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तिब्बत की हकीकत दिखाता एक फिल्मकार: लेखक पेमा सेदेन इन दिनों शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं
Sun, 23 Jun 2019 12:47 AM IST
Avdhesh Kumar
एमी किन
एमी किन
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Sun, 23 Jun 2019 12:47 AM IST
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तिब्बती फिल्मकार और लेखक पेमा सेदेन इन दिनों शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। वर्षों तक उन्होंने चीनी के साथ-साथ अपनी तिब्बती भाषा में बेहद सहजता से कहानियां और फिल्मों की पटकथाएं लिखीं। लेकिन बाद के दिनों में फिल्मों और विज्ञापनों की भारी व्यस्तता के बीच उनके पास सिर्फ उस चीनी भाषा में लिखने का ही विकल्प रह गया, जो न केवल उनकी दूसरी भाषा है, बल्कि कभी-कभी वह तिब्बती पर चीनी भाषा को तरजीह भी देते रहे हैं।
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तिब्बती फिल्मकार और लेखक पेमा सेदेन इन दिनों शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। वर्षों तक उन्होंने चीनी के साथ-साथ अपनी तिब्बती भाषा में बेहद सहजता से कहानियां और फिल्मों की पटकथाएं लिखीं। लेकिन बाद के दिनों में फिल्मों और विज्ञापनों की भारी व्यस्तता के बीच उनके पास सिर्फ उस चीनी भाषा में लिखने का ही विकल्प रह गया, जो न केवल उनकी दूसरी भाषा है, बल्कि कभी-कभी वह तिब्बती पर चीनी भाषा को तरजीह भी देते रहे हैं।
अपनी मातृभाषा तिब्बती की उपेक्षा का तीव्रतर भाव हाल के दिनों में उनमें तब आया, जब उन्होंने खुद को एक ऐसी किताब के लोकार्पण के अवसर पर मंच पर पाया, जो उन्हीं की चीनी भाषा में लिखी पुस्तक थार्लो थी, जिसका किसी ने तिब्बती में अनुवाद किया था। 'किसी दूसरे व्यक्ति ने मेरे उपन्यास का मेरी मातृभाषा में अनुवाद किया, जो सुनने में बेहद अजीब लगता है,' जिंपा और थार्लो जैसी बेहद चर्चित फिल्मों के मृदुभाषी निर्देशक पेमा सेदेन ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान कही।
खुद को दोषी मानने की बात एक ऐसे व्यक्ति के मुंह से सुनी जा रही है, जिसके व्यक्तित्व और कृतित्त में उसकी तिब्बती पहचान केंद्रीय स्थान रखती है। और उनकी यह स्वीकारोक्ति उस विरोधाभास के बारे में बताती है, जिसका सामना चीन में प्रशिक्षित तिब्बती फिल्मकारों की नई पीढ़ी को रोज ही करना पड़ता है। उनचास साल के पेमा चीन में काम करने वाले ऐसे पहले तिब्बती फिल्मकार हैं, जिसने तिब्बती भाषा की एक पूरी फिल्म की शूटिंग चीन में की है। वह प्रसिद्ध बीजिंग फिल्म एकेडेमी से ग्रेजुएट होने वाले पहले तिब्बती फिल्मकार भी हैं।
अपनी मातृभाषा तिब्बती की उपेक्षा का तीव्रतर भाव हाल के दिनों में उनमें तब आया, जब उन्होंने खुद को एक ऐसी किताब के लोकार्पण के अवसर पर मंच पर पाया, जो उन्हीं की चीनी भाषा में लिखी पुस्तक थार्लो थी, जिसका किसी ने तिब्बती में अनुवाद किया था। 'किसी दूसरे व्यक्ति ने मेरे उपन्यास का मेरी मातृभाषा में अनुवाद किया, जो सुनने में बेहद अजीब लगता है,' जिंपा और थार्लो जैसी बेहद चर्चित फिल्मों के मृदुभाषी निर्देशक पेमा सेदेन ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान कही।
