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विश्व साहित्य का आकाश: नेली जाक्स- नाजी अत्याचार से भयभीत
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सार
जर्मनी की पैदाइश नेली ने स्वीडन में जाकर शरण ली और उन्होंने स्वीडन के नागरिक के रूप में नोबेल पुरस्कार ग्रहण किया। स्वयं नेली के अनुसार वे अपने लेखन में यहूदी लोगों की त्रासदी प्रस्तुत करती हैं।
नेली जाक्स की रचनाएं
- फोटो : Freepik.com
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विस्तार
1966 का नोबेल पुरस्कार एक साथ दो रचनाकारों– नेली जाक्स एवं शम्यूएल योसेफ एग्नॉन को मिला। दोनों यहूदी थे, मगर दो भिन्न भाषाओं में लिखने वाले तथा दो भिन्न देश में रहने वाले। एग्नॉन हीब्रू भाषा में लिखते तथा नेली जर्मन भाषा में लिखने वाली हैं। जर्मनी की पैदाइश नेली ने स्वीडन में जाकर शरण ली और उन्होंने स्वीडन के नागरिक के रूप में नोबेल पुरस्कार ग्रहण किया। स्वयं नेली के अनुसार वे अपने लेखन में यहूदी लोगों की त्रासदी प्रस्तुत करती हैं।
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नेली का जन्म एक खूब धनी परिवार में 10 दिसम्बर 1891 को बर्लिन में हुआ। उनका पूरा नाम लिओनी जाक्स है। 10 दिसम्बर को ही नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाता है। अत: जब 10 दिसम्बर 1966 को उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला, उस दिन उनका जन्मदिन भी था। सुनने में यह एक परिकथा जैसा लग सकता है, मगर यह सत्य है।
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असल में उनके प्रत्येक जन्मदिन पर उनके पिता कहा करते,‘अब वे स्टॉकहोम में नोबेल पुरस्कार वितरण समारोह मना रहे होंगे।’ पुरस्कार प्राप्ति के अवसर पर नेली अपने पिता का यह कथन स्मरण करती हैं।
उनके पिता का नाम विलियम जाक्स था, वे बहुत बड़े उद्योगपति थे साथ-ही-साथ उन्हें नई-नई चीजें अन्वेषण का भी श्रेय दिया जाता है। वे संगीत प्रेमी भी थे। इसीलिए उन्होंने अपनी एकमात्र संतान, अपनी बेटी को लड़कियों के एक बहुत अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलवाई। नेली का स्वास्थ्य नाजुक था, अत: काफी समय तक उनकी शिक्षा घर पर ही हुई।
बाद में नेली की प्रारंभिक शिक्षा बर्लिन के अबर्ट हाई स्कूल में हुई। यहूदियों का संगीत प्रेम जग जाहिर है। नेली एक सम्पन्न इलाके में रहती थीं, अत: बचपन से संगीत उनके जीवन का प्रमुख अंग था। उस समय के यहूदी रिवाज के अनुसार नेली को साहित्य-संगीत एवं नृत्य की शिक्षा मिली।
कविता संग्रह- ‘लेजेंड्स एंड स्टोरज’
प्रतिभा तो उनमें थी ही, वे बचपन से कविता करने लगीं। 1908 में जब उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई समाप्त की तब तक वे काफी कविताएं लिख चुकी थीं। पंद्रह वर्ष की उम्र में उनका पहला संग्रह ‘लेजेंड्स एंड स्टोरज’ प्रकाशित हुआ। हालांकि बचपन से उनकी इच्छा एक कुशल नृत्यांगना बनने की थी। मगर उस समय यह बहुत सम्मानित काम नहीं माना जाता था अत: उस समय की सामाजिक रीतियों का ध्यान रखते हुए उनके माता-पिता ने उनकी इस इच्छा को बढ़ावा नहीं दिया।
नेली की मां मार्गरीटा कारगर जाक्स एक फैशनेबल महिला थीं। नेली का पालन-पोषण भी उन्होंने इसी सुसंस्कृत वातावरण में किया। पिता के पुस्तकालय में भरपूर जर्मन साहित्य था। नेली को बचपन से पढ़ने का चस्का लग गया था। उन्होंने जर्मन के साथ-साथ रूसी साहित्य भी पढ़ा।
