फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Tamil Nadu Cycle of vendetta continues; Udhayanidhi stalin arrest raises several questions

तमिलनाडु: नहीं टूट रही प्रतिशोध की परंपरा, उदयनिधि की गिरफ्तारी से उठे कई सवाल

Tue, 04 Aug 2026 02:19 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 04 Aug 2026 02:19 PM IST
सार

पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को गर्मा दिया। समर्थकों ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया, जबकि विरोधियों ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में किसी भी नेता की भाषा मर्यादित होनी चाहिए। कानून सभी के लिए समान है।

विज्ञापन
Tamil Nadu Cycle of vendetta continues; Udhayanidhi stalin arrest raises several questions
द्रमुक नेता उदयनिधि स्टालिन - फोटो : ANI

विस्तार

दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से अलग रही है। राज्य में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनाव जीतने या हारने तक सीमित नहीं रहा, अपितु सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता कई बार व्यक्तिगत टकराव का रूप लेती रही है। राज्य की राजनीति में प्रशासनिक कार्रवाई, पुलिस जांच, अदालतों में मुकदमे और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अक्सर चर्चा का विषय बनते रहे हैं।

विज्ञापन


समय-समय पर यह आरोप लगते रहे हैं कि सत्ता में आने वाली सरकारें अपने विरोधियों के खिलाफ सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करती हैं। तमिलनाडु की राजनीति को कई राजनीतिक विश्लेषक 'प्रतिशोध की राजनीति' का उदाहरण मानते हैं।
विज्ञापन


दरअसल, द्रमुक के वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के पुत्र और पूर्व उप मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन एक सार्वजनिक सभा में दिए विवादित बयान को लेकर कानूनी विवादों में घिर गए हैं। उनके भाषण को लेकर राज्यभर में शिकायतें दर्ज कराई गईं। पुलिस ने मंगलवार को जूनियर स्टालिन को गिरफ्तार कर लिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को गर्मा दिया। समर्थकों ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया, जबकि विरोधियों ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में किसी भी नेता की भाषा मर्यादित होनी चाहिए। कानून सभी के लिए समान है।

यह पूरा घटनाक्रम केवल एक विवादित बयान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे राज्य की राजनीति का वह लंबा इतिहास है, जिसमें राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कई बार व्यक्तिगत संघर्ष का रूप ले लेती है। यहां सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक माहौल तेजी से बदलता है। विरोधियों पर कानूनी कार्रवाई को लेकर बहस शुरू हो जाती है। यही कारण है कि यहां की राजनीति को समझने के लिए उसके इतिहास और सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।

राज्य में राजनीति केवल राजनीतिक दलों के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं रही। यहां राजनीति लंबे समय तक ऐसे करिश्माई नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही, जिन्होंने फिल्मों और जनआंदोलनों के माध्यम से जनता के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। द्रविड़ आंदोलन से निकले नेताओं ने सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय अस्मिता और तमिल भाषा के सम्मान को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाया। यहां नेता केवल राजनेता नहीं, बल्कि लाखों लोगों की भावनाओं से जुड़े जननायक भी बन गए।

यदि इतिहास पर नजर डालें तो द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच दशकों तक चली राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) के द्रमुक से अलग होकर नई पार्टी बनाने के बाद राज्य की राजनीति दो ध्रुवों में बंट गई। इसके बाद करुणानिधि और जे. जयललिता के बीच चला लंबा राजनीतिक संघर्ष कई बार व्यक्तिगत कटुता तक पहुंच गया।

वर्ष 2001 में तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की देर रात हुई गिरफ्तारी की तस्वीरें पूरे देश ने देखीं। उस घटना ने यह संदेश दिया कि तमिलनाडु की राजनीति में सत्ता परिवर्तन केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर राजनीतिक विरोधियों पर भी दिखाई देता है।

इसी इतिहास ने राज्य की राजनीति में एक ऐसी संस्कृति विकसित कर दी, जिसमें सत्ता और विपक्ष के बीच विश्वास की कमी लगातार बढ़ती गई। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन आरोप वही रहे, विरोधियों पर मुकदमे, जांच एजेंसियों की सक्रियता और राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप। आज भी जब किसी बड़े नेता के खिलाफ पुलिस या कानूनी कार्रवाई होती है तो उस पर केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक नजरिए से भी चर्चा होती है।