खुद को दोषी मानने की बात एक ऐसे व्यक्ति के मुंह से सुनी जा रही है, जिसके व्यक्तित्व और कृतित्त में उसकी तिब्बती पहचान केंद्रीय स्थान रखती है। और उनकी यह स्वीकारोक्ति उस विरोधाभास के बारे में बताती है, जिसका सामना चीन में प्रशिक्षित तिब्बती फिल्मकारों की नई पीढ़ी को रोज ही करना पड़ता है। उनचास साल के पेमा चीन में काम करने वाले ऐसे पहले तिब्बती फिल्मकार हैं, जिसने तिब्बती भाषा की एक पूरी फिल्म की शूटिंग चीन में की है। वह प्रसिद्ध बीजिंग फिल्म एकेडेमी से ग्रेजुएट होने वाले पहले तिब्बती फिल्मकार भी हैं।
वह अपनी तरह के अकेले फिल्मकार हैं, जो मौजूदा दौर में विरल है। आर्ट फिल्म बनाने वाले वह ऐसे निर्देशक हैं, जो सेंसर करने वाली चीन की तानाशाही व्यवस्था में भी उतनी ही सहजता से काम करते हैं। आज भी वह ऐसी कहानियों पर फिल्में बनाते हैं, जो एक ओर आम दर्शकों को संबोधित होती है, तो दूसरी तरफ चीन की कम्युनिस्ट सत्ता पर बांध दी गई हदबंदियों से बाहर होती हैं। वह लगातार फिल्में बना पा रहे हैं, तो इसलिए कि अपनी फिल्मों में वे राजनीतिक संदर्भों को परोक्ष रूप से ले आते हैं।
बावजूद इसके कि विदेशों में रहने वाले अनेक तिब्बती उन पर दबाव बनाते हैं कि वह तिब्बत पर हो रहे चीनी दमन के विरोध में मुखरता से अपनी बात फिल्मों में रखें। हालांकि उनकी सभी फिल्मों की पृष्ठभूमि तिब्बत या तिब्बती इलाके हैं, जो कि चीन में बेहद संवेदनशील विषय है। लेकिन उन फिल्मों में दलाई लामा का जिक्र नहीं है, जिन पर चीनी तिब्बत की आजादी के लिए गोपनीय ढंग से काम करने का आरोप लगाते हैं।
ऐसे ही पेमा की फिल्मों में बहुसंख्यक हान चीनी समुदाय का शायद ही कोई चरित्र हो। लेकिन तमाम तिब्बती इस बात पर लगभग सहमत हैं कि पेमा की फिल्में इस अर्थ में दुर्लभ हैं कि वे तिब्बत पर तिब्बतियों की सोच को सामने लाती हैं। पेमा की फिल्में तिब्बत की सीधी-सरल, और कभी गुस्सैल छवि को चित्रित करती हैं।
बावजूद इसके कि विदेशों में रहने वाले अनेक तिब्बती उन पर दबाव बनाते हैं कि वह तिब्बत पर हो रहे चीनी दमन के विरोध में मुखरता से अपनी बात फिल्मों में रखें। हालांकि उनकी सभी फिल्मों की पृष्ठभूमि तिब्बत या तिब्बती इलाके हैं, जो कि चीन में बेहद संवेदनशील विषय है। लेकिन उन फिल्मों में दलाई लामा का जिक्र नहीं है, जिन पर चीनी तिब्बत की आजादी के लिए गोपनीय ढंग से काम करने का आरोप लगाते हैं।
ऐसे ही पेमा की फिल्मों में बहुसंख्यक हान चीनी समुदाय का शायद ही कोई चरित्र हो। लेकिन तमाम तिब्बती इस बात पर लगभग सहमत हैं कि पेमा की फिल्में इस अर्थ में दुर्लभ हैं कि वे तिब्बत पर तिब्बतियों की सोच को सामने लाती हैं। पेमा की फिल्में तिब्बत की सीधी-सरल, और कभी गुस्सैल छवि को चित्रित करती हैं।
'पेमा सेदेन की फिल्में इस अर्थ में प्रामाणिक हैं कि वे उन सामाजिक मुद्दों पर फोकस करती हैं, जो सभी तिब्बतियों को जोड़ते हैं,' शेरिंग शाक्य कहते हैं, जो यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया में तिब्बती साहित्य और समाज के प्रोफेसर हैं। शाक्य इस संदर्भ में पेमा की थार्लो फिल्म का उल्लेख करते हैं। यह एक ऐसे गड़ेरिये की कहानी है, जो अपने एकांत पहाड़ी गांव से निकलकर शहर में आता है, लेकिन वहां उसे सरकारी परिचय पत्र पाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लेने के लिए कहा जाता है। इस पर वह सरल गड़ेरिया जवाब देता है, 'आप जानते हैं कि मैं कौन हूं। क्या इतना काफी नहीं है?'
