बेहतर अनुभव के लिए ऐप चुनें।
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   history of world literature Sach Kahun Toh An Autobiography Book by Neena Gupta

विश्व साहित्य का आकाश: नीना गुप्ता की आत्मकथा- ‘सच कहूं तो’

Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sat, 28 Feb 2026 07:45 PM IST
विज्ञापन
सार

2022 में नीना गुप्ता की आत्मकथा हिन्द पॉकेट बुक्स, पेंगुइन रैंडम हाउस इम्प्रिंट से ‘सच कहू तो’ प्रकाशित हुई। पांच भागों में बंटी, उपसंहार सहित, यह आत्मकथा उनके अतीत की झांकी देती है। 

history of world literature Sach Kahun Toh An Autobiography Book by Neena Gupta
नीना गुप्ता और उनकी आत्मकथा - फोटो : इंस्टाग्राम@neena_gupta
विज्ञापन

विस्तार

‘दर्शक रुपहले परदे पर अपने पसंददीदा कलाकारों को देखता है, उसकी उत्सुकता उनके निजी जीवन में झांकने की होती है। कुछ पत्र-पत्रिकाएं उनके इसी कुतुहल का फायदा उठा कर सच-झूठ का तड़का लगा, चटपटा मसाला परोस, अपना काम चलाते हैं।’

Trending Videos


हमारे यहां सिने-अभिनेत्री की स्क्रीनलाइफ बहुत छोटी होती है, मात्र कुछ वर्षों की। दूसरी ओर एक अभिनेता कभी बूढ़ा नहीं होता है वह सदा युवा दिलफेंक बना रहता है। कुछ वर्षों के बाद अभिनेत्रियां परदे से गायब हो अंधेरों में खो जाती हैं। एकाध वापस लौटती हैं, दूसरी पारी खेलती हैं, और उन्हें दर्शक अपनाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


हां, अब उनकी भूमिका बदली हुई होती है। वे कहानी के केंद्र न होकर परिधि पर होती हैं। विरली अभिनेत्रियां वापस लौटती हैं और अपने अभिनय कौशल के बल पर केंद्रीय भूमिका भी करती हैं, खूब सफल रहती हैं। नीना गुप्ता उनमें से एक हैं।

उन्होंने टीवी, विज्ञापन, फीचर फिल्म सबमें काम किया, खूब लोकप्रिय रहीं। फिर कुछ दिन विवादों से घिरी रहीं, कुछ दिन परदे से गायब रहीं। फिर लौटी, परदे पर केंद्र में लौटीं। उनकी नाटक में प्रशिक्षित होने के बाद, कुछ नाटक करने के बाद पहली फिल्म जिसमें उन्हें काम करने का ऑफर मिला, वह ‘आधारशिला’ थी।

1987 में श्याम बेनेगल की ‘सुष्मन’ की फैशनेबल मंदिरा, ‘उत्सव’ की मंदोलिका, ‘जाने भी दो यारों’ की प्रिया, ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ की सत्ती,“मंडी’ की वसंती, ‘गांधी’ की आभा, ‘वो छोकरी’ की मिसेज गीता देवी, तमाम फिल्मों में महत्वपूर्ण होते हुए भी शायद ही कभी केंद्र में रहीं। 146 टीवी एवं फीचर फिल्मों में काम करने वाली, एक फिल्म लेखन तथा 5 फिल्म निर्देशित करने वाली नीना गुप्ता अपनी दूसरी पारी में नायिका बन कर उभरीं।

1999 के बाद वे सक्रिय रहीं पर परदे पर कम। फिर ‘मुल्क’ में बड़ी तबस्सुम, ‘म्युजिक टीचर’ की माधवी, या फिर टीवी और ‘पंचायत’ सीरियल सबमें वे चमकीं। म्यूजिक वीडियो किए, ‘83’ में कपिल की मां बनीं। बेटी मबासा केलिए परदे पर आईं। ‘बधाई हो बधाई’, ‘वध’, ‘द लास्ट कलर’, ‘पंगा’, ‘शुरुआत का ट्विस्ट’, ‘ऊंचाई’, ‘मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे’, ‘मस्त में रहने का’, ‘वध’ आदि में दूसरी पारी उन्होंने खेली और खूब सफल रहीं। इनमें से कई फिल्मों में वे केंद्रिय पात्र हैं।

वे फिर से स्वीकृत हुई क्योंकि उन्होंने अपनी उम्र को स्वीकारा और उसके अनुकूल अपनी प्रतिभा दिखाई। ‘बधाई हो’ तथा ‘द लास्ट कलर’ की बात वे अपनी आत्मकथा में विस्तार से बताती हैं। वे उन चीजों के कुछ बारीक लेकिन चुनिंदा विवरणों को पाठकों से साझा करती हैं, जिनके बातों के बारे में लोगों को, उनके दर्शकों को, केवल ऊपर-ऊपर की जानकारी है। सस्ती पत्रकारिता के कारण केवल चटखारेदार बातें पता हैं, नीना गुप्ता आत्मकथा लिख, उन जालों को साफ करती हैं।

