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गंजेपन को समाज ने इतनी बड़ी समस्या बना दिया कि आतंकी भी जिहादी मकसद भूल गया!
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सार
आज के समय में गंजापन तेजी से युवाओं को अपनी चपेट में ले रहा है। पहले जहां यह समस्या उम्र के साथ जुड़ी मानी जाती थी, वहीं अब 20 30 वर्ष के युवा भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।
भारत में जिहाद के मकसद से आया पाकिस्तान का लश्कर ए तैयबा का आतंकी अपना मकसद भूलकर बाल उगवाने में व्य
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
भारत और पाकिस्तान जैसे समाजों में बाहरी रूप रंग का महत्व केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं है, अपितु यह सामाजिक स्वीकार्यता, आत्मविश्वास और यहां तक कि व्यक्ति की पहचान से जुड़ जाता है। खासकर पुरुषों के संदर्भ में घने बालों को युवावस्था, आकर्षण और पौरुष का प्रतीक माना जाता रहा है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति गंजेपन की ओर बढ़ता है तो यह केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं रह जाती, यह एक गहरा मनोवैज्ञानिक आघात बन जाती है।
गंजापन, जिसे मेडिकल भाषा में अलोपेसिया कहा जाता है, आनुवंशिक या हार्मोनल कारणों से होता है, लेकिन इसका असर केवल सिर तक सीमित नहीं रहता। यह व्यक्ति के आत्मसम्मान, उसके व्यवहार, उसके रिश्तों और उसकी मानसिक स्थिति को गहराई से प्रभावित करता है।
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यही कारण है कि आज गंजापन केवल एक शारीरिक समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक और मानसिक संकट बनता जा रहा है। गंजा होने की पीड़ा का अनुमान इस बात यह लगा सकते हैं कि भारत में जिहाद के मकसद से आया पाकिस्तान का लश्कर ए तैयबा का आतंकी अपना मकसद भूलकर बाल उगवाने में व्यस्त हो गया।
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आज के समय में गंजापन तेजी से युवाओं को अपनी चपेट में ले रहा है। पहले जहां यह समस्या उम्र के साथ जुड़ी मानी जाती थी, वहीं अब 20 30 वर्ष के युवा भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।
तनावपूर्ण जीवनशैली, प्रदूषण, अनियमित खान पान, नींद की कमी और रासायनिक उत्पादों का बढ़ता उपयोग इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। यह स्थिति केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह समाज की मानसिक संरचना को भी प्रभावित कर रही है, क्योंकि इसके साथ जुड़ा हुआ आत्मसम्मान का संकट कहीं अधिक गहरा है।
आज का युवा एक ऐसे दौर में जी रहा है, जहां सोशल मीडिया ने सौंदर्य के मानकों को और कठोर बना दिया है। हर कोई खुद को एक आदर्श छवि में प्रस्तुत करना चाहता है। ऐसे में असमय गंजापन युवाओं के लिए एक मानसिक झटका बन जाता है। बाल झड़ते ही कई युवा अपने आत्मविश्वास में गिरावट महसूस करते हैं।
वे सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगते हैं, फोटो खिंचवाने से बचते हैं और धीरे धीरे सामाजिक जीवन से कटने लगते हैं। यह स्थिति उनके करियर पर भी असर डालती है। इंटरव्यू के दौरान आत्मविश्वास की कमी, खुद को कमतर समझना, ये सभी बातें उनके प्रदर्शन को प्रभावित करती हैं।
गंजापन केवल युवाओं की समस्या नहीं है। अधेड़ और विवाहित पुरुष भी इससे गहराई से प्रभावित होते हैं। हमारे समाज में किसी के रूप रंग पर टिप्पणी करना सामान्य बात मानी जाती है। ‘गंजा’, ‘टकला’ जैसे शब्द अक्सर मजाक में कहे जाते हैं, लेकिन यह मजाक कई बार किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाता है।
बालों को पौरुष और आकर्षण से जोड़कर देखने की सोच के कारण कई पुरुष खुद को कमतर महसूस करने लगते हैं। यह उन्हें या तो चिड़चिड़ा बना देता है या फिर पूरी तरह चुप और अलग थलग।
गंजेपन की समस्या ने एक बड़ा बाजार तैयार कर दिया है। हेयर ट्रांसप्लांट, दवाइयां, तेल और विभिन्न उपचार तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। हालांकि, इनमें से कुछ उपचार वैज्ञानिक रूप से सही हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोग बिना सही जानकारी के गलत विकल्प चुन लेते हैं।
कई बार लोग सस्ते और अवैज्ञानिक उपचारों के चक्कर में अपनी सेहत को जोखिम में डाल देते हैं। यह दिखाता है कि समस्या केवल बालों की नहीं है, बल्कि उस मानसिक दबाव की है जो व्यक्ति को किसी भी हद तक जाने के लिए मजबूर कर देता है।
भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पकड़े गए पाकिस्तान के लश्कर ए तैयबा के आतंकी मोहम्मद उस्मान जट्ट उर्फ चाइनीज का मामला इस मानसिक संकट की चरम स्थिति को सामने लाता है।
यह आतंकी भारत में एक बड़े हमले की साजिश के साथ आया था, लेकिन भारत आने के बाद उसका ध्यान अपने जिहादी मिशन से हटकर पूरी तरह अपने गंजेपन पर केंद्रित हो गया।
आतंकी लंबे समय से अपने बाल झड़ने की समस्या से बेहद परेशान था और इससे गहरे अवसाद में चला गया था। वह अपने लुक को लेकर इतना असहज था कि उसने हमले की योजना बनाने के बजाय अपना अधिकतर समय इंटरनेट पर बाल उगाने के उपाय खोजने में बिताया।
अपने पास मौजूद पैसे का बड़ा हिस्सा हेयर ट्रीटमेंट, दवाइयों और तेलों पर खर्च कर दिया। सुरक्षा एजेंसियों भी आश्चर्यचकित हैं कि जो कट्टरपंथी विचारधारा के साथ आया था, वह अपनी आत्म छवि के संकट में उलझकर अपने ही उद्देश्य को भूल गया।
यह घटना भले ही असामान्य लगे, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि आत्मसम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता का संकट व्यक्ति की सोच और प्राथमिकताओं को किस हद तक बदल सकता है।
दरअसल, गंजेपन की पूरी समस्या की जड़ हमारे सामाजिक दृष्टिकोण में छिपी है। हमने बाहरी रूप रंग को इतना महत्व दे दिया है कि व्यक्ति के गुण और उसकी योग्यता पीछे छूट जाते हैं।
गंजेपन को एक सामान्य जैविक स्थिति के रूप में स्वीकार करने के बजाय हम उसे एक कमी के रूप में देखते हैं। यही सोच व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर करती है। क्या किसी व्यक्ति की पहचान उसके बालों से तय होनी चाहिए? क्या हम उसके व्यक्तित्व को उसके बाहरी रूप से आंक सकते हैं?
ये सवाल केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक सोच से जुड़े हैं। गंजापन कोई दोष नहीं है। यह एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है, जो किसी भी व्यक्ति के साथ हो सकती है, लेकिन इसे लेकर समाज की सोच ने इसे एक मानसिक संकट में बदल दिया है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।