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जीवन धारा: सत्य खोज की एक निरंतर यात्रा है, भय के बजाय समझ को चुनने का सूत्र अपनाएं

मिशेल फूको Published by: Jyoti Bhaskar Updated Thu, 14 May 2026 11:15 AM IST
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सार

जिज्ञासा हमें सिखाती है कि सत्य कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि खोज की निरंतर यात्रा है। जब हम प्रश्न करते हैं, तो केवल उत्तर नहीं खोजते, बल्कि अपने सोचने के ढंग को भी पुनर्गठित करते हैं। यह मनुष्य को जीवंत बनाती है।

Stream of Life continuous journey of seeking truth embrace principle of choosing understanding over fear
इंसान को पहचानना चाहिए जीवन का परम उद्देश्य (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी
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विस्तार

जिज्ञासा मन में चिंता और संवेदनशीलता को जन्म देती है; यह हमें उन चीजों के प्रति सजग बनाती है, जो हमारे आसपास विद्यमान हैं। यह हमें तैयार करती है कि हम अपने चारों ओर फैली हुई दुनिया में अजीब और अद्वितीय को पहचान सकें; वह हमें एक तरह की बेचैनी देती है, जो हमारी जानी-पहचानी आदतों को तोड़ती है और उन्हीं चीजों को नए नजरिये से देखने की क्षमता देती है। यह उस उत्कंठा को भी जन्म देती है, जिससे हम यह समझना चाहते हैं कि क्या घट रहा है और क्या गुजर रहा है। जिज्ञासा हमें परंपरागत रूप से ‘महत्वपूर्ण’ और ‘अनिवार्य’ कही जाने वाली चीजों के प्रति थोड़ी उदासीनता भी सिखाती है, ताकि हम उन सीमाओं के पार जाकर सोच सकें, जिन्हें समाज ने हमारे लिए निर्धारित कर दिया है।

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मैं एक नए जिज्ञासा-युग का स्वप्न देखता हूं, जहां प्रश्न पूछना ही सबसे बड़ा साहस हो, और हर व्यक्ति अपने भीतर उठते सवालों को दबाने के बजाय उन्हें खुलकर जी सके। हमारे पास तकनीकी साधन हैं, हमारी इच्छाएं भी जीवित हैं, और जानने योग्य विषय अनंत हैं। फिर भी हम पीड़ा क्यों सहते हैं? इसलिए कि हमारे पास पर्याप्त रास्ते नहीं हैं; हमारे संवाद के माध्यम संकुचित हैं, सीमित हैं, और अक्सर कुछ हाथों में सिमट कर रह जाते हैं। समस्या ‘गलत’ जानकारी से नहीं है, बल्कि उन रास्तों की कमी से है, जिनके माध्यम से विचार स्वतंत्र रूप से प्रवाहित हो सकें। यदि हम हर उस चीज से डरेंगे, जो हमें अपरिचित लगती है, तो हम कभी भी नए ज्ञान तक नहीं पहुंच पाएंगे। इसलिए जरूरत इस बात की नहीं है कि हम ‘बुरी’ जानकारी को रोकने के लिए दीवारें खड़ी करें, बल्कि यह है कि हम रास्तों को बढ़ाएं, संवाद के नए आयाम खोलें, और आने-जाने की संभावनाओं को विस्तार दें। जिज्ञासा का अर्थ केवल जानना नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने के लिए तैयार होना भी है।
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जिज्ञासा हमें यह सिखाती है कि सत्य कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि खोज की एक निरंतर यात्रा है। जब हम प्रश्न करते हैं, तो हम केवल उत्तर नहीं खोजते, बल्कि अपने सोचने के ढंग को भी पुनर्गठित करते हैं। यही वह प्रक्रिया है, जो मनुष्य को जीवंत बनाती है। एक समाज जो जिज्ञासा को महत्व देता है, वह ठहराव से मुक्त होता है; वह निरंतर परिवर्तनशील रहता है और अपने भीतर नई संभावनाओं को जन्म देता है। इसलिए, जिज्ञासा को संदेह की नजर से देखने के बजाय उसे अपनाना चाहिए। यह वह शक्ति है, जो हमें सीमाओं से परे ले जाती है, जो हमें अपनी दुनिया को नए अर्थ देने की क्षमता प्रदान करती है। जब हम जिज्ञासु होते हैं, तो हम केवल दुनिया को नहीं, बल्कि स्वयं को भी नए रूप में गढ़ते हैं। यही वह भावना है, जो हमें आगे बढ़ाती है, जो हमें जीवित और जागरूक बनाए रखती है, और जो अंततः हमें एक अधिक खुला, व्यापक और मानवीय समाज बनाने की दिशा में प्रेरित करती है।
         
सूत्र-भय के बजाय समझ को चुनें
जिज्ञासा हमें अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर दुनिया को नए दृष्टिकोण से देखने, परंपराओं को प्रश्नों की रोशनी में परखने, ज्ञान के हर स्रोत को अपनाने, भय के बजाय समझ को चुनने, और निरंतर बदलते सत्य की खोज में स्वयं को विकसित करने की प्रेरणा देती है, जिससे हम एक अधिक खुला, संवेदनशील और मानवीय समाज रचने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।

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