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निर्यात के दो परिदृश्य: मार्च में झटकों के बावजूद, भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूती कायम

अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Fri, 17 Apr 2026 06:40 AM IST
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Export Scenarios amid iran israel war west asia crisis Shocks in March India Economic Resilience Endures
मार्च में निर्यात पर पड़ा असर - फोटो : अमर उजाला
वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़ों में निर्यात के जो दो परिदृश्य दिखाई दिए, उनसे एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था का लचीलापन ही साबित होता है। दरअसल, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के चलते पिछले महीने, यानी मार्च में वस्तु निर्यात में पांच महीनों की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। मार्च, 2025 में यह आंकड़ा 42.05 अरब डॉलर था, जो पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण समुद्री मार्ग बाधित होने और क्षेत्रीय व्यापार में कमी आने से मार्च, 2026 में 38.92 अरब डॉलर पर पहुंच गया। आयात कम होने से स्वाभाविक ही व्यापार घाटे में कमी आई है, जो मार्च में नौ महीने के निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है।

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वित्त वर्ष 2025-26 के अंतिम महीने में देश के निर्यात को लगा झटका पहली नजर में चिंता पैदा करता है। यह चिंता तब और बढ़ जाती है, जब अप्रैल के परिदृश्य भी कुछ खास उज्ज्वल न दिख रहे हों। फिर भी, अगर पूरे वर्ष के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो तस्वीर कहीं अधिक संतुलित और सकारात्मक दिखाई देती है। पूरे वित्त वर्ष में निर्यात 0.93 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि वित्त वर्ष का अंतिम महीना 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इस्राइल और ईरान के मध्य युद्ध से फैली अस्थिरता की चपेट में रहा। अगर मार्च का असर न होता, तो निर्यात का आंकड़ा निस्संदेह बेहतर होता। हालांकि, पूरे वर्ष की मजबूत शुरुआत और बीच के महीनों में निरंतर वृद्धि ने अंतिम झटके को संभाल लिया।

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय निर्यातक अगर अपनी मजबूती प्रदर्शित कर रहे हैं, तो यह अर्थव्यवस्था के लिहाज से एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, यह देखते हुए कि व्यापार संकट का समय अभी खत्म नहीं हुआ, सतर्कता और दूरदर्शिता जरूरी है। बीती मार्च में खाड़ी देशों को होने वाले कुल निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में 58 फीसदी की कमी देखी गई। इसके बावजूद, दूसरी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में हम राहत में दिख रहे हैं, जो सुकून की बात है। पर, अर्थव्यवस्था में लचीलेपन की भी सीमा होती है। नहीं भूलना चाहिए कि वित्त वर्ष 2026 में रुपये का 9.9 फीसदी अवमूल्यन एशियाई मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन रहा। जरूरी है कि भारत अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की नीति पर बढ़ता रहे, ताकि पारंपरिक बाजारों पर निर्भरता कम की जा सके। अमेरिका से व्यापार समझौते पर बातचीत के लिए अगले हफ्ते से प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। जो मुक्त व्यापार समझौते हो चुके हैं, उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना भी समय की मांग है।
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