पेमा की फिल्मों में तिब्बत को देखकर जिस ठंडेपन का एहसास होता है, स्थिति उससे अधिक तनावपूर्ण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। लाल सेना ने 1951 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया, और तभी से वह चीन द्वारा शासित है। हालांकि 2008 में वहां स्थिति बिगड़ी, जब तिब्बतियों ने चीनी कब्जे का विरोध किया, जिसका बीजिंग ने तत्काल दमन किया। उसकी प्रतिक्रिया में अनेक तिब्बतियों ने आत्मदाह कर लिया। ऐसी स्थिति में चीन द्वारा सरकारी आवेदन पत्र के लिए दबाव डालना भी कुछ तिब्बतियों को अपना अपमान जैसा लगता है।
पेमा की ज्यादातर कहानियां वस्तुतः उनके अपने अनुभव ही हैं, जो तिब्बत के पठारी इलाके किंघाई में एक गड़ेरिये के बेटे के तौर पर बचपन गुजारते हुए उनके जीवन का हिस्सा था। वह कहते हैं कि उनके दुर्गम गांव में किताबें इतनी दुर्लभ थीं कि एक डिक्शनरी खरीदने के लिए एक याक बेचना पड़ता था। तिब्बती संस्कृति से जुड़ने का श्रेय वह अपने दादा जी को देते हैं, जो स्कूल से लौटते ही उन्हें बौद्ध धर्म से जुड़ी पांडुलिपियों को कॉपियों में उतारने का काम देते थे। पढ़ाई के बाद किंघाई में ही स्कूल मास्टरी, फिर सिविल सर्विस में एक दशक खपाने के बाद वह फिल्म के अध्ययन के लिए बीजिंग चले गए।
© The New York Times 2019
पेमा की फिल्मों में तिब्बत को देखकर जिस ठंडेपन का एहसास होता है, स्थिति उससे अधिक तनावपूर्ण और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। लाल सेना ने 1951 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया, और तभी से वह चीन द्वारा शासित है। हालांकि 2008 में वहां स्थिति बिगड़ी, जब तिब्बतियों ने चीनी कब्जे का विरोध किया, जिसका बीजिंग ने तत्काल दमन किया। उसकी प्रतिक्रिया में अनेक तिब्बतियों ने आत्मदाह कर लिया। ऐसी स्थिति में चीन द्वारा सरकारी आवेदन पत्र के लिए दबाव डालना भी कुछ तिब्बतियों को अपना अपमान जैसा लगता है।
पेमा की ज्यादातर कहानियां वस्तुतः उनके अपने अनुभव ही हैं, जो तिब्बत के पठारी इलाके किंघाई में एक गड़ेरिये के बेटे के तौर पर बचपन गुजारते हुए उनके जीवन का हिस्सा था। वह कहते हैं कि उनके दुर्गम गांव में किताबें इतनी दुर्लभ थीं कि एक डिक्शनरी खरीदने के लिए एक याक बेचना पड़ता था। तिब्बती संस्कृति से जुड़ने का श्रेय वह अपने दादा जी को देते हैं, जो स्कूल से लौटते ही उन्हें बौद्ध धर्म से जुड़ी पांडुलिपियों को कॉपियों में उतारने का काम देते थे। पढ़ाई के बाद किंघाई में ही स्कूल मास्टरी, फिर सिविल सर्विस में एक दशक खपाने के बाद वह फिल्म के अध्ययन के लिए बीजिंग चले गए।
© The New York Times 2019