विश्लेषण: शब्द नहीं... भावनाएं चाहिए, ताकि भारत के चरित्र और संविधान की मूल संरचना पर न पड़े असर
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विस्तार
हाल ही में संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका से 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को हटाने के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देश की मांग करते हुए याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें दावा किया गया है कि यह संशोधन संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है, जिसकी व्याख्या 1973 में ऐतिहासिक केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में देश के शीर्ष न्यायालय द्वारा की गई थी। मूल ढांचे का सिद्धांत संविधान में संशोधन करने के लिए संसद की शक्ति पर एक सीमा निर्धारित करता है। इसमें कहा गया है कि संसद उन मूल्यों को परिवर्तित या विकृत या संशोधित नहीं कर सकती है, जिनसे इस ढांचे का निर्माण हुआ है। यह सिद्धांत इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि यह नागरिकों की स्वतंत्रता और उनके अधिकार और राज्य के प्राधिकार के बीच संतुलन स्थापित करता है, जिससे भारत में संविधानवादी विचारधारा की रक्षा होती है। हालांकि न्यायालय ने इन याचिकाओं पर सुनवाई अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वाकई संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध है।
उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल से ही भारत अपने चरित्र और भावना, दोनों में सहिष्णु और पंथनिरपेक्ष रहा है और अपने बहुरूपदर्शक सांस्कृतिक परिदृश्य की दृढ़ता से रक्षा करता रहा है। इसी प्रकार वर्षों से समाज में मौजूद विषमताओं के आलोक में समता आधारित सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए प्रयासरत है। हालांकि, उदार लोकतांत्रिक मानसिकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही है, जिसने एक जीवंत लोकतंत्र की नींव रखी है। यही कारण है कि संविधान में ऐसी सभी विचारधाराओं को शामिल किया गया है, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि राष्ट्र विविधता में एकता के अंतर्निहित सिद्धांत के साथ एकीकृत और अखंड बना रहे।
इस पृष्ठभूमि में, सबसे पहले मूल संविधान में निहित प्रावधानों पर एक नजर डालना अनिवार्य है। भारत ने उदारवाद के विचार पर आधारित संसदीय लोकतंत्र को अपनाया है और वितरणात्मक न्याय प्रदान करने के लिए समतावादी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। संविधान निर्माताओं ने इन विचारधाराओं को बहुत बुद्धिमत्ता से संतुलित किया था और इसी कारण उद्देशिका में न तो उदारवादी और न ही समाजवादी शब्द का स्पष्ट रूप से उपयोग किया था। उदार लोकतंत्र के विचार को भाग III (अनुच्छेद 14-32) में निहित मौलिक अधिकारों में संस्थागत रूप दिया गया है, जबकि समतावादी विचार की जड़ें भाग IV में राज्य नीति-निर्देशक तत्वों के रूप में रखी गई हैं, जो वितरणात्मक न्याय के सिद्धांत को स्थापित करती हैं। इसका अर्थ संसाधनों का समतामूलक वितरण (आवश्यकताओं के अनुसार) करना है और इसकी व्याख्या अनुच्छेद 38, 39 और 46 में की गई है।
संविधान की उद्देशिका ने एक राष्ट्र-राज्य के रूप में भारत के राजनीतिक-सांविधानिक अर्थ को स्पष्ट करते हुए संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य का उल्लेख किया, जबकि सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं के रूप में भारत में क्रमशः समाजवाद और पंथनिरपेक्षता के आयाम आनुवंशिक रूप में शामिल रहे। ऐसी सभी विचारधाराओं ने मूल ढांचे के निर्माण में योगदान दिया। हालांकि, राजनीतिक रूप से शासन प्रणाली में शामिल करने की दृष्टि से इसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29 ए की उपधारा (5) में शामिल किया गया था, जो राजनीतिक दलों को भारत के संविधान के प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा रखने के लिए बाध्य करता है। साथ ही, उन्हें समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों और भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए भी निर्देश देता है।
जहां तक ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को शामिल करने का सवाल है, यह कहना उचित होगा कि 42वां संशोधन राजनीति से प्रेरित था, जिस पर सांविधानिक आवरण दिया गया था। इसका उद्देश्य राज्य के प्राधिकार के दायरे और सीमा को व्यापक बनाने के लिए निर्देशक सिद्धांतों को प्राथमिकता देना था। आपातकाल में सरकार ने कुछ प्रावधानों का लाभ उठाया, जैसे कि 39 (बी) और (सी) में निहित प्रावधान क्रमशः भौतिक संसाधनों पर सामुदायिक स्वामित्व प्रदान कर और उत्पादन के साधनों के संकेंद्रण पर रोक लगा कर समाजवादी सिद्धांतों की पुष्टि करते हैं।
इसी प्रकार, अनुच्छेद 25-28 में धार्मिक सहिष्णुता, जिसे बैरी कॉस्मिन ने नरम पंथनिरपेक्षता कहा है, के विचार ने भारत के पंथनिरपेक्ष चरित्र की नींव रखी। इसलिए सरकार ने दावा किया कि इन शब्दों को जोड़कर ऐसे सिद्धांतों को मजबूत किया गया है। संशोधन को राजनीति से प्रेरित बताने का कारण मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ 1980 मामले में शीर्ष न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले से समझा जा सकता है। इस मामले में न्यायालय ने यह कहा कि मौलिक अधिकारों और निर्देशक तत्वों के बीच एक नाजुक संतुलन है, क्योंकि ये दोनों लोकतांत्रिक समाजवाद के सांविधानिक लक्ष्य को प्राप्त करने के उपकरण हैं। इसलिए, न्यायालय ने माना कि दोनों में से किसी को भी दूसरे पर प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। हालांकि, राजनीतिक प्रेरणा के बावजूद यह कहना सही है कि संशोधन ने मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया, क्योंकि भारत आरंभ से ही समाजवादी और पंथनिरपेक्ष था। संविधान की उद्देशिका से इन शब्दों को हटाने के हालिया विवाद पर लौटते हुए यह ध्यान रखना उचित है कि अगर इन्हें हटा दिया जाता है, तो भी भारत के चरित्र के कारण मूल संरचना प्रभावित नहीं होगी, जिसमें समाजवाद और पंथनिरपेक्षता के मूल्य शामिल हैं।
जहां तक उद्देशिका में संशोधन की बात है, तो उल्लेखनीय है कि संसद की शक्ति अभी भी सीमित है और यह संविधान की मूल संरचना के अधीन है। दूसरी ओर, उद्देशिका स्वयं इस संरचना का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसमें शामिल प्रतिबद्धताओं को बदला या संशोधित या विकृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि भले ही उद्देशिका अर्थपूर्ण शक्तियों का स्रोत नहीं है, लेकिन यह निर्माताओं के विचारों को समझने और भाग III और भाग IV के साथ मिलकर संविधान की त्रिमूर्ति के निर्माण में योगदान देने की कुंजी के रूप में कार्य करती है। इसका कानूनी महत्व अत्यधिक है, क्योंकि इसका उपयोग शीर्ष न्यायालय द्वारा संविधान के अस्पष्ट प्रावधानों की व्याख्या के लिए किया जाता है। याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय का फैसला तो देखने वाली बात होगी, पर इसमें संदेह नहीं कि भारत राजनीतिक रूप से उदारवादी और सामाजिक रूप से समतावादी रहा है। संविधान की मूल संरचना का सम्मान करते हुए समयानुकूल बदलावों से हर्ज नहीं होना चाहिए।