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पीओके: मानवाधिकारों के पैरोकार बनने का दावा, अपने ही लोगों का दमन करता पाकिस्तान दिखा रहा असली चेहरा

Fri, 17 Jul 2026 05:43 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 17 Jul 2026 05:43 AM IST
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सार
संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) द्वारा अपने ‘लॉन्ग मार्च’ को 21 जुलाई तक स्थगित करते हुए इस्लामाबाद को मांगें मानने का अंतिम अवसर देना दर्शाता है कि पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा बरती जा रही क्रूरता के बावजूद आंदोलनकारी अब भी संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद बनाए हुए हैं।
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पीओके में प्रदर्शन - फोटो : ANI

विस्तार

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में पिछले करीब छह सप्ताह से जारी जन-आंदोलन अब सिर्फ स्थानीय असंतोष का मामला नहीं रह गया, बल्कि वह पाकिस्तान के शासन तंत्र, आर्थिक नीतियों और लोकतांत्रिक भरोसे पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी लगा रहा है। संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) द्वारा अपने ‘लॉन्ग मार्च’ को 21 जुलाई तक स्थगित करते हुए इस्लामाबाद को मांगें मानने का अंतिम अवसर देना दर्शाता है कि पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा बरती जा रही क्रूरता के बावजूद आंदोलनकारी अब भी संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद बनाए हुए हैं। लेकिन, यह भी उतना ही स्पष्ट है कि अगर इस अवधि में कोई ठोस पहल नहीं हुई, तो पीओके के हालात विस्फोटक भी हो सकते हैं। उल्लेखनीय है कि इस आंदोलन की जड़ें केवल राजनीतिक असंतोष में नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही आर्थिक बदहाली और प्रशासनिक उपेक्षा में भी देखी जा सकती हैं। पीओके के लोग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग, बिजली की बढ़ती कीमतों, भारी करों, महंगाई और संसाधनों के असमान वितरण के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं। उनका आरोप है कि स्थानीय जनता को क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का पर्याप्त फायदा नहीं मिल पाता। यही नहीं, यहां रोजगार के अवसर सीमित हैं, बुनियादी सुविधाएं अपर्याप्त हैं और विकास की गति भी अपेक्षया धीमी ही है। इस आंदोलन का अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरना पाकिस्तानी हुकूमत को नागवार गुजर रहा है। शायद इसीलिए, वह जेएएसी के शीर्ष नेतृत्व को कथित रूप से खत्म करना चाह रहा है, ताकि आंदोलन को जड़ से खत्म किया जा सके। आंदोलनकारियों के इस आरोप से इस्लामाबाद का रवैया स्पष्ट हो जाता है कि उसने हफ्तों से क्षेत्र में खाने-पीने की चीजों और दवाओं की आपूर्ति को रोका हुआ है, जिससे मानवीय संकट पैदा हो गया है। यही वजह है कि आंदोलनकारी भारत से मानवीय मदद मांग रहे हैं। यह विडंबना ही है कि दशकों से वैश्विक मंचों पर कश्मीर के लोगों के मानवाधिकारों का पैरोकार बनने का दावा करने वाला पाकिस्तान अपने अधीन क्षेत्र के लोगों के अधिकारों को रौंदने पर तुला है। इतिहास बताता है कि जन आकांक्षाओं को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, पर स्थायी रूप से खत्म नहीं किया जा सकता। अगर पाकिस्तान अंदरूनी विद्रोह का दमन करता रहा, तो यह असंतोष गहरा ही होगा। जेएएसी द्वारा नियत समय-सीमा सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि पाकिस्तान के लोकतांत्रिक दावों, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक दूरदर्शिता की कठिन परीक्षा भी है।
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