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तीजन बाई: जिनके लिए पंडवानी ही बनी जीवन की सबसे बड़ी मुक्ति
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स्मृति शेष तीजन बाई
- फोटो :
ANI
विस्तार
तीजन बाई का जन्मगांव इस्पात नगरी भिलाई से करीब ही है। जीरोमाइल से 14 किलोमीटर दूर गनियारी को अब भिलाई में ही मानिए। पिता चुनुक लाल। मां सुखमती। पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ीं। जाति की पारधी। उस अंत्यज समाज कीं, जो मूलत: राजपूत समाज से संबद्ध होने के बावजूद जनजातियों में परिगणित है और आखेट तथा पक्षियों को पकड़ने के लिए जानी जाती है। पारधी अब घुमंतू जनजाति है। वे झाड़ू-चटाई, टोकरी आदि अच्छी बना लेते हैं। विडंबना देखिए कि जब जात-बाहर विवाह के कारण तीजन पारधी-समाज से निष्कासित हुईं, तो यही पेशा गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर जीवनयापन में उनके काम आया, मगर यह स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं रही। कला ने उन्हें दो जून की रोटी दी, नौकरी दी, सम्मान और प्रतिष्ठा दी और उन्हें उस पायदान पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां तक पहुंचना विपन्न पारधियों के लिए ख्वाब में भी दूभर था। तीजन को पंडवानी विरासत में मिली। मातृकुल से। उसके नाना बृजलाल पारधी पंडवानी कहते थे। बालपन में तीजन ने नाना से पंडवानी सुनी और वह उन्हें कंठस्थ हो गई। तेरह की वय में समीपवर्ती गांव चंदखुरी में उन्हें पहली बार पंडवानी गायन का मौका मिला। दक्षिणा या चढ़ावे में मिले दस रुपये उनकी पहली कमाई थी। भगवान श्रीकृष्ण में तीजन की अटूट भक्ति थी। जीवन कष्टों से बिंधा था। पहले पति से अलग हुईं। दूसरा पति जालिम निकला। वह अक्सर उनकी पिटाई करता था। तीजन ने पीड़ा-प्रताड़ना सही, लेकिन पंडवानी नहीं छोड़ी। पंडवानी में ही उनकी मुक्ति थी, पीड़ा से भी, दैन्य से भी, वर्जनाओं से भी। पंडवानी ही उन्हें स्याह बोगदे के बाहर उस ठौर ले गई, जहां खुली हवा थी, रोशनी थी और उन्हें सराहती हुई एक बड़ी दुनिया थी। कला कोई भी हो, वह तैयारी या रियाज मांगती है। तीजन ने अपने को तैयार किया, मांजा या परिष्कृत किया और सबसे बढ़कर उसे नवाचारित भी किया। सबलसिंह चौहान की छत्तीसगढ़ी महाभारत कंठस्थ करने के बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से विधिवत प्रशिक्षण लिया। पंडवानी पुरुषों के वर्चस्व का क्षेत्र था। बैठकर वाचन की वेदमती शैली उनके उपयुक्त थी, लेकिन तीजन ने इसकी विलोम कापालिक शैली चुनी। अब देखें, तो लगता है कि तीजन का चयन सही था। कापालिक शैली में खड़े-खड़े ‘महाभारत’ गाई जाती थी। तबला, खड़ताल, ढोलक, मंजीरा, हार्मोनियम जैसे इने-गिने वाद्य। साथ में तंबूरा। तंबूरे से वह कईं प्रयोजन साधती थीं। तीजन वाचिक को आंगिक अभिनय से निखार देती थीं। माहौल के मुताबिक शब्द चयन में थोड़ा हेरफेर। वह गायन, नृत्य, प्रलाप, वादन, संवाद और अभिनय से अपना ‘डोमेन’ रचतीं और दर्शकों को बांध लेती थीं।तीजन को अनपढ़ होने का मलाल नहीं था। उनके तईं सब प्रभु की माया है। 80 के दशक में उन पर रंगकर्मी हबीब तनवीर की निगाह पड़ी। कला-गुरु को कलासाधिका की प्रतिभा चीन्हते देर न लगी। वह भारत महोत्सव में गईं। दिल्ली में इंदिरा गांधी के सम्मुख उन्होंने पंडवानी प्रस्तुत की। उन्हें जगह-जगह से न्यौता मिला। दिशाएं गौण हो गईं। वह फ्रांस, जर्मनी, मॉरीशस, तुर्किये, रोमानिया, बांग्लादेश और स्विट्जरलैंड गईं ही, माल्टा, ट्यूनीशिया और साइप्रस भी हो आईं। तीजन ने कहा था-‘मैं पढ़ी होती, तो शायद पंडवानी गायिका नहीं बनती। बहुत दुख झेले, लेकिन सरस्वती मैया की कृपा कि पंडवानी मेरी जिंदगी हो गई। सब उसी का दिया है।’ तीजनबाई की कहानी न केवल लोककला की शक्ति को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कोई भी सीमा पार की जा सकती है।