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यूपी से बाल श्रमदान की बहस के मायने: बच्चे मन के सच्चे...

Hari Verma हरि वर्मा
Updated Mon, 18 May 2026 06:36 PM IST
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सार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाल श्रम दान को लेकर ताजा बयान से एक नई बहस छेड़ दी है । छुई-मुई न बनाने की अपील कर उनका बच्चों को आत्मनिर्भर व अनुशासित बनाने पर जोर है । बाल श्रम के मामले में अव्वल यूपी के मुखिया के इस आह्वान के खास मायने हैं । 2027 तक यूपी को बाल श्रम मुक्त बनाने का लक्ष्य है । संकल्प से सिद्धि का सफर जारी है लेकिन मंजिल अभी दूर है।  सरकार के सामने चुनौतियां हैं तो समाज के सामने जिम्मेदारी भी।

UP government  set a target of making the state free from child labour by the year 2027
यूपी को बाल श्रम मुक्त बनाने का लक्ष्य - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बेलाग और बिंदास बयानों के लिए मशहूर हैं। अभी उन्होंने बाल श्रमदान को लेकर ताजा बयान दिया है। अपील की है कि बच्चों को छुई-मुई न बनाएं। उन्हें आत्मनिर्भर, मजबूत और अनुशासित बनाएं। उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों के श्रमदान पर शिक्षकों को दंडित करने के चलन से उबरें और ऐसे शिक्षकों को सम्मानित किया जाए।



सीएम योगी के इस बयान के चाहे जो मायने मतलब निकाले जाएं या इसे बाल श्रम बनाम बाल श्रमदान से जोड़कर नई बहस की शुरुआत मानी जाए लेकिन यह सच है कि बाल मजदूरी के लिए देश में अव्वल  यूपी को 2027 तक बाल मजदूरी से मुक्त कराने की सरकार के सामने बड़ी चुनौती है ।
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बाल श्रम के जख्म पर मरहम

आंकड़े बताते हैं कि देश में बाल मजदूरी का ज्यादा कोढ़ उत्तर प्रदेश में है। इसकी बड़ी वजहआर्थिक व सामाजिक है। यूपी सरकार ने प्रदेश को बाल मजदूरी के मकड़जाल से निकालने का बीड़ा उठा रखा है। गरीबी व बाल मजदूरी की वजह से काफी हद तक बचपन स्कूलों तक पहुंच नहीं पाता। आर्थिक कमजोर तबके के बच्चे यदि यूपी में जैसे-तैसे स्कूल तक पहुंच भी जाते हैं, तो उनका ड्राप आउट दर काफी ज्यादा है। इसे कम करने के लिए राज्य सरकार ने मुफ्त यूनिफॉर्म, जूते, बस्ते से लेकर बाल श्रमिक विद्या योजना तक चला रखी है।
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बच्चों को मुफ्त जूते, यूनिफॉर्म (ड्रेस) देने का प्रावधान तो है ही, साथ ही बाल श्रमिक विद्या योजना में लड़कों को सालाना 12 हजार और लड़कियों को 14 हजार रुपये आर्थिक मदद दी जाती है। इसका असर यह हुआ कि ड्रॉप आउट दर 17 फीसदी से घटकर अब करीब 3 फीसदी पर सिमट गई है।

एक आंकड़े के मुताबिक, शिक्षा के अधिकार के तहत राज्य में 19 लाख बच्चों के दाखिले के लक्ष्य के विरुद्ध करीब 15 लाख बच्चों के दाखिले हो पाए हैं । शिक्षा की बुनियाद को मजबूत करने की मंशा से अनुदेशकों और शिक्षा मित्रों का मानदेय लगभग दोगुना कर दिया गया है। 2011-12 में अनुदेशकों का मानदेय 7 हजार रुपये था, जो करीब एक दशक बाद (2022 में) महज दो हजार रुपये बढ़कर 9 हजार किया गया।

स्कूल दूरदराज थे। महंगाई में इतनी कम राशि में अनुदेशकों की जीवन की गाड़ी चल पाना कठिन था। अब योगी सरकार ने इसे बढ़ाकर लगभग दोगुना यानी 17 हजार रुपये कर दिया है । बेसिक शिक्षा की बेसिक जरूरत की ओर सरकार का ध्यान स्वागत योग्य है। करीब 20 हजार शिक्षकों-अनुदेशकों की जल्द बहाली की प्रक्रिया शुरू होने वाली है लेकिन पहले से 69 हजार शिक्षकों से जुड़े लंबित मामले के निष्पादन की भी उम्मीद बरकरार है ।

सजगता बनाम समस्या

बाल मजदूरी का आलम यह है कि भले बाल श्रम निषेध कानून के तहत सजा व जुर्माने का प्रावधान है लेकिन अब भी कल-कारखानों या जहां-तहां से बाल श्रमिकों के मुक्त कराने की खबरें आती रहती हैं । यूपी में करीब 9 लाख बाल श्रमिक हैं। यूपी के बाद मध्यप्रदेश और राजस्थान का नंबर आता है। बाल श्रम को लेकर मानवाधिकार से लेकर स्वयंसेवी संस्थाएं, अंतर्राष्ट्रीय विधि संगठन और संयुक्त राष्ट्र तक सजग है।

यह महज संयोग ही है कि बचपन बचाओ आंदोलन से जुड़े कैलाश सत्यार्थी को 2014 में बचपन को लेकर अलख जगाने के लिए पाकिस्तान की मलाला के साथ संयुक्त नोबल पुरस्कार मिला था। अमेरिका की औद्योगिक क्रांति (1820-1870) से शुरु हुआ यह बाल श्रम का खाज आज दुनिया में सबसे ज्यादा नाइजीरिया में है।

चरवाहा बनाम शिक्षक

यूपी से सटे बिहार में भी नब्बे के दशक में लालू प्रसाद ने बाल श्रम रोक कर मासूमों को स्कूल लाकर पढ़ने-पढ़ाने का सपना देखा था। बिहार के मुजफ्फरपुर के तुर्की में पहला चरवाहा विद्यालय खोला जहां गाय-बकरी चराने वाले मासूम पढ़ते थे। उनके प्रोत्साहन के लिए खाने के अलावा एक रुपये मिला करता था । चरवाहा विद्यालय के इस अनूठे प्रयोग की देश ही नहीं
दुनिया भर में खूब चर्चा हुई लेकिन चरवाहा विधालय का यह नायक खुद चारा घोटाले में उलझ गया। चरवाहा विद्यालय की यह योजना बंद हो गई।

उसी तुर्की में बिहार का सरकार टीईटी (बीएड) कॉलेज है, जहां अब भले बकरी चराने वाले मासूम नहीं पढ़ सके लेकिन उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक आज भी तैयार होते हैं। देश में गरीब बच्चों के प्रोत्साहन के लिए  मिड डे मील जैसी योजनाएं चलाई जाती हैं, फिर भी बच्चों के ड्रॉप आउट दर में कमी न आना देशव्यापी चिंता का सबब है।

अगले महीने (12 जून को) विश्व बाल श्रम निषेध दिवस है, ऐसे में यूपी से बाल श्रम बनाम बाल श्रम दान का निकला यह ताजा संदेश न केवल प्रदेश के लिए बल्कि देश के लिए खास मायने रखता है। उम्मीद करें कि सरकार चुनौतियों से उबरे और हम मिलकर सामाजिक जिम्मेदारी निभाएं क्योंकि बच्चे मन के सच्चे....।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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