राज की बात: शिक्षा का वैचारिक सपना और बिखरता भरोसा
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सन् 2014 में सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक घटना नहीं थी। यह उस लंबे वैचारिक संघर्ष का परिणाम भी माना गया जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी दशकों से उठाते रहे थे। संघ परिवार लगातार यह आरोप लगाता रहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था पर औपनिवेशिक और वामपंथी सोच का गहरा प्रभाव है। इतिहास लेखन से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक भारतीयता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवादी दृष्टि को कमजोर करने का विमर्श लगातार खड़ा किया गया। ऐसे में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो सबसे अधिक उम्मीदें शिक्षा क्षेत्र से ही थीं।
वैचारिक पुनर्निर्माण और नेतृत्व की कसौटी
यह माना गया कि अब शिक्षा केवल डिग्री वितरण का माध्यम नहीं रहेगी, बल्कि भारत के वैचारिक पुनर्निर्माण का आधार बनेगी। अपेक्षा थी कि विश्वविद्यालयों को राजनीतिक संघर्ष के केंद्र से निकालकर शोध और नवाचार की प्रयोगशाला बनाया जाएगा। भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा को नया सम्मान मिलेगा। परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाया जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण यह कि शिक्षा मंत्रालय को ऐसा नेतृत्व मिलेगा जो वैचारिक दृढ़ता के साथ बौद्धिक विश्वसनीयता भी रखता हो। अब 12 वर्षों के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या सरकार शिक्षा क्षेत्र में वह संस्थागत और बौद्धिक नेतृत्व दे पाई जिसकी उससे अपेक्षा की गई थी। विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र को वैचारिक पुनर्जागरण का केंद्र बनाया गया, वहीं सरकार कोई ऐसा सर्वमान्य बौद्धिक चेहरा खड़ा नहीं कर सकी जिसकी विद्वता को विरोधी भी स्वीकार करते।
अतीत की तुलना और वर्तमान का टकराव
इससे पहले भाजपा या एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में डॉ. मुरली मनोहर जोशी शिक्षा और संस्कृति विमर्श का मजबूत चेहरा थे। उनके समय में भी पाठ्यक्रमों और इतिहास लेखन को लेकर तीखे विवाद हुए, लेकिन उनकी बौद्धिक साख निर्विवाद थी। वे सार्वजनिक मंचों पर बहस करते थे। तर्क देते थे और आलोचनाओं का उत्तर वैचारिक भाषा में देते थे। असहमति के बावजूद उन्हें गंभीरता से लिया जाता था।
इसके उलट 2014 के बाद स्मृति ईरानी के कार्यकाल में रोहित वेमुला प्रकरण, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय विवाद और भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान आंदोलन जैसे मुद्दों ने विश्वविद्यालय परिसरों को अकादमिक बहस से ज्यादा राजनीतिक टकराव का केंद्र बना दिया। इसके बाद मंत्री बदलते रहे, लेकिन शिक्षा क्षेत्र में कोई ऐसा व्यापक बौद्धिक विमर्श विकसित नहीं हो पाया जो सरकार की वैचारिक परियोजना को गंभीर अकादमिक आधार देता।
नई शिक्षा नीति और धरातल की चुनौतियां
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में नई शिक्षा नीति एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आई। बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास मातृभाषा पर बल और त्रिभाषा सूत्र जैसे कई प्रस्ताव लंबे समय बाद गंभीर सुधार की दिशा में दिखाई दिए। दक्षिण भारत में भाषा को लेकर अविश्वास बढ़ा और नीति का विमर्श फिर विवादों में उलझ गया। संवाद और सहमति निर्माण की जगह राजनीतिक ध्रुवीकरण अधिक दिखाई दिया।
