यादों में इरफान: दरिया भी मैं, दरख्त भी मैं, झेलम भी मैं, चिनार भी मैं, दैर भी हूं, हरम भी हूं, मैं था, मैं हूं, मैं रहूंगा
डेथ और शिट किसी को, कहीं भी, कभी भी आ सकती है। वाकई, इरफान खान ने इस लाइन को पीकू फिल्म में बोला था। इरफान ने दुनिया को अलविदा कह दिया। वो कैंसर से लड़ रहे थे। कितना भारी है न ये 'हैं' का 'थे' हो जाना। इरफान की वो गोल आंखें, जो पर्दे पर जादू बिखेर जाया करती थीं, उनकी पलकों ने उसे हमेशा के लिए बंद कर दिया।
इरफान की पहली छाप मेरे दिमाग में एक टीवी एड के कारण पड़ी। शायद साल 2005-06 का था, वो एक टेलिकॉम कंपनी का प्रचार किया करते थे। उस कुछ सेकेंड के टीवी एड ने बड़ी-बड़ी आंखों वाले इरफान के तरफ मुझे खींचा था।
इसके बाद धीरे-धीरे कुछ जाना, फिर एक फिल्म देखी हासिल। इरफान ने अपनी एक्टिंग से इस फिल्म में कहर बरपा दिया था। कुर्ता पहने रणविजय सिंह का किरदार और इलाहाबादी जबान ने उनकी झोली में फिल्मफेयर पुरस्कार तक डाल दिया।
इरफान को मैंने दूरदर्शन वाले धारावाहिकों में नहीं देखा, हमने उन्हें सिल्वर स्क्रीन पर बस कुछ लाइनों से छा जाते हुए देखा है। किसी भी फिल्म के दृश्य में इरफान सिर्फ अपने साथ जबरदस्त अभिनय ही नहीं लेकर आते, वो लेकर आते थे, थोड़ा सुकून और थोड़ी बेपरवाही। जिसे देखकर स्क्रीन के सामने बैठा दर्शक एक लंबी सांस लेता और फिल्म में रम जाता। इरफान अपने किरदार से हर उस इंसान के भीतर उतर जाते, जो उस फिल्म में खुद को तलाश रहा होता।
हासिल के रणविजय सिंह से लेकर पान सिंह तोमर के 'बागी' इरफान के अंदर से खुरदुरापन नहीं गया। उनकी बेतरतीबी हर एक किरदार में झलक ही जाती। इरफान के भीतर ये आखिरी तक रहा। इसी खुलेपन ने उन्हें लोगों के दिलों में बैठा दिया। इरफान के ठेठ पने ने ये साबित किया कि वो हमारे ही बीच का है और हमारी ही बात कर रहा है।
इरफान ने कैंसर के इलाज के दौरान मीडिया को एक चिट्ठी लिखी थी। इरफान ने लिखा था कि अभी तक अपने सफर में मैं तेज-मंद गति से चलता चला जा रहा था, मेरे साथ मेरी योजनाएं, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं। मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर ठोका और कहा, ’आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं।’ मेरी समझ में नहीं आया, न न, मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है। जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टॉप पर उतरना होगा, आपका गंतव्य आ गया…।’
जिंदगी को आखिरी कश तक जिया
सभी की मौत तय है, वैसे ही इरफान की भी तय थी। एक दिन किसी अवॉर्ड शो में इरफान पहुंचे थे। किसी बड़ी अभिनेत्री से हाथ मिलाते वक्त उसे इरफान के मुंह से सिगरेट की गंध आ गई। अभिनेत्री ने कहा, इरफान, तुम सिगरेट पीना अब कम कर दो। इरफान ने कहा कि मैडम, मैं आजकल सिगरेट के फ्लेवर वाला डियो लगाता हूं।
इरफान की मौत पर लोग कह रहे हैं कि इतनी जल्दी भला कोई जाता है क्या? लेकिन जाने का समय कौन सा होता है, यह कोई तय नहीं ही कर सकता। वक्त-बे वक्त सभी को जाना है। इरफान तो आज के दौर के सबसे बड़े अदाकार थे। उन्हें देखकर ना जाने कितने किरदार लिखे गए।
इरफान उस दरख्त की तरह हैं, जिन्हें हम रेल की खिड़कियों से गुजरते हुए देखते हैं, लेकिन वो वहीं स्थिर रहते हैं। इरफान भी हमेशा अपनी अमिट अदाकारी से हमारे बीच रहेंगे। इरफान ने जिंदगी को आखिरी कश तक जिया है।
हैदर में इरफान ने बेपरवाही का लिबास ओढे, लेकिन ताकतवर अंदाज में खुद को लाफानी बताते हुए कहा था, दरिया भी मैं, दरख्त भी मैं, झेलम भी मैं, चिनार भी मैं, दैर भी हूं, हरम भी हूं, मैं था, मैं हूं, मैं रहूंगा।
आर्टिस्ट आदमी हो, तुमको याद रखेंगे गुरु हम...ये लाइन इरफान ने एक रंगमंच के पीछे से निकलते हुए 'हासिल' में आसमानी रंग के कुर्ते और गर्दन में गमछा लपेटे बोला था, जिसके बाद से इरफान कल्ट बनकर उभरा था।
खैर, हमारे साथी हैं उन्होंने आज लिखा, 'मौत की खबरें कम ही खारिज होती हैं..! तो सीटी बज गई है और रंगमंच का पर्दा गिर चुका है, लेकिन इस रंगमंच के बचे हुए रंग अब भी हमें खुद के भीतर सारोबोर करने के लिए काफी हैं। इसलिए तालियां बजती रहनी चाहिए।
अलविदा इरफान...