आत्मकथा लिखने, न लिखने को लेकर संकोच, द्विविधा, लोगों का उन्हें इसे लिखने का इसरार आदि का ‘भूमिका’ में थोड़ी-सी झलक देती हैं। कोविड के दौरान 2020 में वे मुक्तेश्वर में थीं। वहां इसे लिखने को लेकर उन्हें सोचने-विचारने का खूब अवसर मिला। यहीं रहते हुए उन्हें लगा, लोगों को मीडिया ने मेरे बारे अच्छा-बुरा बहुत बताया है, क्यों न मैं स्वयं अपने जीवन को लोगों से साझा करूं?

यहीं वे लिखती हैं, ‘यह भी सोचा कि मेरे अंदर जो गुबार भरा हुआ है, चाहे उसने मुझे स्ट्रांग बनाया या वीक बनाया, उससे मैं हल्की हो जाऊं, शायद मुझे बैटर फील हो?’ सो लिखने का पक्का मन बना, और नतीजा हुआ, ‘सच कहूं तो’।

आत्मकथा- ‘सच कहूं तो’

2022 में उनकी आत्मकथा हिन्द पॉकेट बुक्स,पेंगुइन रैंडम हाउस इम्प्रिंट से ‘सच कहू तो’ प्रकाशित हुई। पांच भागों में बंटी, उपसंहार सहित, यह आत्मकथा उनके अतीत की झांकी देती है। अक्सर आत्मकथा में आत्मश्लाघा का खतरा रहता है। मगर नीना गुप्ता ने बड़ी ईमानदारी बरती है। जो पाठक इसमें उनके और वीवियन रिचर्ड्स के रिश्तों से जुड़ी चटकारेदार बातें खोजेंगे, उन्हें निराशा होंगे।

उन्होंने अपने इस संबंध को बहुत गरिमापूर्ण तरीके से व्यक्त किया है। क्रिकेट के पीछे दीवानी उस समय के वेस्ट इंडीज क्रिकेट टीम के कप्तान से कैसे मिली, इसे वे एक लंबे खंड ‘मै वीवियन्से कैसे मिली’ में खूब विस्तार से लिखती हैं। और इस संबंध को लेकर फैली अफवाहों का गुब्बारा फुस करती हैं।

शादी बिना मां बनने का फैसला और सिंगल मदर के रूप में बच्चा पालना आसान नहीं है। बच्चा गर्भ में आने और उसके जन्म तक का उनका जीवन विभिन्न भावनाओं से गुजरता है। मगर यह सब उन्होंने किया, कुछ लोग साथ थे। खासकार उनके पिता हरदम उनके साथ रहे। पर असली ताकत उनके मन का विश्वास एवं दृढ़ता थी। पाठक को बहुत सकून मिलता है, जब वे वीवियन को नीना का संग-सहारा देते पढ़ता है।

कई फोटो वीवियन उनके और बच्ची के साथ दिखाई देते हैं। नीना के जितने फोटो बच्ची मसाबा के साथ हैं, उनके चेहरे पर मातृत्व का सुकून और गर्व देखा जा सकता है। आत्मकथा में वे अपनी सफलता-असफलता सब कुछ स्वीकारती चलती हैं। ‘सच कहूं तो’ में  नीना गुप्ता का संघर्ष दीखता है और इस बिन्दास स्त्री की उपलब्धियों को पढ़ कर प्रेरणा मिलती है।

भाषा-संपादन में सुधार की गुंजाइश

इस आत्मकथा की भाषा को थोड़े-से कसाव की जरूरत है, तनिक संपादन इसे और खूबसूरत बना देता। दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त, वे किसी फिल्मी या साहित्यिक परिवार से नहीं आती हैं, अत: इसमें शक नहीं, सिने-संसार में ऐसे व्यक्ति केलिए स्थान बनाना आसान नहीं रहा होगा।

करोल बाग की यह दृढ़ लड़की शिक्षा ग्रहण करती है, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रशिक्षित होती है, फिल्मों प्रवेश करती है। अपना रास्ता स्वयं बनाती चलती है। सरल-सहज शब्दों में वे अपनी कहानी पाठकों से साझा करती हैं। भाषा से लगता है, वे कहानी लिख नहीं रहीं, सुना रही हैं। इसे पढ़ना रोचक है। करीब 300 पन्नों की इस किताब में ढेर सारे सादे और रंगीन फोटो, कुछ रेखांकन इसे आकर्षक बनाने हैं।



---------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed