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तमिलनाडु में मामला उतना भी सीधा नहीं: विजय ने बनाया चतुष्कोणीय मुकाबला, जानें क्या है राज्य का मिजाज
आर राजगोपालन, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Pavan
Updated Thu, 02 Apr 2026 08:23 AM IST
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विधानसभा चुनाव 2026।
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विस्तार
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान चरम पर है, जहां 23 अप्रैल को मतदान होगा। इस दिन विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला राज्य के करीब छह करोड़ मतदाता करेंगे। लगता है कि इस बार 234 सदस्यों वाली विधानसभा चुनाव के नतीजे एक नया राजनीतिक आश्चर्य और मोड़ लेकर आएंगे। नए जनादेश के तहत सबसे बेहतरीन तालमेल वाले नए चेहरे ही आगामी चार मई को चुनकर अगले पांच वर्षों के लिए विधायक बनेंगे। पिछले 70 वर्षों से, बारी-बारी से या तो द्रमुक ने या फिर अन्नाद्रमुक ने ही राज्य पर राज किया है। अन्नाद्रमुक, विजय के टीवीके जैसी विपक्षी पार्टियों की रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही है, जबकि एमके स्टालिन की द्रमुक को सबसे ज्यादा सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है।तमिलनाडु में चुनाव का मुख्य मुद्दा नशीले पदार्थ हैं। द्रमुक को छोड़कर बाकी सभी राजनीतिक दल अवैध व विदेशी शराब की तस्करी, विश्वविद्यालयों में दुष्कर्म और कानून-व्यवस्था की बदहाल स्थिति जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हैं। सही सूचना के लिए जनता ने अब सोशल मीडिया और यूट्यूब पर लाइव रिपोर्टिंग देखना शुरू कर दिया है, जो राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ है।
द्रमुक और अन्नाद्रमुक की जड़ें तमिलनाडु के हर गांव में फैली हुई हैं, लेकिन भाजपा या कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के साथ ऐसा नहीं है। एक नई राजनीतिक पार्टी, टीवीके (तमिलगा वेत्री कड़गम-तमिल विजय पार्टी) का गठन हुआ है, जिसे तमिल सिनेमा के ‘सुपर हीरो’ जोसेफ विजय ने शुरू किया है। इसलिए पहली बार, तमिलनाडु में चतुष्कोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है।
विजय के राजनीति में आने से राज्य के ईसाई समुदाय को रणनीतिक बढ़ावा मिला है। अल्पसंख्यकों का वोट बैंक एक ‘दोधारी तलवार’ जैसा है। पहली बार अल्पसंख्यकों के वोट द्रमुक से हटकर टीवीके की तरफ जा सकते हैं। ऐसी उम्मीद है कि टीवीके कुल वोटों में से 20-25 प्रतिशत पर कब्जा कर सकती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि विजय के प्रशंसकों की संख्या बहुत ज्यादा है।
तमिलनाडु में भाजपा को मोदी-अमित शाह की जोड़ी से एक बड़ा बढ़ावा मिला है। द्रविड़ प्रदेश में राजग को अन्नाद्रमुक नेता एडप्पादी पलानीस्वामी से लाभ मिलेगा। जयललिता के जीवनकाल में अन्नाद्रमुक के चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर का जिक्र किया गया था। तमिलनाडु में कमल का चुनावी निशान भी काफी लोकप्रिय है। पिछली विधानसभा में भाजपा के चार विधायक थे।
तमिलनाडु में कांग्रेस एक परखी हुई और राष्ट्रवादी सोच वाली पार्टी है। द्रमुक गठबंधन में इसकी मौजूदगी, ज्यादा धर्मनिरपेक्ष वोट हासिल करने के लिए एक नैतिक संबल का काम करती है। दिलचस्प बात यह है कि विजय द्वारा टीवीके की शुरुआत किए जाने और करूर रैली में मची भगदड़ में 41 लोगों की मौत के बाद, राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के टीवीके के करीब आने की घटनाओं ने तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है। करूर घटना के बाद पिछले छह महीनों में, राहुल गांधी टीवीके के और करीब आने के लिए उत्सुक रहे हैं। लेकिन द्रमुक ने इसे पहले ही भांप लिया। सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से एमके स्टालिन ने कांग्रेस को द्रमुक के नए गठबंधन, धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन (एसपीए) से बाहर निकलने से रोक दिया।
सीमन ‘नाम तमिलर काची’ (एनटीके) के नेता हैं। एनटीके लंबे समय से लिट्टे नेता प्रभाकरन की समर्थक रही है और ‘तमिल ईलम’ के मुद्दे को उठाती रही है। इस चुनाव में वह अकेले ही लड़ रही है। उनके पास आठ प्रतिशत का निश्चित वोट बैंक है, जिसमें वे लोग शामिल हैं, जो ‘तमिल राष्ट्रवाद’ का समर्थन करते हैं।
द्रमुक की चुनावी शैली मुख्य रूप से भाजपा-विरोधी बातों और मोदी व शाह पर की जाने वाली टिप्पणियों पर केंद्रित रहती है। वे ‘सनातन धर्म’ के खिलाफ नफरत भरे भाषण देते हैं और इसकी तुलना डेंगू व कोरोना जैसी बीमारियों से करते हैं। एमके स्टालिन की रणनीति मुख्य रूप से अल्पसंख्यक समुदायों के वोटों को अपनी ओर आकर्षित करने पर आधारित है। द्रमुक को इस बात का अंदाजा है कि विजय ईसाई वोट अपने पाले में कर लेंगे। मुस्लिम वोटर भी विजय की तरफ झुक सकते हैं। इसके अलावा, कुछ बाहरी कारक भी हैं, जैसे कि चुनाव के लिए पैसे का इंतजाम और देर रात मतदाताओं के बीच नकदी बांटना। ऐसा पहली बार हो रहा है कि ‘लॉटरी किंग’ मार्टिन सभी पार्टियों को फंड दे रहे हैं।
चुनावी घोषणापत्र अब मजाक का विषय बन गए हैं-फ्रिज, लैपटॉप, ग्राइंडर, व्हीलचेयर, और छात्रों व किशोरों के लिए मुफ्त वाईफाई इंटरनेट की सुविधा देने जैसे वादे किए जा रहे हैं। विजय तो मुफ्त की चीजें देने के मामले में और भी आगे निकल गए हैं। इसके अलावा, अन्नाद्रमुक से निकाले गए नेताओं पर द्रमुक दांव लगा रही है और उन्हें उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा है।
पिछले चुनावों में, जब मुकाबला मुख्य रूप से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच था, तब जीत हासिल करने में ईसाई और मुस्लिम समुदायों के समर्थन ने अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन टीवीके के चुनावी मैदान में प्रवेश और जोसेफ विजय के ‘ईसाई’ होने की पहचान की वजह से, अल्पसंख्यक समुदाय के वोटों का एक हिस्सा उनकी तरफ जाने की उम्मीद है। चूंकि, अल्पसंख्यक समुदाय के लोग मुख्य रूप से द्रमुक और टीवीके में से किसी एक को चुनने वाले हैं, ऐसे में हिंदू वोट (जिनमें कोनार, मुक्कुलाथोर, मुथराईयर और अनुसूचित जातियां शामिल हैं) निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
सभी पार्टियों के चुनावी अभियानों और तमिलनाडु के मिजाज को देखते हुए कहा जा सकता है कि राज्य में मुकाबला कड़ा होगा। नशीले पदार्थ और अवैध शराब मुख्य चर्चा का विषय होंगे। अगले दो हफ्तों तक जोशीले और भड़काऊ भाषण, नुक्कड़ सभाएं और रोड शो देखने को मिलेंगे। चतुष्कोणीय मुकाबले में जीत का अंतर एक हजार मतों से भी कम रहने की संभावना है। कई जनमत सर्वेक्षण मिश्रित नतीजों का अनुमान लगा रहे हैं। तमिलनाडु में सत्ता-विरोधी लहर के चलते, कुछ लोग ‘त्रिशंकु विधानसभा’ की भी भविष्यवाणी कर रहे हैं। हालांकि, तमिलनाडु में स्वतंत्र और हिंसा-मुक्त चुनाव देखने को मिलेगा, जो लोकतंत्र की खासियत है। -edit@amarujala.com