अलविदा श्रीमती माथुर: राजेंद्र माथुर जी को लेकर कई यादें और अधूरे वादे रहे जो पूरे न हो सके
- आज जब वे खामोशी की नींद में हैं तो मेरे सामने यादों की फिल्म चल रही है।
- साहिर के बहुत सारे गीत उन्हें याद थे। अमृता प्रीतम उनकी प्रिय लेखिकाओं में से एक थीं। अफसोस! मैं उन्हें दिया गया यह वादा पूरा नहीं कर सका ।
विस्तार
कुछ समय पहले ही उनसे बात हुई थी। वे चाहती थीं कि राजेंद्र माथुर जी का बचपन अपने मामा जी के जिस घर में बीता था, वहां हजारों किताबें थीं। पंद्रह-सोलह बरस की उमर में उन्होंने सारी किताबें घोंटकर पी ली थीं। आंटी यानी श्रीमती माथुर की बड़ी इच्छा थी कि यह सारी किताबें भोपाल के सप्रे संग्रहालय को भेंट कर दी जाएं और वहां राजेंद्र माथुर दीर्घा बनाई जाए।
सप्रे संग्रहालय के संस्थापक संयोजक विजय दत्त श्रीधर इसके लिए तैयार भी थे। एक बार उन्होंने इस सिलसिले में बात की थी, फिर आंटी ने मुंबई में रह रहे माथुर जी के मामाजी के परिवार वालों से मेरी बात कराई। सब कुछ ठीक चल रहा था कि वे अपने आखिरी सफर पर चली गईं, उनकी इच्छा अधूरी रह गई ।
बीते दिनों जब मैं उनसे मिलने गया था तो उन्होंने बताया था कि माथुर जी और वे 1955 के आसपास पुणे के यरवदा जेल गए थे,जहां गांधी जी ने अंतिम कारावास काटा था, लौटकर माथुर जी ने एक छोटी किताब लिखी थी: महात्मा गांधी का आख़िरी कारावास। आंटी चाहती थीं कि अगर कहीं यह किताब मिले तो उसका पुनः प्रकाशन किया जाए ।
मैंने उनसे वादा किया कि शीघ्र ही मैं उस किताब को खोज निकालूंगा। इसके बाद मैं जिन-जिन शहरों में जाता, वहां के पुस्तकालयों और गांधी भवनों में किताब को खोजता। दो साल भटकता रहा, आखिरकार मुझे एक पुस्तकालय में यह मिल गई। मैंने उनको व्हाट्स अप पर इसके मुख पृष्ठ की फोटो भेजी।वे एकदम बच्चों की तरह प्रसन्न हो गईं।
हम लोगों ने तय किया कि माथुर जी ने महात्मा गांधी पर जितने आलेख लिखे हैं, उनको शामिल करके एक बड़ी किताब प्रकाशित की जाए। मैंने प्रवासी प्रेम पब्लिकेशंस के मालिक और लेखक पंकज चतुर्वेदी से बात की । पंकज भी तुरंत तैयार हो गए। इरादा था कि इस बरस चार छह महीने में यह किताब ले आएंगे।पर, उनकी यह इच्छा भी अधूरी रह गई।
इच्छा जो पूरी न हो सकी...
