{"_id":"6a597533233e39bea80c0109","slug":"evolving-landscape-of-demographic-change-ageing-population-poses-challenge-kerala-new-initiative-offers-lesson-2026-07-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"जनसांख्यिकीय बदलाव की बदलती तस्वीर: बुजुर्ग आबादी है सबसे बड़ी चुनौती, केरल की नई पहल से देश को मिलेगी सीख","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
जनसांख्यिकीय बदलाव की बदलती तस्वीर: बुजुर्ग आबादी है सबसे बड़ी चुनौती, केरल की नई पहल से देश को मिलेगी सीख
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
बुजुर्ग आबादी
- फोटो :
अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
जब देश का बड़ा हिस्सा अब भी अपनी युवा आबादी से मिलने वाले जनसांख्यिकीय लाभांश का जश्न मना रहा है, तो वहीं केरल एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। यह दौर युवाओं का नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी का है। राज्य की नवनिर्वाचित यूडीएफ सरकार ने देश का पहला वरिष्ठ नागरिक विभाग बनाने की घोषणा की है। इसके साथ एक अर्ध-न्यायिक वरिष्ठ नागरिक आयोग भी बनाया जाएगा। यह सिर्फ एक नई कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि इस बात की स्वीकारोक्ति है कि कम जन्म दर व बड़े पैमाने पर पलायन के कारण बढ़ती बुजुर्ग आबादी बड़ी चुनौती बन चुकी है।भारत तेजी से जनसांख्यिकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अनुमान है कि 2011 में 10 करोड़ रही 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र की आबादी 2036 तक दोगुनी से भी ज्यादा होकर 23 करोड़ से अधिक हो जाएगी। फिलहाल, दक्षिण भारत के राज्यों के साथ हिमाचल प्रदेश और पंजाब में बुजुर्गों की आबादी अपेक्षाकृत अधिक है। अनुमान है कि 2036 तक राज्यों के बीच यह अंतर और बढ़ जाएगा। अक्तूबर 2025 में पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के एक आधिकारिक बयान के अनुसार, परिवार और संस्थागत सहयोग, दोनों की कमी के कारण बुजुर्गों की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। उन्हें कई तरह की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी और अन्य चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। भारत में सार्वजनिक स्थान और परिवहन व्यवस्था भी काफी हद तक बुजुर्गों के अनुकूल नहीं हैं। इन समस्याओं के साथ एक नई चुनौती भी जुड़ गई है। तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया और नई तकनीकों को अपनाना अधिकांश बुजुर्गों के लिए आसान नहीं है। हालांकि, केंद्र सरकार ने अटल पेंशन योजना और राष्ट्रीय वयोश्री योजना जैसी कई पहल शुरू की हैं, पर केरल की कहानी पूरे देश के लिए एक सीख है, क्योंकि उसने बुजुर्गों पर विशेष ध्यान देने की दिशा में सबसे पहले कदम उठाए।
लोग खाड़ी देशों में काम करने गए और उससे जो विदेशी धन (रेमिटेंस) आया, उससे आधुनिक घर बनाने और पढ़ाई-लिखाई में तो मदद मिली, लेकिन इसने घरों को खाली भी कर दिया। आज केरल में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति 60 वर्ष से अधिक उम्र का है, जो देश के बड़े राज्यों में सबसे अधिक है। अनुमान है कि 2030 तक हर चार में से एक व्यक्ति बुजुर्ग होगा। कम जन्म दर, बढ़ती औसत आयु और कामकाजी लोगों के पलायन ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि कई जिलों में बुजुर्ग दंपती या विधवाएं घरों में अकेली रह रही हैं। इस बदलाव की मानवीय कीमत साफ और दर्दनाक है। कई बुजुर्ग पूरी तरह स्वयंसेवकों पर निर्भर हैं। विधवाएं सीमित आय में अकेले जीवन बिताने को मजबूर हैं, जबकि अवसाद और उम्र से जुड़ी बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। प्रवासन विशेषज्ञ एस इरुदया राजन ने सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज में अपने लंबे शोध के दौरान इस ‘खामोश संकट’ की ओर वर्षों पहले ही ध्यान दिलाया था। संयुक्त परिवार टूट चुके हैं। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 मौजूद तो है, पर इसे ठीक से लागू नहीं किया जाता है। केरल के नए संस्थान कल्याण योजनाओं, कानूनी सुरक्षा व नीतिगत योजना को एक साथ जोड़कर इस स्थिति को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।
