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बजट 2026 पर एक नजरिया : क्या बदलेगा, किसे राहत, किस पर असर?

SANJAY PANDEY संजय पांडे
Updated Sun, 01 Feb 2026 06:16 PM IST
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सार

यह बजट भविष्य का है। हर क्षेत्र में की गई घोषणाओं का असर आने वाले एक से डेढ़ दशक में दिखाई देगा। सरकार ने बुनियादी क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए एक ठोस बजट देने की कोशिश की है। 

Budget Estimates 2026-27 interesting facts and important points in hindi
बजट 2026: कहां मौका, कहां धोखा? - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बजट 2026 सरकार के अनुसार विकसित भारत 2047 की आर्थिक नींव मजबूत करने पर केंद्रित है। इसमें तत्काल नकद राहत की बजाय औद्योगिक क्षमता, अवसंरचना, रोजगार-योग्यता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने पर जोर दिया गया है। सार्वजनिक पूंजी व्यय, निर्यात-उन्मुख उद्योगों, सेवा क्षेत्र और कर प्रशासन सुधारों को एक साथ आगे बढ़ाया गया है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यह बजट मांग बढ़ाने से अधिक आपूर्ति-पक्ष सुधारों पर आधारित है, जिससे मध्यम अवधि में स्थिर विकास का लक्ष्य रखा गया है।

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दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी टैरिफ, सख्त नियम और वैश्विक संरक्षणवाद के चलते भारत के वस्त्र निर्यात, खासकर रेडीमेड गारमेंट्स और होम टेक्सटाइल्स, पर दबाव बढ़ा था। बजट में आधुनिक-पारंपरिक टेक्सटाइल क्लस्टरों का विस्तार, चैलेंज मोड में मेगा टेक्सटाइल पार्क और महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल के जरिए इस दबाव से निपटने की रणनीति सामने आई है।
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आईसीआरआईईआर के वरिष्ठ अर्थशास्त्री बताते हैं-

बजट का फोकस टैरिफ के असर को सीधे सब्सिडी से नहीं, बल्कि लागत घटाने, गुणवत्ता सुधारने और ब्रांड वैल्यू बढ़ाने के जरिए संतुलित करने पर है। इससे भारतीय टेक्सटाइल उत्पाद कीमत के बजाय मानक, गुणवत्ता और ब्रांड पहचान के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे।


वैश्विक व्यापार तनाव का असर टेक्सटाइल तक सीमित नहीं रहा। चमड़ा, समुद्री उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी सेवाएं और कुछ खनिज-आधारित उद्योग भी प्रभावित हुए। बजट 2026 में चमड़ा और सिंथेटिक फुटवियर निर्यात के लिए कर-मुक्त इनपुट का दायरा बढ़ाया गया है, सी-फूड प्रोसेसिंग में प्रयुक्त विशेष घटकों पर शुल्क राहत दी गई है और आईटी सेवाओं के लिए सेफ हार्बर नियमों को सरल बनाया गया है। एफआईसीसीआई से जुड़े निर्यात विशेषज्ञों के अनुसार ये कदम निर्यात लागत घटाकर भारतीय उद्योगों को वैश्विक सप्लाई चेन में दोबारा प्रतिस्पर्धी बनाने की कोशिश हैं।


सरकार ने अवसंरचना और तकनीकी उन्नयन के जरिए 200 लीगेसी औद्योगिक समूहों के पुनरुद्धार का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ एमएसएमई को चैंपियन के रूप में विकसित करने के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का एसएमई ग्रोथ फंड और 2 हजार करोड़ रुपये के आत्मनिर्भर भारत फंड को जारी रखा गया है। उद्योग नीति विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव एमएसएमई को केवल छोटे उद्यम की श्रेणी में सीमित रखने के बजाय उन्हें स्केल-अप और निर्यात-योग्य इकाइयों में बदलने की दिशा में है।


वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सार्वजनिक पूंजी व्यय को 12.2 लाख करोड़ रुपए तक बढ़ाया गया है। इसके साथ इंफ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड, नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, 20 राष्ट्रीय जलमार्ग, तटीय कार्गो प्रोमोशन स्कीम और सी-प्लेन कनेक्टिविटी की घोषणा की गई है।लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञों के अनुसार इन कदमों से परिवहन लागत घटेगी, जिससे उद्योग और उपभोक्ता दोनों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।