सरकार और संघ परिवार अक्सर नालंदा और तक्षशिला के गौरवशाली अतीत का उल्लेख करते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार को वर्तमान के कार्यों से आंका जाता है। अतीतजीवी विमर्श से वर्तमान की चुनौतियों से पार नहीं पाया जा सकता। सच यह है कि वैश्विक विश्वविद्यालयों की सूची में भारत अब भी निर्णायक उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाया। यह केवल सांख्यिकीय विफलता नहीं, बल्कि गहरे संस्थागत संकट का संकेत है। शोध, नवाचार और अकादमिक स्वायत्तता जैसे मानकों पर हमारे संस्थान अब भी संघर्ष कर रहे हैं। जिस समय भारत को ज्ञान अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करना चाहिए था, उसी समय उसका शिक्षा तंत्र परीक्षा माफिया और कोचिंग उद्योग के जाल में उलझता चला गया।
परीक्षा माफिया और गिरता भरोसा
यहीं से सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर हुई। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को पारदर्शी और सुरक्षित परीक्षा प्रणाली के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। दावा था कि अब प्रश्नपत्र लीक, भ्रष्टाचार और धांधली पर स्थायी रोक लगेगी। लेकिन विडंबना यह रही कि वही एजेंसी लगातार सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दी। 2015 के अखिल भारतीय प्री मेडिकल परीक्षा विवाद के बाद सुरक्षित परीक्षा प्रणाली का जो सपना दिखाया गया था, वह 2024 के नीट विवाद और उसके बाद सामने आई गड़बड़ियों के बीच कमजोर पड़ गया।
- अब स्थिति यह है कि हर बड़ी परीक्षा के बाद छात्रों और अभिभावकों के मन में पहला प्रश्न यही उठता है कि प्रश्नपत्र लीक तो नहीं हुआ।
- यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर संकट का संकेत है जिसे योग्यता आधारित मॉडल कहा गया था।
- राजस्थान से लेकर बिहार तक प्रश्नपत्र लीक गिरोहों के तार जिस तरह सामने आए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि शिक्षा माफिया अब एक संगठित समानांतर तंत्र बन चुका है।
युवाओं का संघर्ष और व्यवस्था का मौन
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि सरकार इस सिंडिकेट को तोड़ने में अब तक असफल क्यों रही। जांच एजेंसियों की रिपोर्टों में छपाई श्रृंखला से लेकर हलकर्ता गिरोह, डिजिटल नेटवर्क और अंदरूनी मिलीभगत तक की बातें सामने आती रही हैं। इसके बावजूद कठोर और निर्णायक सुधार दिखाई नहीं देते। कोटा, पटना, दिल्ली और छोटे कस्बों में वर्षों मेहनत करने वाला छात्र अब यह महसूस करने लगा है कि उसकी लड़ाई किताबों से ज्यादा नेटवर्क से है। जब छात्र सड़कों पर थे और उनका भविष्य अनिश्चितता में था तब मंत्रालय का मौन सरकार की साख को और अधिक चोट पहुंचा गया। यही वह मोड़ था जहां मोदी सरकार की लंबे समय से बनी अभेद्य छवि पर सबसे गहरा आघात लगा। आर्थिक निर्णयों या राजनीतिक विवादों से अलग शिक्षा संकट ने सीधे उस मध्यवर्गीय और युवा वर्ग को प्रभावित किया जिसने इस सरकार को सबसे मजबूत समर्थन दिया था।
निष्कर्ष: साख और समाधान
आज का युवा शायद प्रश्न पूछ रहा है कि क्या व्यवस्था उसके साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा कर रही है। इतिहास की पुस्तकों के अध्याय बदलना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उस छात्र का भरोसा वापस लाना अत्यंत कठिन है जिसे लगने लगे कि इस देश में मेहनत से अधिक प्रभाव और प्रबंधन की शक्ति चलती है। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा का विषय नहीं होती। यह किसी राष्ट्र की नैतिक विश्वसनीयता का आधार होती है। यदि छात्र को यह विश्वास ही न रहे कि उसकी मेहनत का निष्पक्ष मूल्यांकन होगा तो फिर कोई भी नई शिक्षा नीति या कोई भी वैचारिक विमर्श और कोई भी गौरवगान स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ सकता।
यह तय है कि जब तक शिक्षा माफिया का सिंडिकेट नहीं टूटेगा और शिक्षा मंत्रालय को बौद्धिक गहराई तथा प्रशासनिक दृढ़ता वाला नेतृत्व नहीं मिलेगा, तब तक नालंदा का गौरव केवल भाषणों का हिस्सा बना रहेगा। माफिया के आगे कमजोर पड़ता तंत्र आज की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता बन चुका है।
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