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एफसीआरए संशोधन विधेयक: विदेशी चंदे पर नियंत्रण या संस्थाओं की स्वायत्तता पर नया सवाल?
सार
विदेशी फंड से बनी संस्थाओं की संपत्तियों पर प्रस्तावित नियंत्रण ने बहस को और तीखा कर दिया है। सरकार इसे सुरक्षा और पारदर्शिता की जरूरत बता रही है, जबकि विपक्ष स्वायत्तता पर सवाल उठा रहा है। असली सवाल है-विदेशी चंदे पर पहरा हो, लेकिन सरकारी शक्ति की सीमा कौन तय करेगा?
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एफसीआरए विधेयक पर सुप्रिया सुले ने उठाए सवाल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
विदेशी चंदे का मामला भारत में हमेशा संवेदनशील रहा है। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन भारत की राजनीति, सामाजिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने का माध्यम नहीं बनना चाहिए। दूसरी तरफ हजारों सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक और जनकल्याणकारी संस्थाएं विदेशी सहयोग के जरिए वर्षों से काम कर रही हैं।
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इसीलिए जब विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2026 संसद में आता है, तो बहस सिर्फ विदेशी चंदे की निगरानी तक सीमित नहीं रहती। सवाल यह भी उठता है कि विदेशी फंडिंग लेने वाली संस्थाओं पर सरकार का नियंत्रण कितना हो और उस नियंत्रण की सीमा कहां तक हो।
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25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया यह विधेयक अभी लंबित है। सरकार इसे आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष और कुछ प्रभावित संगठनों ने इसके कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं।
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असली विवाद आखिर है क्या?
विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा उन संस्थाओं की संपत्तियों से जुड़ा है जिनका एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, संस्था खुद पंजीकरण वापस कर देती है या उसका नवीनीकरण नहीं हो पाता। प्रस्तावित व्यवस्था में ऐसी स्थिति में विदेशी योगदान से जुड़ी संपत्तियों और धन के प्रबंधन के लिए नामित प्राधिकारी की भूमिका तय की गई है।
यहीं से बहस शुरू होती है। मान लीजिए किसी संस्था ने विदेशी सहयोग से वर्षों में स्कूल, अस्पताल, छात्रावास या कोई सामाजिक सेवा केंद्र बनाया। बाद में उसका एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो गया या नवीनीकरण नहीं हुआ। तब उस संपत्ति के भविष्य का फैसला किसके हाथ में होगा?
सरकार कहती है कि ऐसी संपत्तियों को अनिश्चितकाल तक ऐसी संस्था के नियंत्रण में नहीं छोड़ा जा सकता जिसका एफसीआरए दर्जा समाप्त हो चुका है। लेकिन आलोचकों का सवाल है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई के आधार पर किसी संस्था की वर्षों में बनाई गई संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना उचित प्रक्रिया के पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ किया जाएगा?
क्या यह सीधे-सीधे संपत्ति जब्त करने का कानून है?
इस सवाल का जवाब थोड़ा जटिल है। विधेयक को केवल "संपत्ति जब्ती" के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। प्रस्तावित व्यवस्था में संपत्ति के अस्थायी नियंत्रण और उसके बाद की प्रक्रिया का प्रावधान है। कुछ परिस्थितियों में यदि संस्था अपना पंजीकरण बहाल या नवीनीकृत करा लेती है, तो संपत्ति अथवा अप्रयुक्त धन की वापसी की व्यवस्था भी हो सकती है।
लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल फिर भी खड़ा होता है-जिस संस्था का प्रमाणपत्र रद्द हुआ है, उसे राहत पाने में कितना समय लगेगा और तब तक उसकी संपत्ति का क्या होगा? किसी संस्था के लिए यह महज कानूनी सवाल नहीं है। उसके पीछे कर्मचारी, लाभार्थी, अस्पताल में इलाज करा रहे मरीज, स्कूल में पढ़ रहे बच्चे और वर्षों से चल रहे सामाजिक कार्यक्रम भी हो सकते हैं।
सरकार का पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं
इस बहस में सरकार की चिंता को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। भारत में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय पारदर्शिता का सवाल है। विदेशी धन का इस्तेमाल यदि राजनीतिक गतिविधियों, धार्मिक ध्रुवीकरण, गैरकानूनी गतिविधियों या देश के हितों के विरुद्ध किया जाता है, तो सरकार के पास कार्रवाई का अधिकार होना ही चाहिए।
एफसीआरए का मूल उद्देश्य भी यही है कि विदेशी योगदान का इस्तेमाल पारदर्शी और कानून के अनुरूप हो। समस्या तब पैदा होती है जब नियमन और नियंत्रण के बीच की सीमा धुंधली होने लगे।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का इस्तेमाल केवल वास्तविक उल्लंघन के खिलाफ हो, न कि वैचारिक या प्रशासनिक असहमति रखने वाली संस्थाओं को दबाने के लिए।
एक दिलचस्प बदलाव: जेल की सजा कम होगी
विधेयक का एक ऐसा पहलू भी है जिसकी चर्चा अपेक्षाकृत कम हो रही है। प्रस्तावित संशोधन में एफसीआरए उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास की सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव है। यानी विधेयक के सभी प्रावधानों को एकतरफा "कठोर" बताना भी सही तस्वीर नहीं होगी।
एक तरफ सरकार को संपत्तियों के संबंध में ज्यादा प्रशासनिक शक्ति देने का प्रस्ताव है, तो दूसरी तरफ कुछ उल्लंघनों में अधिकतम जेल की सजा कम करने की बात की गई है। इसलिए विधेयक का मूल्यांकन पूरे पैकेज के रूप में करना जरूरी है।
चर्च और सामाजिक संस्थाओं में चिंता क्यों?