राज्य की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सिनेमा का प्रभाव है। शायद देश का कोई दूसरा राज्य ऐसा नहीं है, जहां फिल्मों और राजनीति का रिश्ता इतना गहरा हो। सी.एन. अन्नादुरई, एम. करुणानिधि, एमजीआर और जे. जयललिता से लेकर अभिनेता विजय तक, अनेक लोकप्रिय फिल्मी हस्तियों ने राजनीति में कदम रखा तथा  व्यापक जनसमर्थन हासिल किया।

यहां फिल्मी लोकप्रियता कई बार राजनीतिक पूंजी में बदल जाती है। अभिनेता का प्रशंसक धीरे-धीरे राजनीतिक समर्थक बन जाता है। यही कारण है कि फिल्मी दुनिया से जुड़े विवाद भी कई बार राजनीतिक विवाद बन जाते हैं।

हाल के राजनीतिक घटनाक्रम केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। दक्षिण भारत की राजनीति में होने वाला हर बड़ा बदलाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डालता है। द्रमुक लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति का एक महत्वपूर्ण दल रहा है।

लोकसभा में उसके सांसदों की संख्या और दक्षिण भारत में उसका जनाधार उसे राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली बनाता है। ऐसे में राज्य में होने वाली हर बड़ी राजनीतिक या कानूनी कार्रवाई का असर दिल्ली की राजनीति तक महसूस किया जाता है।

उदयनिधि स्टालिन से जुड़े विवाद ने भी यही संकेत दिया है कि अब तमिलनाडु की राजनीति केवल द्रमुक और उसके विरोधियों की लड़ाई नहीं रह गई है। राज्य में नए राजनीतिक दलों की सक्रियता, बदलती सामाजिक अपेक्षाएं और युवाओं की बढ़ती भागीदारी राजनीतिक समीकरणों को नया रूप दे रही हैं। हर दल अब अपनी रणनीति नए सिरे से तय कर रहा है।

उदयनिधि की गिरफ्तारी के घटनाक्रम का एक दूसरा पहलू भी है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार है, लेकिन इसके साथ भाषा की मर्यादा और सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।

राजनीतिक भाषणों में कटाक्ष, आलोचना और वैचारिक विरोध लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन जब भाषा व्यक्तिगत या अमर्यादित हो जाती है तो विवाद पैदा होना तय है। ऐसे मामलों में कानून अपना काम करता है। अदालतें अंतिम निर्णय देती हैं। इसलिए किसी भी मामले को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना भी उचित नहीं होगा।

राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। द्रमुक विपक्ष की राजनीति का एक महत्वपूर्ण चेहरा है। भारतीय जनता पार्टी भी पिछले कुछ वर्षों से तमिलनाडु में अपना जनाधार बढ़ाने के प्रयास में लगी हुई है। भाजपा लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह राज्य में एक वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति बन सकती है। ऐसे में यदि राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है तो उसका लाभ किस दल को मिलेगा, यह भविष्य की राजनीति तय करेगी।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसमें सत्ता और विपक्ष, दोनों की भूमिका बराबर महत्वपूर्ण होती है। यदि सत्ता पक्ष कानून का उपयोग केवल राजनीतिक विरोधियों को घेरने के लिए करता हुआ दिखाई दे या विपक्ष लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन न करे तो दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकतीं।

इसलिए यह आवश्यक है कि जांच एजेंसियां पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता से कार्य करें। किसी भी कार्रवाई का आधार केवल कानून और उपलब्ध साक्ष्य हों, न कि राजनीतिक दबाव। सौ बात की एक बात यह है कि किसी भी नेता पर होने वाली कानूनी कार्रवाई का मूल्यांकन अदालतों और कानून के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक भावनाओं के आधार पर।

यदि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है, लेकिन यदि कानून राजनीतिक हथियार बन जाए तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। तमिलनाडु आज इसी चौराहे पर खड़ा है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed