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भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते से खुले नए अवसर, अमल की चुनौती भी बरकरार
निस्संदेह, भारत और ब्रिटेन के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौते (सीईटीए) का लागू होना द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को एक नई ऊर्जा देगा। हालांकि, इसकी वास्तविक कामयाबी कई कारकों पर निर्भर करेगी।
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भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता
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अमर उजाला प्रिंट
ऐसे समय में, जब वैश्विक स्तर पर संरक्षणवाद और व्यापारिक अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं, तब भारत-ब्रिटेन के बीच बुधवार से लागू हुआ व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीईटीए) द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर तो है ही, मुक्त और नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था में भरोसा लौटाने की दिशा में एक अहम संकेत भी है। इसके तहत भारत से ब्रिटेन को निर्यात होने वाले करीब 99 फीसदी उत्पादों पर से सीमा शुल्क (टैरिफ) समाप्त करने के साथ ही, ‘सामाजिक सुरक्षा समझौता’ लागू होने से अस्थायी रूप से ब्रिटेन जाने वाले भारतीय पेशेवरों को पांच साल तक दोहरे सामाजिक सुरक्षा कर से भी राहत मिलेगी। यह भारत के आर्थिक व व्यापारिक इतिहास के लिए एक अहम समझौता है, जिससे टैरिफ एवं गैर-टैरिफ बाधाएं तो कम होंगी ही, किसानों, उद्योगों, महिला उद्यमियों तथा युवा पेशेवरों को नए अवसर भी मिलेंगे। इस समझौते से ब्रिटेन से आयातित उत्पादों पर चरणबद्ध तरीके से शुल्क कम होगा, जिससे कीमतों में कमी आएगी और भारतीय उपभोक्ताओं को फायदा होगा। जाहिर है, बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में इसके दूरगामी और रणनीतिक महत्व हैं, क्योंकि इससे कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण, इंजीनियरिंग सामान और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। इसके अलावा, इससे देश के छोटे उद्योगों और नए निर्माताओं को विदेश में अपनी पकड़ मजबूत करने का एक बड़ा अवसर मिलेगा। गौरतलब है कि ब्रेग्जिट के बाद ब्रिटेन के लिए एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत सबसे प्रमुख और बड़ा आर्थिक भागीदार बनकर उभरा है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। इस समझौते के तहत एक ओर जहां भारत को सेवा और विनिर्माण क्षेत्र में भारी लाभ मिलेगा, वहीं इसने अपने संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के हितों को पूर्णतः सुरक्षित रखा है। हालांकि, समझौते की वास्तविक सफलता इस पर निर्भर करेगी कि उद्योग और निर्यातक इसके प्रावधानों का कितना प्रभावी उपयोग कर पाते हैं। देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को ब्रिटेन के गुणवत्ता मानकों, तकनीकी नियमों और प्रमाणन प्रक्रियाओं के अनुरूप खुद को ढालने में सहायता देना जरूरी होगा, क्योंकि ऐसा न होने पर इस समझौते का लाभ मुख्य रूप से बड़ी कंपनियों तक सीमित रह सकता है। निस्संदेह, भारत और ब्रिटेन के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौते का लागू होना द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को एक नई ऊर्जा देगा। पर, इसकी सफलता का पैमाना यह भी होगा कि दोनों देशों में कितने उद्योग स्थापित हुए, कितने रोजगार सृजित हुए और कितने नवाचारों ने जन्म लिया। अगर इस अवसर का दूरदर्शिता, पारदर्शिता और दक्षता के साथ उपयोग किया गया, तो सीईटीए दोनों देशों के बीच 21वीं सदी की नई आर्थिक साझेदारी का आधार बन सकता है।
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