बजट 2026 में ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता को एक साथ साधने की कोशिश की गई है। कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण यानी सीसीयूएस तकनीकों के लिए 20 हजार करोड़ रुपए का आवंटन, बैटरी, सोलर ग्लास, महत्वपूर्ण खनिज और न्यूक्लियर पावर परियोजनाओं को शुल्क राहत इसका संकेत हैं। ऊर्जा नीति विश्लेषकों के अनुसार, यह भारत को व्यावहारिक ग्रीन ट्रांजिशन की ओर ले जाने वाला बजट है, जिसमें बेस-लोड पावर को नजरअंदाज नहीं किया गया है। शहर आर्थिक क्षेत्रों के लिए 5 हजार करोड़ रुपए और सात हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर का प्रस्ताव दर्शाता है कि सरकार शहरी क्लस्टरों को आर्थिक वृद्धि का अगला इंजन मान रही है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, इससे बड़े शहरों के आसपास रोजगार, आवास और सेवाओं के नए केंद्र विकसित होंगे।

शिक्षा से रोजगार एवं उद्यम’ स्थायी समिति, विश्वविद्यालय टाउनशिप, एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर लैब और सेवा क्षेत्र पर फोकस युवाओं को कौशल-आधारित कार्यबल के रूप में तैयार करने की नीति दिखाते हैं। नीति आयोग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार, यह बजट युवाओं को पारंपरिक सरकारी या कॉर्पोरेट नौकरियों से आगे बढ़ाकर हेल्थ-केयर, क्रिएटिव इकोनॉमी और सर्विस सेक्टर में अवसर देने की तैयारी है। औद्योगिक और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के पास विश्वविद्यालय टाउनशिप, प्रत्येक जिले में महिला छात्रावास और व्यावहारिक प्रशिक्षण पर जोर छात्रों की रोजगार-योग्यता बढ़ाने की दिशा में है। शिक्षा नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे डिग्री और नौकरी के बीच की संरचनात्मक खाई कुछ हद तक कम हो सकती है।

महिला छात्रावासों की स्थापना, स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं में बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण, और खादी-हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों को मजबूती देने के कदम महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने पर केंद्रित हैं। आईएलओ से जुड़े जेंडर इकॉनमी विशेषज्ञों के अनुसार बजट महिलाओं को केवल कल्याण योजनाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि उत्पादक कार्यबल के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता है।


कितना और क्या मिला किसानों को?

बजट में किसानों की आय बढ़ाने का फोकस पारंपरिक समर्थन योजनाओं से आगे बढ़कर उच्च मूल्य कृषि और बाजार से सीधे जुड़ाव पर रखा गया है। मत्स्य पालन, पशुपालन, अमृत सरोवरों और जलाशयों के एकीकृत विकास के साथ-साथ नारियल, काजू, कोको, अगर, बादाम और अखरोट जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को लक्षित समर्थन दिया गया है। सरकार ने वर्ष 2030 तक भारतीय काजू और कोको को प्रीमियम वैश्विक ब्रांड बनाने के लिए समर्पित कार्यक्रम का भी प्रस्ताव रखा है। इसके साथ भारत-विस्तार के रूप में बहुभाषीय एआई आधारित एग्री प्लेटफॉर्म को एग्रीस्टैक और आईसीएआर पैकेज के साथ जोड़ने की घोषणा खेती को डेटा-ड्रिवन बनाने की दिशा में अहम कदम है। कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार, इस बजट का उद्देश्य किसानों की आय उपज बढ़ाकर नहीं, बल्कि प्रति इकाई मूल्य बढ़ाकर बढ़ाना है। इससे मध्यम अवधि में किसानों की नकद आय में स्थिर और टिकाऊ वृद्धि दिखाई दे सकती है।

बजट 2026 में रक्षा क्षेत्र के लिए सीधा संदेश यह है कि भारत अब आयात-निर्भर सुरक्षा ढांचे से बाहर निकलकर घरेलू विनिर्माण और रखरखाव क्षमता को मजबूत करना चाहता है। असैनिक, प्रशिक्षण और अन्य विमानों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कलपुर्जों पर मूलभूत सीमा शुल्क में छूट तथा रक्षा इकाइयों द्वारा रख-रखाव, मरम्मत और ओवरहॉल के लिए आवश्यक कच्चे माल के आयात पर शुल्क राहत इसी रणनीति का हिस्सा है। रक्षा मामलों के जानकारों के अनुसार इन प्रावधानों से घरेलू रक्षा उद्योग की लागत घटेगी और निजी कंपनियों को रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में आने का अवसर मिलेगा। इसका दीर्घकालिक असर यह होगा कि भारत केवल हथियारों का उपभोक्ता नहीं, बल्कि रक्षा प्लेटफॉर्म, पुर्जों और सेवाओं का निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा, जिससे रणनीतिक आत्मनिर्भरता मजबूत होगी।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में बार-बार आ रहे व्यवधानों को देखते हुए बजट 2026 में निर्यात और लॉजिस्टिक्स को संरचनात्मक रूप से मजबूत करने पर स्पष्ट जोर दिया गया है। बजट में सार्वजनिक पूंजी व्यय को 12.2 लाख करोड़ रुपए तक बढ़ाकर परिवहन, भंडारण और मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी को प्राथमिकता दी गई है। नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, अगले पांच वर्षों में 20 राष्ट्रीय जलमार्ग, तटीय कार्गो प्रोमोशन स्कीम और सी-प्लेन कनेक्टिविटी जैसे उपाय लॉजिस्टिक्स लागत घटाने और माल की आवाजाही को तेज करने के लिए किए गए हैं। निर्यात को सीधे समर्थन देने के लिए टेक्सटाइल, चमड़ा, समुद्री उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सेवाओं में शुल्क और कर सरलीकरण किया गया है।

