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दूसरा पहलू: आगरा के शाही दरबार और कालीन का कमाल
Mon, 06 Jul 2026 07:36 AM IST
अमन तिवारी
भूपेंद्र कुमार
भूपेंद्र कुमार
Published by: अमन तिवारी
Updated Mon, 06 Jul 2026 07:36 AM IST
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कालीन
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अमर उजाला
विस्तार
यह तो सभी जानते हैं कि आज कालीन या गलीचों की जो कला हम देखते हैं, उसका विकास फारस में हुआ। लेकिन भारत में यह शिल्प मुगल काल में उत्कर्ष पर पहुंचा और पूरी दुनिया में अपना अलग मुकाम बनाया। दुनिया को कालीन मध्य एशिया की सौगात है व प्राचीन फारस (आधुनिक ईरान) को इसका जन्मदाता माना जाता है। इतिहासकार कालीन की समृद्ध परंपरा को पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व की मानते हैं। आगरा के कालीन विशेषज्ञ हरि कृष्ण वट्टल ने कई साल पहले पुरातत्व समिति की बैठक में कहा था कि हाथ से तैयार सबसे प्राचीन कालीन साइबेरिया के अलताई पहाड़ों के उत्तर में स्थित पेजीरिक कस्बे की एक कब्र से मिला था। इस इलाके में तापमान शून्य से नीचे रहता है इसलिए यह सही हालत में था।इसे वर्ष 1949 में खोजा गया था, तब विशेषज्ञों का आकलन था कि ये कला इससे कम से कम 500 साल पुरानी जरूर रही होगी। पूर्वी तुर्किस्तान में तीसरी से छठी शताब्दी तक कालीन बुनने की कला का पता चलता है। यह कला धीरे-धीरे लगभग पूरे मध्य एशिया में अपनाई जाने लगी। भारत में कालीनों को लाने का श्रेय मुगल बादशाह अकबर को जाता है। 16वीं सदी में अकबर (1542-1605) के नवरत्न और आइन-ए-अकबरी के लेखक अबुल फजल ने लिखा है, शहंशाह ने कालीन अलग-अलग रंग के और इतने शानदार बनवाए हैं कि ईरान-तूरान के कारीगर भला इनका क्या मुकाबला करेंगे। आगरा में इन कालीनों को जहां तैयार किया जाता, उन्हें कारखाने कहा जाता था।
इन कारखानों में फारस के पारंगत कलाकार स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे। यहीं से फारसी डिजाइन व भारतीय कारीगरी का मेल हुआ। गलीचे व कालीन का फर्क बारीक है। गलीचा फर्श के एक हिस्से को ढकता है और मोटा होता है, वहीं कालीन पूरे फर्श को ढकता है। फारस के नायाब कारीगर अपनी कला का माफिक दाम मिलने की वजह से आगरा में आकर बस गए। यहीं से आगरा में कालीन तैयार करने की समृद्ध परंपरा की शुरुआत हुई। ब्रिटिश काल में आगरा के कालीनों का नाम पूरे यूरोप में लिया जाने लगा। इसे आगरा रग (कालीन) नाम दिया गया। यानी आगरा में तैयार कालीन। अंग्रेजों ने आगरा सेंट्रल जेल में बंदियों को कालीन बनाने का प्रशिक्षण दिया। यहां के कालीन इतने प्रसिद्ध हुए कि उसे क्वीन विक्टोरिया को भेंट किया गया। ये कालीन के कारीगरों का कमाल ही है कि आज भी यह समृद्ध परंपरा जीवित है।