यह पहल काफी हद तक जापान के अनुभव से प्रेरित है। जापान बहुत पहले ही तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी (सुपर-एजिंग) की चुनौती का सामना कर चुका है। तब वहां बुजुर्गों को बड़े संस्थानों में रखने के बजाय सामुदायिक देखभाल, असिस्टेड लिविंग और घर पर देखभाल जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया। केरल भी इसी दिशा में बढ़ रहा है। वह घर पर देखभाल की व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है, ताकि बुजुर्ग अपने परिचित माहौल और पड़ोस में सम्मान के साथ जी सकें। नीति में फेमिनिज्म ऑफ एजिंग, यानी बुजुर्ग आबादी में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक होने, पर भी खास ध्यान दिया गया है। सेवानिवृत्त हो चुके पेशेवरों के लिए प्रस्तावित स्किल बैंक उनके अनुभव और विशेषज्ञता का बेहतर उपयोग सुनिश्चित कर सकता है, ताकि 60 वर्ष की उम्र के बाद उन्हें अनुपयोगी न माना जाए। स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाकर अलग-अलग पीढ़ियों के बीच रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
बेशक, केरल भी इस नई व्यवस्था को लागू करने की चुनौतियों से अछूता नहीं है, क्योंकि बुजुर्गों के इलाज में विशेषज्ञ डॉक्टरों, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी और लगातार वित्तीय संसाधन जुटाना आसान नहीं होगा। अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल बनाना भी प्रशासन के लिए बड़ी परीक्षा साबित होगा। फिर भी, वह इस बात के लिए सराहना का पात्र है कि उसने बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्याओं को केवल दया या कल्याण का विषय नहीं, बल्कि शासन की मुख्य प्राथमिकता माना है।
यह प्रयोग केरल की सीमाओं से परे भी मायने रखता है। जैसे-जैसे दूसरे राज्यों में शहरीकरण बढ़ेगा, जन्म दर घटेगी और लोगों का पलायन बढ़ेगा, वैसे-वैसे वहां भी इसी तरह की सामाजिक चुनौतियां सामने आएंगी। उत्तर प्रदेश इसका एक उदाहरण है। फिलहाल, राज्य की आबादी अपेक्षाकृत युवा है, लेकिन अनुमान है कि 2011 में सात प्रतिशत रही बुजुर्ग आबादी 2036 तक बढ़कर 12 प्रतिशत हो जाएगी। इस चुनौती को देखते हुए राज्य सरकार ने आयुष्मान वयो वंदना कार्ड शुरू किया है। इसके तहत आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएम जय) के अंतर्गत 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों को हर साल पांच लाख रुपये तक का मुफ्त और कैशलेस स्वास्थ्य बीमा मिलता है। लेकिन, केवल स्वास्थ्य बीमा ही पर्याप्त नहीं है। बुजुर्गों की समस्याएं इससे कहीं व्यापक हैं और उनके समाधान के लिए हर स्तर पर समग्र नीति और ठोस प्रयास जरूरी होंगे।
वृद्ध लोगों का अकेलापन केवल केरल की समस्या नहीं, बल्कि भारत के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल है। अगर वरिष्ठ नागरिकों की गरिमा, उनकी आवाजाही की सुविधा, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य तथा समाज और अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को अनदेखा किया गया, तो विकास के साथ-साथ ऐसा समाज भी बनेगा, जहां आर्थिक समृद्धि तो होगी, लेकिन अकेलापन भी उतना ही गहरा होगा।
केरल की यह पहल इस सोच को मजबूत करती है कि विकास का मतलब केवल जीडीपी बढ़ना या विदेशों से आने वाला पैसा नहीं है। असली विकास तब है, जब उस पीढ़ी को भी सुरक्षित, सम्मानजनक और गरिमापूर्ण जीवन मिले, जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी है। यदि केरल अपनी इस पहल को प्रभावी ढंग से लागू करने में सफल रहता है, तो यह पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।
edit@amarujala.com