वे स्वीडन की कवयित्री सेलमा का ‘गोस्टा बर्लिंग्स सागा’ पढ़ कर उनकी प्रशंसक बन गईं। बाद में पत्राचार करते हुए दोनों की दोस्ती पैंतीस साल चली। सेलमा की सहायता से ही वे अपना एवं अपनी मां के जीवन की रक्षा कर सकीं। मगर दोनों कभी भी मिल न सकीं।
नोबेल समिति ने अपनी अनुशंसा में कहा, ‘उन्होंने स्वीडन में रहते हुए शांतिपूर्ण तरीके से अपना लेखन जारी रखा एवं लिखने में प्रौढ़ता प्राप्त की है। इसी प्रौढ़ता की स्वीकृति नोबेल समिति कर रही है।’ असल में तमाम जर्मन यहदियों की भांति उन्हें भी अपना देश छोड़ कर भागना पड़ा था।
वे अंतर्मुखी थी और उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। अट्ठारह साल की नेली माता-पिता के साथ जब छुट्टियां मना रही थीं, तब उनकी दोस्ती एक लड़के से हुई जो प्रतिरोध दस्ते का सदस्य था। दोनों को 1937 में नाजियों ने गिरफ्तार कर लिया। फिर वे अपने साथी को कभी न देख सकीं। उसे अपनी रचनाओं में उन्होंने यहुदियों की मृत्यु का वाहक बनाया। मगर कभी उसकी पहचान जाहिर नहीं की। इस सदमे को वे बर्दास्त न कर सकीं।
बचपन का दोस्त एक गैर यहूदी लड़का भी नाजी सेना द्वारा मारा गया था।
गिरफ्तारी के पहले 1930 में उनके पिता की मृत्यु हो गई। नेली केलिए भी हुक्म हुआ कि वे केवल यहूदी अखबार केलिए ही लिखें, अपना लिखा किसी अन्य स्थान पर प्रकाशित न करें। गेस्टॉपो ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया, मगर हर बार छोड़ भी दिया। अंतत: वे अपनी मां के साथ किसी तरह 16 मई 1940 को स्वीडन पहुंची, तब तक सेलमा गुजर चुकी थीं।
नाजी अत्याचार से नेली इतनी भयभीत थीं कि काफी समय तक उनकी आवाज जाती रही, उन्हें कई बार नर्वस ब्रेक डाउन हो गया। उन्होंने लिखा, ‘जब भयंकर दहशत आई/ मैं गूंगी हो गई।’ मां एकमात्र सहारा थीं, उनके गुजरने से भी वे बहुत टूट गईं।
प्रारंभ में जर्मनी में उनका लेखन स्वीकृत न था। जर्मन प्रकाशक उनका काम प्रकाशित करने को तैयार न थे। लेकिन 1947 में उनका स्वीडिश अनुवाद संग्रह ‘वेव्स एंड ग्रैनाइट’ खूब प्रसिद्ध हुआ। उन्हें इससे ख्याति मिली। आज जर्मनी क्या वे पूरे विश्व में बहुत सम्मान के साथ पढ़ी जाती हैं। उनका लेखन यहूदी त्रासदी को बहुत शक्तिशाली तरीके से लेखन में लाता है।
असल में जब वे स्वीडन पहुंचीं, भाषा को लेकर उन्हें बहुत दिक्कत हुई, आजीविका की भी समस्या थी, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, भाषा सीखी और अनुवाद कार्य द्वारा अर्थोपार्जन किया। उन्होंने स्वीडन के लेखकों जैसे गनर एकेल, एरिक लिंडग्रेन, जोहान्स एडफेल्ट, कार्ल वेनबर्ग आदि का जर्मन भाषा में अनुवाद किया। अनुवाद का उनका काफी काम प्रकाशित है।
1947 में ही उनका काम ‘इन द हैबेटेशन ऑफ डेथ’ आया, यह ‘इन द हाउसेस ऑफ डेथ’ शीर्षक से भी उपलब्ध है। उन्होंने कविता के साथ नाटक भी लिखे। उनकी कुछ रचनाओं के नाम हैं, ‘जर्नी टू द बियॉन्ड’, ‘फ्लाइट एंड मेटामोर्फिसिस’, ‘साइंस इन द सैन्ड’, ‘एक्लिप्स ऑफ स्टार्स’ आदि। ‘एली’, ‘एब्राहम इन ए लैंडस्केप ऑफ सॉल्ट’ आदि उनके नाटक हैं।
जो हादसे उन्होंने देखे थे, जिन परिस्थितियों से वे गुजरी थीं, उनका प्रभाव उनके मस्तिष्क के साथ-साथ शरीर पर भी हुआ। इसका नतीजा हुआ, उन्हें आंतों का कैंसर हो गया। उस समय तक कैंसर का आज की तरह इलाज उपलब्ध न था। इसी कैंसर के कारण 12 मई 1970 को स्टॉकहोम में उनकी मृत्यु हुई। वहीं नॉर्थ सिमेट्री में उन्हें दफनाया गया। अब उनके जन्म देश जर्मनी ने भी उन्हें सम्मान दिया है। बर्लिन में उनके नाम पर एक पार्क बना है।
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