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मंथन: अब तो न्यायिक सुधार की बात हो, जस्टिस वर्मा के इस्तीफे ने खड़े किए कई सवाल

विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील Published by: Pavan Updated Wed, 15 Apr 2026 08:20 AM IST
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सार
हाई कोर्ट के दो जजों के फैसले से अपराधी को फांसी मिल जाती है, लेकिन तीन हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की प्रतिकूल रिपोर्ट और पूर्व चीफ जस्टिस की सलाह के बावजूद जस्टिस यशवंत वर्मा ने त्यागपत्र देने से इन्कार कर दिया था। अब उनका विक्टिम कार्ड खेलते हुए त्यागपत्र देना कई अनुत्तरित सवाल खड़े करता है।
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Discussion: Now let's talk about judicial reforms; Justice Verma's resignation raises many questions
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

कैश कांड के खुलासे के बाद 500 रुपये के नोटों के बंडलों से भरी बोरियों के जलने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। जांच की अग्नि परीक्षा पर खरा साबित होने के बजाय यशवंत वर्मा ने बदनामी अभियान के शिकार व्यक्ति का विक्टिम कार्ड खेलते हुए त्यागपत्र दे दिया है। हाई कोर्ट के दो जजों के फैसले से अपराधी को फांसी मिल जाती है, जबकि वर्मा के खिलाफ तीन हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों की जांच समिति ने प्रतिकूल रिपोर्ट दी थी।


पूर्व चीफ जस्टिस खन्ना की सलाह के बावजूद वर्मा ने त्यागपत्र देने से इन्कार कर दिया था, जिसके बाद महाभियोग से हटाने के लिए उनके खिलाफ जांच शुरू हुई। 13 पेज की चिट्ठी में सफाई देने के साथ वर्मा ने जांच की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर अनेक सवाल उठाए हैं। इसलिए, राष्ट्रपति उनका इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार करने से इन्कार कर सकती हैं। जांच समिति की एनओसी या राष्ट्रपति द्वारा इस्तीफा स्वीकार किए बगैर वर्मा ने एकतरफा तौर पर अगर पद छोड़ने का निर्णय लिया, तो उनके पेंशन और भत्तों पर संकट आ सकता है।


वर्मा ने 13 पेज की चिट्ठी में तीन बड़ी बातें लिखी हैं। पहली, कथित नोट जलने की घटना के समय वह दिल्ली के बंगले में मौजूद नहीं थे। बंगले से जुड़ा स्टोर रूम खुला रहता था, जिसमें नौकर, स्टाफ और सुरक्षाकर्मी कोई भी आ-जा सकता था। ऐसी खुली जगह पर कोई बुद्धिमान व्यक्ति बड़ी मात्रा में पैसे क्यों रखेगा? वर्मा की अनुपस्थिति में जले हुए नोटों के लिए उनकी कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं है।

दूसरी, अग्निकांड में जले हुए नोट असली थे या नोट जैसे दिखने वाले कागज, इस बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं है। तीसरी, आंतरिक जांच समिति की सुनवाई प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। वर्मा को सभी गवाहों से सवाल-जवाब का मौका नहीं दिया गया। उनके अनुसार, सिर्फ संदेह के आधार पर हाई कोर्ट के जज को फंसाना दुखद होने के साथ न्याय व्यवस्था की एक बड़ी विडंबना भी है।
हाई कोर्ट के जज के खिलाफ साजिश होना या उन्हें न्याय न मिलना पूरी न्यायिक और सांविधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर संकट की बात है। लेकिन पूरे देश को हिलाने वाले कैश कांड में सबूतों को इकट्ठा करने वाले पंचनामा, अपराध की जांच के लिए एफआईआर और गवाहों के बयान नहीं हुए। पद की आड़ में वर्मा को पुलिस और सिस्टम से कई तरह की राहत मिली। उन खामियों को महाभियोग की सांविधानिक जांच से गड्डमड्ड करके वर्मा पूरे मामले को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं।

