवाह होगा वहाँ सुशासन, स्वतंत्र लेखा परीक्षण और जवाबदेही आवश्यक होगी। यही सिद्धांत सरकार, कॉरपोरेट, विश्वविद्यालय और धार्मिक संस्थाओं- सभी पर समान रूप से लागू होता है। आस्था किसी संस्था को वित्तीय जवाबदेही से मुक्त नहीं कर सकती।
क्या होना चाहिए सुधार?
भारत को अब राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक संस्थाओं के लिए न्यूनतम सुशासन मानक विकसित करने चाहिए-
- ₹100 करोड़ से अधिक वार्षिक आय वाले प्रत्येक धार्मिक ट्रस्ट का स्वतंत्र वार्षिक ऑडिट।
- प्रत्येक दान और व्यय का डिजिटल रिकॉर्ड।
- आय-व्यय का सार्वजनिक ऑनलाइन डैशबोर्ड।
- CAG जैसे मानकों पर स्वतंत्र वित्तीय परीक्षण (जहाँ विधिक रूप से उपयुक्त हो)।
- ट्रस्टों में चार्टर्ड अकाउंटेंट, वित्त विशेषज्ञ, प्रबंधन विशेषज्ञ और समाजसेवियों का प्रतिनिधित्व।
- सामाजिक उत्तरदायित्व (Religious Social Responsibility) रिपोर्ट का वार्षिक प्रकाशन।
- बड़े दानों और पूंजीगत परियोजनाओं की सार्वजनिक निविदा और पारदर्शी खरीद प्रणाली।
यदि तिरुपति पांच हजार करोड़ रुपये से अधिक का बजट आधुनिक वित्तीय प्रणाली से संचालित कर सकता है, यदि वैष्णो देवी बोर्ड तीर्थ सुविधाओं और सामाजिक अवसंरचना पर दान का व्यवस्थित उपयोग कर सकता है, यदि एसजीपीसी शिक्षा, स्वास्थ्य और विश्व के सबसे बड़े सामुदायिक लंगर का संचालन संस्थागत अनुशासन से कर सकती है, तो देश के सभी बड़े धार्मिक संस्थानों चाहे वे मंदिर हों, मस्जिदें, गुरुद्वारे, चर्च या दरगाहें, के लिए भी समान स्तर की पारदर्शिता स्थापित की जा सकती है।
यह किसी धर्म पर प्रश्न नहीं है।
यह श्रद्धालु के अधिकार का प्रश्न है।
दान देने वाला व्यक्ति भगवान से हिसाब नहीं मांगता, लेकिन संस्था से पारदर्शिता की अपेक्षा अवश्य करता है।
भारतीय लोकतंत्र में धार्मिक स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण है धार्मिक संस्थाओं की सार्वजनिक जवाबदेही। आस्था को संरक्षण की आवश्यकता नहीं; उसे ईमानदार प्रबंधन की आवश्यकता है। क्योंकि अंततः मंदिरों, गुरुद्वारों, मस्जिदों और चर्चों की सबसे बड़ी संपत्ति उनका स्वर्ण भंडार नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास है। और विश्वास तभी स्थायी रहता है, जब उसके साथ पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक प्रशासन भी जुड़ा हो।
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