अलबत्ता उनकी एक इच्छा मैं पूरी कर सका था। नई दुनिया के 1965 के दीवाली अंक में माथुर जी ने कश्मीर पर एक विस्तृत खोजी आलेख लिखा था।यह लगभग पूरे टैबलॉयड आकार के करीब पंद्रह पन्नों में था। यह कहीं उपलब्ध नहीं था। नई दुनिया की लाइब्रेरी तो पहले ही स्वर्गवासी हो चुकी थी। मैं उस अंक की खोज में जुट गया ।
लगभग छह महीने बाद मैने उसे सप्रे संग्रहालय में डॉक्टर मंगला अनुजा के सहयोग से खोज लिया। संग्रहालय का नियम है कि ऐसे आलेख दिए नहीं जाते, इसलिए मैने मोबाइल पर उसके फोटो खींचे और एक टाइपिस्ट से अनुरोध किया कि वह इस फोटो से टाइप कर दे ।
इस तरह मेरी पुस्तक सदी का संपादक राजेंद्र माथुर में कोई 30 पन्नों में यह दुर्लभ दस्तावेज शामिल हो गया ।आंटी बहुत प्रसन्न थीं । इससे पहले मेरी एक अन्य पुस्तक शब्द सितारे में भी माथुर जी पर एक लंबा आलेख भी उन्हें पसंद आया था।
पिछली बार बात हुई तो मैंने उन्हें बताया कि 45 साल पहले के बहुचर्चित छतरपुर पत्रकार उत्पीड़न मामले पर मेरी किताब आने ही वाली है।
इसमें माथुर जी का अनेक बार उल्लेख है। उनके लिखे संपादकीय भी हैं। यह किताब छप गई। मैंने उन्हें सूचित किया तो बोलीं कि अब आओ तो लेते आना ।किताब तो आ गई ,लेकिन मैं मिलने नहीं जा पाया। मैंने सोचा कि मेरी एक और किताब साहिर लुधियानवी के जिंदगीनामे पर आ रही है तो वह भी छप कर आ जाए तो दोनों किताबें एक साथ भेंट कर दूंगा।
साहिर के बहुत सारे गीत उन्हें याद थे। अमृता प्रीतम उनकी प्रिय लेखिकाओं में से एक थीं। अफसोस! मैं उन्हें दिया गया यह वादा पूरा नहीं कर सका ।
आज जब वे खामोशी की नींद में हैं तो मेरे सामने यादों की फिल्म चल रही है। पैंतालीस बरस पहले निपट देहाती और गंवार लड़के राजेश बादल को नई दुनिया में सह संपादक के लिए माथुर जी ने चुन लिया था।
पहले दूसरे दिन ही मुझे कुलदीप नैयर का एक आलेख उन्होंने हिंदी अनुवाद करने के लिए दिया था ।मेरी अंग्रेजी कमजोर थी। माथुर जी ने कहा कि रोज़ मेरे घर आओ तो मैं तुम्हें अंग्रेज़ी पढ़ाऊंगा। मैं सुदामानगर के कमल किराना स्टोर से रोज सुबह किराए की साइकल लेता और ब्रुक बॉन्ड कॉलोनी तक जाता।
वहां माथुर जी मुझे अंग्रेजी पढ़ाते, तब मैं आंटी से डरता था।वे गंभीर और कुछ कुछ रिज़र्व रहती थीं ।वे भी अंग्रेजी की अच्छी प्राध्यापिका रह चुकी थीं। कभी माथुर जी व्यस्त होते तो वे मुझे पढ़ाया करती थीं । क्या आज के जमाने में कोई भरोसा करेगा कि किसी सहयोगी को उसके प्रधान संपादक और उनकी पत्नी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे ।
जब 9 अप्रैल 1991 को माथुर जी अचानक अपनी अनंत यात्रा पर चले गए तो आंटी गुमसुम रहने लगी थीं ।वे गांधी के सिद्धांतों को बहुत मानती थीं।इस लिए गांधी स्मृति जाकर कमज़ोर वर्ग के बच्चों को पढ़ाया करती थीं। लेकिन कुछ समय से यह बंद करना पड़ा था । उसकी कहानी फिर कभी लिखूंगा।
जब 1992 में हमने राजेंद्र माथुर जी के निधन के बाद भोपाल के पत्रकार भवन में स्मृति कार्यक्रम किया तो उसमें वे आई थीं ।उनके अलावा तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मोतीलाल वोरा भी आए थे। उस कार्यकम में वे काफी भावुक हो गई थीं ।
उन्होंने कहा था," राजेश मुझे अब ऐसे कार्यक्रमों में मत बुलाया करो"। मैंने फिर कभी उनसे आग्रह नहीं किया। लेकिन 2009 में जब मैंने माथुर जी पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई तो इसका पहला प्रदर्शन इंदौर के प्रेस क्लब में हुआ था।इसमें भी वे आ गई थीं। उन्हें फिल्म बहुत पसंद आई थी।
इस कार्यक्रम में भी उन्होंने कहा था कि माथुर जी की स्मृति में होने वाले आयोजनों में मत बुलाया करो । मैं खुद को संभाल नहीं पाती।इसके बाद मैंने उनसे कभी अनुरोध नहीं किया । दिल्ली प्रवास में वर्षों तक उनसे मुलाकातें होती रहीं ।
दुःख की घड़ी है । क्या कहूं ।शाम को जब बिटिया मेहा का फोन आया तो एक बारगी यक़ीन नहीं हुआ ।लेकिन सच तो सच है ।मैं उनमें राजेंद्र माथुर जी की छवि देखता था ।अब कौन मुझे राजेंद्र माथुर जी से जोड़कर रखेगा ?
आंटी, अलविदा ! माथुर जी भी आपके आसपास कहीं होंगे। मेरा अंतिम प्रणाम।
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