वर्मा के पत्र में उठाए गए सवालों पर न्याय की कसौटी के अनुसार तीनों पहलुओं की सामूहिक पड़ताल जरूरी है। किसी व्यापारी, नेता या अफसर के घर नोट जलने का मामला होता, तो टीवी चैनलों से सीधा प्रसारण शुरू हो जाता। जज से जुड़े इस हाई प्रोफाइल और संवेदनशील मामले में पुलिस और दमकल विभाग ने मौके पर पंचनामा नहीं बनाया। उसके बाद रातों-रात अधजले और जले नोटों का मलबा भी गायब कर दिया गया। सबूतों से छेड़छाड़ करने वाले परिवारजनों और स्टाफ के खिलाफ पुलिस ने कोई मामला दर्ज नहीं किया। वायरल वीडियो और तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की रिपोर्ट से साफ है कि जज के बंगले में बड़े पैमाने पर नोट थे।

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने संवेदनशील पत्रों और वीडियो के सार्वजनिक खुलासे की अनुमति दी थी। उन वीडियो में नोटों से भरे बोरे जलते हुए दिख रहे था। क्या जज के बंगले में किसी अन्य व्यक्ति ने साजिश के तहत नोट रखे थे? क्या जज को फंसाने के लिए नोट जलने का फेक वीडियो बनाया गया? या फिर असली नोटों के बजाए चूरन वाले जाली नोट जले थे? साजिश और अपराध से जुड़े इन पहलुओं पर वर्मा ने अभी तक पुलिस में शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई?

नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश सभी जगहों पर सरकार और न्यायिक व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावनाएं चरम पर हैं। संसद में सरकार के जवाब के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में जजों के खिलाफ 8,630 शिकायतें आईं, लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई के कोई आंकड़े नहीं हैं। भारत में जजों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं होती और उन्हें महाभियोग से हटाना असंभव-सा है। सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य आदेश के बाद जजों के खिलाफ लोकपाल की जांच नहीं हो सकती। एनसीईआरटी की किताबों में न्यायिक व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचार के चैप्टर को हटाने के आदेश पर विवाद के दौर में कैश कांड के दुर्योग से जस्टिस वर्मा सोशल मीडिया पर लोगों के निशाने पर हैं।

जजों का निलंबन नहीं होता, लेकिन कैश कांड के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से वर्मा ने जज के नाते कोई भी प्रशासनिक या न्यायिक कार्य नहीं किया। इसके बावजूद उन्हें वेतन और भत्ते मिल रहे थे। वर्मा के इस्तीफे के बाद महाभियोग की कार्रवाई खत्म होने के साथ सांविधानिक सुरक्षा भी खत्म हो सकती है। वर्मा को पेंशन स्वीकृत करने के पहले कैश कांड से जुड़े पैसे के स्रोत, गायब पैसे के ठिकाने, भ्रष्टाचार और हवाला से जुड़े पहलुओं की पारदर्शी जांच जरूरी है। कई दलों के 146 सांसदों ने जज को हटाने के लिए महाभियोग पर सहमति दी थी। इसलिए अब इस मामले से जुड़ी सभी जांच रिपोर्टों का खुलासा भी होना चाहिए।

इस मामले से जुड़ी जांच में हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, सरकार और संसद सभी शामिल हैं। तीन मुख्य न्यायाधीशों की रिपोर्ट के बाद अब लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त जांच समिति भी यदि उन्हें दोषी मानती है, तो वर्मा के खिलाफ एफआईआर के साथ आपराधिक मामला शुरू हो सकता है। वर्मा ने अपने पत्र में लिखा है कि इतिहास इस बात को जरूर दर्ज करेगा कि एक मौजूदा हाई कोर्ट जज के साथ कितनी नाइन्साफी की गई। अगर हाई कोर्ट के वरिष्ठ जज को साजिशन फंसाने या न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार के आपराधिक तंत्र जैसे पहलुओं की पारदर्शी जांच से सच सामने नहीं आता है, तो जजों के साथ संविधान के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होगा। इस प्रकरण के बाद जजों की संपत्ति की अनिवार्य सार्वजनिक घोषणा और नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली में सुधार से भाई-भतीजावाद को कम करने के लिए कानूनी सुधार के लिए सरकार को जरूरी कदम उठाने की भी जरूरत है। - edit@amarujala.com
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