विदेशी सहयोग लेने वाली संस्थाओं में धार्मिक और सामाजिक संगठन भी शामिल हैं। विशेष रूप से कुछ ईसाई संगठनों ने प्रस्तावित बदलावों को लेकर चिंता जताई है। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया। उन्हें कथित तौर पर आश्वासन दिया गया कि नया प्रावधान retrospective यानी पिछली तारीख से लागू नहीं होगा।
यह आश्वासन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि कानून को पिछली अवधि पर लागू किया जाता, तो पहले से मौजूद संस्थाओं और संपत्तियों पर इसके प्रभाव को लेकर कहीं ज्यादा गंभीर विवाद पैदा हो सकता था। फिर भी भविष्य को लेकर सवाल बाकी है।
यदि किसी संस्था का एफसीआरए प्रमाणपत्र किसी कारण से रद्द होता है तो क्या उसे पर्याप्त समय, सुनवाई और प्रभावी अपील का अधिकार मिलेगा? यही वह सवाल है जिसका स्पष्ट जवाब कानून में जितना मजबूत होगा, विवाद उतना कम होगा।
विपक्ष जीपीसी की मांग क्यों कर रहा है?
विपक्ष का सबसे बड़ा तर्क है कि इतना महत्वपूर्ण विधेयक जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले ने विधेयक को वापस लेने या संयुक्त संसदीय समिति यानी जीपीसी के पास भेजने की मांग की है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी विधेयक पर पुनर्विचार की मांग की है।
JPC की मांग को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में देखना भी सही नहीं होगा। जब किसी कानून का प्रभाव हजारों संस्थाओं, करोड़ों रुपये की विदेशी सहायता और उनसे बनी संपत्तियों पर पड़ सकता है, तो व्यापक संसदीय जांच और हितधारकों से बातचीत लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत ही करती है।
क्या सरकार विधेयक पास करा पाएगी?
सरकार इसे आगे बढ़ाने के मूड में दिखाई देती है। लोकसभा में सरकार के पास पर्याप्त राजनीतिक ताकत होने के कारण वहां विधेयक के आगे बढ़ने की संभावना ज्यादा है। असल राजनीतिक परीक्षा राज्यसभा में और उससे पहले विधेयक पर होने वाली बहस में होगी। सरकार के सामने दो रास्ते हैं पहला, मौजूदा स्वरूप में विधेयक को तेजी से पारित कराने की कोशिश करना। दूसरा, विपक्ष और प्रभावित संगठनों की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए कुछ सुरक्षा प्रावधानों को और स्पष्ट करना।
दूसरा रास्ता सरकार के लिए जरूरी नहीं कि राजनीतिक कमजोरी का संकेत हो। कई बार संवेदनशील कानूनों में व्यापक चर्चा कानून को अधिक टिकाऊ बनाती है। विदेशी चंदे पर निगरानी जरूरी, लेकिन प्रक्रिया भी निष्पक्ष हो। एफसीआरए के मामले में असली बहस "सरकार बनाम एनजीओ" नहीं होनी चाहिए। विदेशी धन का इस्तेमाल पारदर्शी होना चाहिए। देश की सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं हो सकता। किसी संस्था को विदेशी फंडिंग मिलती है तो उसे यह बताना ही होगा कि पैसा कहां से आया और कहां खर्च हुआ।
लेकिन दूसरी तरफ सरकार की शक्ति भी कानून और न्यायपूर्ण प्रक्रिया से बंधी होनी चाहिए।
किसी संस्था का पंजीकरण रद्द करना एक प्रशासनिक फैसला हो सकता है, लेकिन उसके परिणाम कई वर्षों के सामाजिक काम पर पड़ सकते हैं। इसलिए कार्रवाई से पहले सुनवाई, स्पष्ट कारण, समयबद्ध अपील और स्वतंत्र समीक्षा जैसी व्यवस्थाएं जितनी मजबूत होंगी, कानून पर भरोसा उतना ही बढ़ेगा।
असली सवाल विदेशी चंदा नहीं, सरकारी शक्ति की सीमा है
एफसीआरए संशोधन विधेयक को केवल विदेशी चंदे पर नियंत्रण का कानून समझना शायद इस बहस को छोटा कर देना होगा। असल सवाल यह है कि विदेशी धन पर निगरानी रखते हुए नागरिक समाज की वैधानिक स्वायत्तता कैसे बचाई जाए।
सरकार के पास राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जिम्मेदारी है। संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे विदेशी धन का इस्तेमाल घोषित उद्देश्यों और कानून के मुताबिक करें। लेकिन लोकतंत्र में इन दोनों के बीच एक तीसरी चीज सबसे महत्वपूर्ण है-निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया।
यदि विधेयक विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाता है, अवैध गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करता है और साथ ही निर्दोष संस्थाओं को मनमाने प्रशासनिक फैसलों से सुरक्षा देता है, तो यह कानून व्यवस्था को मजबूत कर सकता है।
लेकिन यदि सरकारी शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि किसी संस्था का अस्तित्व और उसकी संपत्ति मुख्यतः प्रशासनिक विवेक पर निर्भर हो जाए, तो फिर सवाल केवल एफसीआरए का नहीं रहेगा। वह सवाल होगा-लोकतंत्र में सरकार की शक्ति की सीमा आखिर कहां तय होती है? और शायद यही इस विधेयक की सबसे बड़ी परीक्षा भी है।
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