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राइटर्स बिल्डिंग: क्या पश्चिम बंगाल अपनी राजनीतिक स्मृतियों के घर लौट रहा है?

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sat, 09 May 2026 01:41 PM IST
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सार

वर्ष 1777 में निर्मित राइटर्स बिल्डिंग का नाम ईस्ट इंडिया कंपनी के उन युवा कर्मचारियों के नाम पर पड़ा, जिन्हें 'राइटर्स' कहा जाता था। ये वही लोग थे, जो ब्रिटिश शासन की फाइलें तैयार करते थे। राजस्व और प्रशासन की मशीनरी को संचालित करते थे।

Writers Building in Kolkata turns orange to mark the inaugural day of the first-ever BJP govt
भगवा रंग में राइटर्स बिल्डिंग - फोटो : X
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विस्तार

कोलकाता के बीबीडी बाग की पहचान मानी जाने वाली राइटर्स बिल्डिंग केवल एक प्रशासनिक भवन नहीं, अपितु पश्चिम बंगाल की राजनीतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इसकी लाल दीवारों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती क्लर्कों से लेकर स्वतंत्र भारत के मुख्यमंत्रियों तक सत्ता के बदलते चेहरे देखे हैं। यही कारण है कि जब भी इस भवन में फिर से सरकारी कामकाज शुरू करने की चर्चा होती है तो वह महज आफिस बदलने का मामला नहीं रह जाता, वह इतिहास, राजनीति और जनभावना का विषय बन जाता है।

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वर्ष 1777 में निर्मित राइटर्स बिल्डिंग का नाम ईस्ट इंडिया कंपनी के उन युवा कर्मचारियों के नाम पर पड़ा, जिन्हें 'राइटर्स' कहा जाता था। ये वही लोग थे, जो ब्रिटिश शासन की फाइलें तैयार करते थे। राजस्व और प्रशासन की मशीनरी को संचालित करते थे। समय के साथ यह भवन बंगाल प्रशासन का केंद्रीय सचिवालय बन गया।
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8 दिसंबर 1930 को क्रांतिकारी बिनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने इसी भवन में ब्रिटिश अधिकारी एन.एस. सिम्पसन पर हमला किया। इस घटना ने भवन को स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों से भी जोड़ दिया। बाद में डलहौजी स्क्वायर का नाम बदलकर बीबीडी बाग रखा गया।

स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल की सरकार का मुख्यालय यही रहा। डॉ. बिधान चंद्र राय, ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे नेताओं ने इसी भवन से शासन चलाया। 'महाकरण' शब्द बंगाल में सत्ता का पर्याय बन गया था। वाम शासन के दौरान राइटर्स बिल्डिंग केवल सचिवालय नहीं, अपितु राजनीतिक शक्ति और प्रशासनिक स्थिरता का प्रतीक थी। कोलकाता आने वाला हर व्यक्ति इस इमारत को देखकर समझ जाता था कि बंगाल की सत्ता यहीं बसती है।


वर्ष 2011 में ममता बनर्जी ने वाम मोर्चे को सत्ता से हटाया। दो वर्ष बाद उन्होंने सचिवालय को नबन्ना स्थानांतरित कर दिया।
 

  • इसके पीछे यह कारण था कि राइटर्स बिल्डिंग जर्जर हो चुकी थी और व्यापक मरम्मत की जरूरत थी।
  • दूसरा, इसमें आधुनिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की सुविधाएं अपर्याप्त थीं।
  • तीसरा, ममता बनर्जी अपनी प्रशासनिक शैली के अनुरूप एक नए कार्यस्थल की इच्छुक थीं। साथ ही, वाम शासन की प्रतीकात्मक छाया से बाहर निकलकर नई राजनीतिक पहचान स्थापित करना भी एक बड़ा कारण माना गया।


नबान्न ने ममता बनर्जी को अपेक्षाकृत नियंत्रित और आधुनिक प्रशासनिक वातावरण दिया, लेकिन आम बंगाली मानस में राइटर्स बिल्डिंग की जगह कभी खाली नहीं हुई। राइटर्स बिल्डिंग के संरक्षण और नवीनीकरण का काम शुरू तो हुआ, लेकिन धीमी गति, तकनीकी चुनौतियों और प्रशासनिक विलंब के कारण यह वर्षों तक पूरा नहीं हो सका। विरासत भवन होने के कारण इसकी संरचना में बदलाव आसान नहीं था।

ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने का संदेश

यह भवन इस सवाल का प्रतीक बन गया कि क्या हमारी सरकारें अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने में पर्याप्त गंभीर हैं?

हालांकि, अब भाजपा सरकार के फिर से राइटर्स बिल्डिंग से कामकाज शुरू करने के निर्णय के पीछे कई संकेत हैं। पश्चिम बंगाल की प्रशासनिक परंपरा से पुनः इससे जुड़ने की इच्छा है। यह ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने का संदेश है। सत्ता परिवर्तन के बाद नई राजनीतिक पहचान गढ़ने का प्रयास है। जनता की भावनात्मक स्मृति से संवाद भी स्थापित होगा। राइटर्स बिल्डिंग में वापसी यह संकेत भी देती है कि इतिहास को पूरी तरह छोड़ा नहीं जा सकता। अंततः राजनीति को अपनी जड़ों तक लौटना पड़ता है।

यह भी सत्य है कि सत्ता के भवन कभी तटस्थ नहीं होते। व्हाइट हाउस, 10 डाउनिंग स्ट्रीट या राइटर्स बिल्डिंग, सभी अपने-अपने लोकतंत्रों के प्रतीक हैं। हालांकि, दिल्ली में साउथ-नार्थ ब्लॉक से भारत सरकार के मंत्रालय शिफ्ट हो गए हैं। अब इसे संग्रहालय में तब्दील किया जा रहा है।

ममता बनर्जी ने नबान्न को चुना तो वह परिवर्तन का संदेश था। अब भाजपा सरकार राइटर्स बिल्डिंग में लौट रही है तो वह निरंतरता, परंपरा और ऐतिहासिक वैधता का संदेश है, लेकिन जनता का अंतिम मूल्यांकन भवन से नहीं, शासन से होगा। यदि रोजगार, निवेश, कानून-व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार होता है तो यह वापसी सार्थक मानी जाएगी। अन्यथा यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति बनकर रह जाएगी।

दरअसल, राइटर्स बिल्डिंग की कहानी बंगाल की कहानी है।औपनिवेशिक अतीत, स्वतंत्रता संघर्ष, वाम शासन, तृणमूल का उदय और अब फिर इतिहास की ओर लौटने की कोशिश।लाल दीवारें फिर आबाद हो रही हैं। फाइलें फिर चलेंगी। निर्णय फिर लिए जाएंगे, पर असली प्रश्न वही रहेगा, क्या बंगाल केवल अपने अतीत की इमारत में लौट रहा है या वह बेहतर शासन के एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहा है?


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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