ई-कॉमर्स के जरिए निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कूरियर निर्यात की 10 लाख रुपये प्रति खेप की सीमा को पूरी तरह हटाया गया है, जिससे छोटे व्यवसायों, कारीगरों और स्टार्टअप को वैश्विक बाजारों तक सीधी पहुंच मिलेगी। सीमा-शुल्क प्रक्रियाओं में एआई आधारित जोखिम आकलन, गैर-हस्तक्षेपकारी स्कैनिंग और एकल डिजिटल विंडो की घोषणा से बंदरगाहों पर समय और लागत दोनों घटने की उम्मीद है।

व्यापार विशेषज्ञों और लॉजिस्टिक्स विश्लेषकों के अनुसार, बजट 2026 निर्यात को अल्पकालिक प्रोत्साहन देने के बजाय पूरी सप्लाई चेन को अधिक भरोसेमंद, तेज और लागत-प्रतिस्पर्धी बनाने की रणनीति अपनाता है। इसका दीर्घकालिक असर यह हो सकता है कि वैश्विक अस्थिरता के दौर में भी भारत एक स्थिर सप्लाई पार्टनर के रूप में उभरे और निर्यात-आधारित वृद्धि को बनाए रख सके।
 

बजट 2026 में सबसे अधिक जोर चार क्षेत्रों पर साफ तौर पर दिखाई देता है। अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स, निर्यात-उन्मुख उद्योग, सेवा क्षेत्र आधारित रोजगार और ऊर्जा सुरक्षा। 12.2 लाख करोड़ रुपये का सार्वजनिक पूंजी व्यय, नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, राष्ट्रीय जलमार्ग और तटीय परिवहन योजनाएं लॉजिस्टिक्स लागत घटाने पर केंद्रित हैं। वस्त्र, चमड़ा, समुद्री उत्पाद और आईटी सेवाओं के लिए दिए गए कर और शुल्क सुधार निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का संकेत देते हैं। इसके साथ सेवा क्षेत्र, शिक्षा-से-रोजगार पहल, हेल्थ-केयर और क्रिएटिव इकोनॉमी पर फोकस यह दर्शाता है कि सरकार रोजगार सृजन को केवल विनिर्माण तक सीमित नहीं रखना चाहती।


अर्थशास्त्रियों के अनुसार, इन क्षेत्रों पर जोर का दीर्घकालिक असर यह होगा कि भारत की वृद्धि दर अधिक स्थिर होगी, रोजगार के अवसर विविध होंगे और अर्थव्यवस्था वैश्विक झटकों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक लचीली बनेगी। नया आयकर अधिनियम, सरल कर फॉर्म, टीडीएस- टीसीएस का तार्किककरण, मुकदमेबाजी में कमी और आसान सीमा-शुल्क प्रक्रियाएं आम आदमी के लिए जीवन की सुगमता बढ़ाने वाले कदम हैं। कर विशेषज्ञों के अनुसार इन सुधारों से अनुपालन आसान होगा और करदाता पर प्रशासनिक दबाव कम पड़ेगा।

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक बजट 2026 का असर तुरंत नकद लाभ के रूप में नहीं, बल्कि बेहतर कनेक्टिविटी, रोजगार अवसर, कम लॉजिस्टिक्स लागत और स्थिर आय वृद्धि के रूप में सामने आएगा। पूर्व आरबीआई अधिकारियों का मानना है कि यह बजट खपत-आधारित राहत की बजाय आय-सृजन आधारित विकास पर भरोसा करता है, जिसका लाभ मध्यम और निम्न आय वर्ग को समय के साथ मिलेगा। विशेषज्ञों की राय में बजट 2026 एक दिशा-निर्देशक और संरचनात्मक बजट है। यह वैश्विक टैरिफ दबाव, घरेलू रोजगार की जरूरत और 2047 के विकसित भारत लक्ष्य को एक साथ साधने की कोशिश करता है। यह बजट तात्कालिक राहत से अधिक भविष्य की अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत करने पर केंद्रित है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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