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बजट 2026-27 और राज्यों की माली हालत, क्या हम श्रीलंका के रास्ते पर हैं?

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sun, 01 Feb 2026 06:17 PM IST
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सार

विपक्ष का आरोप है कि वित्तमंत्री राज्यों की बदहाली पर मौन हैं, लेकिन बजट के प्रावधान एक मौन सुधार की ओर इशारा करते हैं। केंद्र ने राज्यों के लिए उधारी की सीमा को बिजली क्षेत्र में सुधार और पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) से जोड़ दिया है।

Union Budget 2026 Fiscal Deficit And Rising State Debt Know Challanges And Crisis
यूनियन बजट 2026 - फोटो : ANI
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विस्तार
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केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट केवल केंद्र सरकार की तिजोरी का हिसाब-किताब नहीं, अपितु यह राज्यों के लिए एक वित्तीय अनुशासन का रिपोर्ट कार्ड भी है। बजट में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.3 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखकर केंद्र सरकार ने अपनी वित्तीय सेहत सुधारने की प्रतिबद्धता तो दोहराई है, लेकिन इस चमक के पीछे राज्यों के बढ़ते कर्ज की परछाईं गहरी होती जा रही है।

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अक्सर राजनीतिक गलियारों में यह डर फैलाया जाता है कि भारत भी श्रीलंका की तरह दिवालिया होने की कगार पर है, लेकिन आंकड़ों की गहराई में उतरें तो यह तुलना बेमानी लगती है। श्रीलंका का संकट मुख्य रूप से विदेशी कर्ज और विदेशी मुद्रा की कमी का था। जहां श्रीलंका के पास अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए दो बिलियन डॉलर भी नहीं बचे थे, वहीं भारत आज 710 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के विशाल सुरक्षा कवच पर बैठा है।
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सबसे महत्वपूर्ण अंतर कर्ज के स्वरूप में है। श्रीलंका का आधे से अधिक कर्ज डॉलर में था, जिसे चुकाने के लिए उसे बाहरी मदद की जरूरत थी। इसके विपरीत, भारत का 95 प्रतिशत सरकारी कर्ज रुपए में है, जो घरेलू बैंकों और संस्थानों से लिया गया है। भारत की अर्थव्यवस्था 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि श्रीलंका संकट के समय वह -7 प्रतिशत के पाताल में थी।

Union Budget 2026 Fiscal Deficit And Rising State Debt Know Challanges And Crisis
यूनियन बजट 2026 - फोटो : ANI

भले ही केंद्र मजबूत स्थिति में हो, लेकिन कुछ राज्यों की वित्तीय स्थिति लालबत्ती की चेतावनी दे रही है। वित्त मंत्री ने राज्यों को करों में 41 प्रतिशत की हिस्सेदारी जारी रखी है और 2 लाख करोड़ रुपए का ब्याज-मुक्त ऋण दिया है, लेकिन कुछ राज्यों के लिए यह मरहम नाकाफी साबित हो रहा है। पंजाब और केरल जैसे राज्यों का कर्ज-जीएसडीपी अनुपात क्रमशः 45 प्रतिशत और 37 प्रतिशत के खतरनाक स्तर को छू रहा है।

इसका सीधा मतलब यह है कि ये राज्य अपनी कुल कमाई का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों के बजाय पुराने कर्जों का केवल ब्याज चुकाने में खर्च कर रहे हैं। इस मामले में पश्चिम बंगाल (34 प्रतिशत) और उत्तर प्रदेश (32 प्रतिशत) भी इस सूची में पीछे नहीं हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश ने अपने खर्च का बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर पर मोड़ा है।

विपक्ष का आरोप है कि वित्तमंत्री राज्यों की बदहाली पर मौन हैं, लेकिन बजट के प्रावधान एक मौन सुधार की ओर इशारा करते हैं। केंद्र ने राज्यों के लिए उधारी की सीमा को बिजली क्षेत्र में सुधार और पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) से जोड़ दिया है। सरल शब्दों में, केंद्र अब राज्यों को रेवड़ियां बांटने के लिए पैसा नहीं देगा, बल्कि स्कूल, अस्पताल और सड़कों जैसी संपत्ति बनाने के लिए निवेश उपलब्ध कराएगा।

बजट 2026 का स्पष्ट संदेश है कि कर्ज लेना बुरा नहीं है। बशर्ते वह उपभोग के बजाय उत्पादन के लिए हो। भारत के श्रीलंका बनने का खतरा नहीं है, क्योंकि हमारे पास विदेशी मुद्रा का भंडार और राजकोषीय अनुशासन की नीतियां हैं, लेकिन राज्यों के लिए यह वेक-अप कॉल है। यदि उन्होंने समय रहते मुफ्त योजनाओं की राजनीति और कर्ज के बढ़ते बोझ के बीच संतुलन नहीं बनाया तो विकास की रफ्तार कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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