{"_id":"69cf24432b2168ee150c7c8b","slug":"digital-security-this-is-why-sops-are-essential-it-would-be-good-if-this-work-is-done-soon-2026-04-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"डिजिटल सुरक्षा: इसलिए जरूरी है एसओपी, यह काम जल्द हो तो अच्छा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
डिजिटल सुरक्षा: इसलिए जरूरी है एसओपी, यह काम जल्द हो तो अच्छा
विनय झैलावत
Published by: Pavan
Updated Fri, 03 Apr 2026 07:52 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
डिजिटल सुरक्षा: इसलिए जरूरी है एसओपी
- फोटो :
FreePik
विस्तार
डिजिटल धोखाधड़ी के माध्यम से धन की हेराफेरी में अपराधी पीड़ितों के बैंक खातों से धनराशि चुराने के लिए विभिन्न ऑनलाइन तरीकों का सहारा लेते हैं। एक प्रमुख तरीका है ‘डिजिटल गिरफ्तारी’। इसमें आरोपी कानून प्रवर्तन अधिकारियों का रूप धारण करके पीड़ितों को बड़ी रकम हस्तांतरित करने के लिए मजबूर करते हैं। भारत में, अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 के बीच इस तरह की धोखाधड़ी के जरिये हजारों करोड़ रुपये की धनराशि की हेराफेरी की गई। हाल ही में, एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह की हेराफेरी को ‘डकैती' करार दिया है।शीर्ष न्यायालय ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह ऐसे अपराधों से निपटने के लिए हितधारकों के परामर्श से एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करे। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने पाया कि डिजिटल धोखाधड़ी में हुई हानि कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। न्यायालय ने कहा कि इस तरह के घोटाले बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही का नतीजा हो सकते हैं। साथ ही, अदालत ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौजूदा एसओपी और दूरसंचार विभाग के इसी तरह के दिशा-निर्देशों की जांच करने व डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए चार सप्ताह के भीतर एक मसौदा तैयार करने को कहा है।
सर्वोच्च न्यायालय ने आरबीआई, परिवहन विभाग और अन्य अधिकारियों को डिजिटल गिरफ्तारी के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए एक ढांचा तैयार करने हेतु संयुक्त बैठक आयोजित करने का भी निर्देश दिया। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि मुआवजा तय करते समय व्यावहारिक और उदार दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। गौरतलब है कि इससे पहले, शीर्ष न्यायालय ने केंद्र से पीड़ितों को मुआवजा देने के संबंध में एमिकस क्यूरी (न्यायालय का मित्र) द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करने को कहा था। साथ ही, सीबीआई को ऐसेे मामलों की अखिल भारतीय स्तर पर जांच करने का भी आदेश दिया था। न्यायालय ने आरबीआई से पूछा था कि ऐसे अपराधों में इस्तेमाल किए गए खातों का पता लगाने और उन्हें फ्रीज करने के लिए एआई का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है?
न्यायालय ने गौर किया कि आरबीआई ने पहले ही एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार कर ली है। इसके तहत बैंक साइबर धोखाधड़ी के संदिग्ध मामलों में डेबिट कार्ड को अस्थायी रूप से फ्रीज करने जैसे निवारक कदम उठा सकते हैं। हाल ही में, इसी तरह की एक घटना में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की चंडीगढ़ शाखा में लगभग 590 करोड़ रुपये के बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। जांचकर्ताओं ने पूर्व शाखा प्रबंधक को मुख्य साजिशकर्ता के रूप में पहचाना है।
हरियाणा भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो के अनुसार, सरकारी धन को पूर्व प्रबंधक के परिवार द्वारा नियंत्रित एक निजी फर्म में भेजा गया था। इससे एसओपी तैयार करने की आवश्यकता और भी स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि इस प्रकार के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। एक अन्य घटनाक्रम में, केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय के अधीन एक उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन किया है, ताकि ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ के बढ़ते खतरे से निपटा जा सके। समिति में आरबीआई व सीबीआई जैसी एजेंसियां शामिल हैं। यह गूगल और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म की मदद भी लेगी, ताकि शीघ्र कार्रवाई के जरिये कमियों को दूर करके फर्जीवाड़ा रोका जा सके। देश को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने और डिजिटल धोखाधड़ी से बचाने के लिए एसओपी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अव्यवस्थित प्रतिक्रियाओं को एक संरचित, समयबद्ध और कानूनी ढांचे में बदल देती है।
-लेखक पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।