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हसीना की वापसी का दांव: आत्मसमर्पण या राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक, बांग्लादेश में बढ़ी सियासी हलचल
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शेख हसीना
- फोटो :
एएनआई (फाइल)
विस्तार
शेख हसीना का दिसंबर में बांग्लादेश लौटने और आत्मसमर्पण करने का एलान एक बड़ा राजनीतिक दांव है, जिससे ढाका के अधिकारियों के पास कोई बेहतर विकल्प नहीं बचता। ऐसा करके वह एक भगोड़ी नेता की छवि से परे ऐसी नेता के रूप में सामने आती हैं, जो कानून और न्याय का सामना करने के लिए तैयार है। इससे उनके विरोधियों तथा सरकार पर राजनीतिक और नैतिक दबाव आ जाएगा और इससे ढाका का प्रत्यर्पण अभियान कमजोर पड़ जाएगा। साथ ही, उनका मुकदमा मौजूदा सरकार की वैधता की परीक्षा जैसा बन सकता है।यह कदम उनकी प्रतिबंधित पार्टी अवामी लीग में भी नई जान फूंक सकता है। इससे सरकार दुविधा में पड़ सकती है कि या तो वह उन्हें शहीद जैसी छवि हासिल करने का मौका दे, या फिर न्यायपालिका पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने के आरोप झेले। जब बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ का प्रभाव बढ़ रहा है, ऐसे में उनकी वापसी से देश में ज्यादा अशांति पैदा हो सकती है। पहले से ही मौजूद राजनीतिक ध्रुवीकरण गहराने की आशंका भी बनी हुई है।
रॉयटर्स के अनुसार, शेख हसीना का कहना है कि यह पूरी तरह उनका निजी फैसला है और इसमें किसी विदेशी सरकार की कोई भूमिका नहीं है। हालांकि, इसके पीछे कई कारण दिखाई देते हैं। पहला, बांग्लादेश की राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार को सत्ता में आए कई महीने हो चुके हैं। जुलाई-अगस्त 2024 के विद्रोह के बाद जो क्रांतिकारी उत्साह दिखाई दिया था, उसकी जगह अब कानून-व्यवस्था, महंगाई, रोजगार और आर्थिक सुधार जैसी रोजमर्रा की चुनौतियों ने ले ली है। दूसरा, लंबे समय तक देश से बाहर रहने के कारण उनकी पार्टी अवामी लीग के राजनीतिक रूप से खत्म होने का खतरा बढ़ गया है। शेख हसीना इसी मनोवैज्ञानिक गिरावट को पलटना चाहती हैं। तीसरा, ऐसा लगता है कि वह राजनीतिक नियंत्रण को फिर से अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रही हैं।
दरअसल, ऐसा करके वह एक साथ कई लोगों को संदेश दे रही हैं। अपने समर्थकों से वह कहती हैं ‘मैंने आपको छोड़ा नहीं है।’ बीएनपी सरकार के लिए उनकी चुनौती साफ है कि अगर आप मुझे जेल भेजते हैं या फांसी देते हैं, तो उसके नतीजों की जिम्मेदारी आपकी होगी। शेख हसीना की वापसी यह सवाल भी खड़ा करती है कि यदि राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो क्या सेना पूरी तरह तटस्थ रह पाएगी? वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी अपील कर रही हैं कि वे उनके खिलाफ होने वाली कानूनी कार्रवाई पर बारीकी से नजर रखें। हसीना ने खुद कहा है कि उन्हें जेल भेजा जा सकता है या उनकी हत्या हो सकती है। उनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं और यदि अदालत उन्हें दोषी ठहराती है, तो मौत की सजा तक की आशंका जताई जा रही है। बांग्लादेशी लोग भावुक होते हैं, पर यह भी सच है कि हसीना की जान लेने की कई कोशिशें भी हुईं। ऐसे में, यदि वह देश लौटती हैं, तो कई जगहों पर हिंसा और राजनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
रणनीतिक तौर पर, भारत के पास किसी भी तरह से इसमें शामिल न होने की वजहें हैं। लेकिन, इसमें कोई शक नहीं कि उनके जाने से रिश्ते सामान्य होने में मदद मिलेगी। भारत में उनकी मौजूदगी दोनों देशों के रिश्तों में एक बड़ी अड़चन रही है। हालांकि, नई दिल्ली ने बीएनपी सरकार के साथ कामकाजी रिश्ते फिर से मजबूत करने की कोशिश की है। भारत का मानना है कि ढाका में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहना जरूरी है। ऐसे में, यदि भारत को हसीना की वापसी में सक्रिय भूमिका निभाते हुए देखा गया, तो दोनों देशों के बीच बन रहे कूटनीतिक भरोसे को नुकसान पहुंच सकता है। भारत की प्राथमिकता यह होगी कि वह बीएनपी सरकार से बातचीत जारी रखे और कानूनी व कूटनीतिक माध्यमों से अवामी लीग के नेताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुपचाप कोशिश करे। भौगोलिक और रणनीतिक वास्तविकताएं दोनों सरकारों को वैचारिक मतभेदों के बावजूद व्यावहारिक सहयोग के लिए मजबूर करती हैं। हालांकि, भारत की यह रणनीति पूरी तरह सफल होगी, इसकी संभावना कम ही है।
मोदी सरकार पर 1971 के दौर जैसी कोई ऐतिहासिक जिम्मेदारी नहीं है, लेकिन उसके सामने अपनी अलग चुनौतियां हैं। भारत के लिए देश में अवैध रूप से रह रहे संदिग्ध लोगों, पूर्वोत्तर की सुरक्षा और बढ़ती भारत-विरोधी बयानबाजी चिंताजनक है। बांग्लादेश में पाकिस्तान के नागरिकों की बढ़ती आवाजाही और हाल के दिनों में चीन के साथ बुनियादी ढांचे तथा कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर हुई बातचीत ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को और बढ़ा दिया है। ऐसे में, दोनों देशों के रिश्ते धीरे-धीरे सामान्य हो सकते हैं, लेकिन शेख हसीना के कार्यकाल जैसा करीबी संबंध कायम होने की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि शेख हसीना की वापसी और उनकी पार्टी की जमीनी मौजूदगी, बांग्लादेश की पहले से जटिल राजनीतिक स्थिति को कितना और उलझाएगी। आने वाले समय में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अवामी लीग को कानूनी पाबंदियों के बावजूद फिर से राजनीतिक पहचान मिल सकती है। वहीं, हसीना के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, इसे लेकर बीएनपी सरकार पर वैश्विक दबाव भी बढ़ सकता है। साथ ही, न्यायपालिका राजनीतिक घटनाक्रम का केंद्र बन सकती है, क्योंकि हसीना के खिलाफ चलने वाली कार्रवाई केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक महत्व भी रखेगी।
कुल मिलाकर, शेख हसीना की इस घोषणा का उद्देश्य तुरंत सत्ता में लौटना नहीं लगता। शायद, वह अपनी पार्टी को बांग्लादेश की राजनीति से हाशिये पर जाने से बचाने और उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनकी वापसी उन्हें सार्वजनिक जीवन से विदा लेने से पहले एक आरोपी के रूप में स्थापित करेगी या फिर वह एक बार फिर बांग्लादेश की राजनीति को दो ध्रुवों में बांट देने वाला सबसे बड़ा चेहरा बन जाएंगी। इसका जवाब काफी हद तक बीएनपी सरकार, अदालतों और खुद शेख हसीना के आगे के कदमों पर निर्भर करेगा।