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इरफान खान: मद्धिम-सी आवाज का गंभीर कलाकार

Yduvansh Pranay यदुवंश प्रणय
Updated Wed, 29 Apr 2020 06:30 PM IST
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Irfan khan, an actor who known for his eyes, voice tone, specialty and perfection in Acting
इरफान खान ने अभिनेता के प्रचलित मान्यताओं को तोड़कर खुद की जगह बनाई
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इरफान खान, अदाकारी की दुनिया में नाम भर ले लेने से ही जिसका संपूर्ण अभिनय हमारी आंखों के सामने आ जाता हो, एक ऐसा अदाकार जिसने अपनी काबिलियत से एक अलग तरह के चरित्रों को जीवंत किया और हिंदी सिनेमा में अभिनय की परंपरा को नया आयाम दिया। इरफान हमेशा से संजीदा फिल्मों के कलाकार रहे थे। उनके प्रति उनके चाहने वालों में यह धारणा थी कि वह जिस फिल्म में काम कर रहे हैं वह निश्चय ही संजीदा फिल्म होगी, अपने चुनाव और अभिनय के द्वारा लगातार उन्होंने इस तथ्य को और पुख्ता ही किया था। 

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हिंदी सिनेमा का एक ऐसा दौर जब अभिनेता के द्वारा ही अकेले फिल्म को प्रचलित कर ले जाने का चलन बढ़ गया था और इसमें उसका स्टारडम महत्वपूर्ण होता था, उस समय में इरफान खान ने अभिनेता के प्रचलित मान्यताओं को तोड़कर खुद की जगह बनाई। वह हमेशा अपनी फिल्मों के चयन को लेकर भी बहुत बेहतर दिखाई दिए। उनकी अधिकांश फिल्में सामाजिकता के गंभीर प्रश्न पर ही आधारित रहीं। 
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साल 1988 में मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे में एक कैमियो पात्र के अभिनय से रुपहले पर्दे पर शुरुआत करने से पहले इरफान ने चाणक्य, चंद्रकांता और भारत एक खोज जैसे धारावाहिक में अपने पात्र को जीवंत किया। द वॉरियर और मकबूल के बाद उनका अपना दर्शक वर्ग बन गया। हालांकि लगातार एक जैसी फिल्मों से वे निराश भी हो रहे थे लेकिन 'पान सिंह तोमर' के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। यह फिल्म अपने विषय और इरफान के अभिनय के आधार पर ही एक सफल फिल्म के रूप में देखी गई जिसके कारण ही इरफान को इस फिल्म के लिए ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला। 

अपने चेहरे को लेकर संघर्ष करने वाले इरफान ने बाद में चलकर इस चेहरे और अपनी शारीरिक भाषा को ही अभिनय का सशक्त माध्यम बना लिया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय की जो शिक्षा इन्होंने प्राप्त की उसका प्रयोग फिल्मों में बखूबी देखा जा सकता है। 

इरफान हमेशा से फिल्मों में सहजता के लिए जाने जाते हैं। उनके अभिनय में किसी भी व्यवहार की सहज प्रस्तुति व आवाज की गंभीरता मिलकर बेहतरीन बनाती थी। चमक-दमक और ज्यादा बजट वाली फिल्मों से अलग रुपहले पर्दे को उन्होंने कुछ ऐसी फिल्में दी जिनको शांत बैठकर मद्धिम सी आवाज में देखने की आदत लगाई जा सकती हैं। वह अपने अभिनय में ज्यादा शोर नहीं करते बल्कि बड़ी से बड़ी बात बहुत धीमे से और असरदार तरीके से कहने की ताकत रखते हैं। यहां तक कि कॉमेडी फिल्मों में भी अपने चेहरे के भाव और कहन के तरीके से उन्होंने हिंदी फिल्मों के वर्तमान दौर में कॉमेडी का सहज रूप भी दिखाया। 

अभिनय के संदर्भ में अधिकांश हमेशा से मुख्य और सकारात्मक भूमिका निभाने की कोशिश करते रहते हैं। यह चाहत होना अलग बात है और धारणा बना लेना उससे बहुत ही अलग है। हो सकता है कि इरफान की भी ऐसी चाहत रही होगी लेकिन उन्होंने कभी ऐसी धारणा नहीं बनाई। और इसी कारण वे सकारात्मक, नकारात्मक और सहयोगी भूमिकाओं में भी पूरी ताकत के साथ देखे जाते रहे।

इन सभी प्रकार की भूमिकाओं में वह हमेशा अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश करते हैं। फिल्म पीकू में वह अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण के सामने थे और वह जब भी पर्दे पर आए तो कहीं भी इन पात्रों से कमजोर नहीं लगे। उनके चहेते उनकी खामोशी, मुस्कुराहट, आंखों और अपने तरह की इकलौती आवाज में मद्धिम सी कहने की अदाकारी के कारण उन्हें हमेशा याद रखेंगे। 



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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