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क्या ऐसा ही होगा नया बंगाल? कानून, संस्थाएं और ममता बनर्जी की 'हल्ला बोल' राजनीति
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: बिमल राय
Updated Thu, 15 Jan 2026 06:59 AM IST
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ईडी की छापेमारी के खिलाफ टीएमसी की विरोध रैली में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
कोलकाता हाईकोर्ट ने बुधवार को आई पैक पर ईडी की छापेमारी के मामले में तृणमूल कांग्रेस की याचिका खारिज कर दी। पार्टी ने आरोप लगाया था कि आठ जनवरी को ईडी ने आई पैक के दफ्तर पर छापेमारी के दौरान कुछ कतागजात जब्त कर लिए थे, जबकि सुनवाई में जांच एजेंसी ने इससे इन्कार किया। अब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी।
दरअसल हाल ही में, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रौद्र अवतार सामने आया है। एसआईआर के जरिये घुसपैठियों को बाहर निकालने की प्रक्रिया और सीबीआई-ईडी के फिर से सक्रिय होने से उनका गुस्सा चरम पर है। विधानसभा चुनाव में बस कुछ महीने बचे हैं और उनके विद्रोह की लपटों में मान, मर्यादा, नैतिकता, कानून सब कुछ झुलस रहे हैं। आई पैक पर आठ जनवरी के ईडी के छापे से दीदी ने जैसे आपा ही खो दिया। वह सड़कों पर हैं, उनके नेता भी दिल्ली ‘हिला’ रहे हैं। नया नारा है ‘जोतोई कोरो हमला, आबार जीतबे बांग्ला।’
नौ जनवरी को कलकत्ता हाईकोर्ट में तृणमूल से जुड़े वकीलों व कार्यकर्ताओं के हंगामे की वजह से जस्टिस शुभ्रा घोष ईडी की याचिका पर सुनवाई टालने पर मजबूर हो गईं। इधर, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने भी तुरंत मामले पर सुनवाई करने से इन्कार कर किया। परिणामस्वरूप ईडी को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा है। हम यह तो नहीं कह सकते कि जज भी डर गए हैं, पर सोचिए, मुख्यमंत्री से जुड़े या किसी भी दूसरे संवेदनशील और गंभीर मामलों में यही ‘रणनीति’ अपनाई जाए, तो कौन जज सुनवाई करेगा और कैसे न्याय मिल पाएगा?
बंगाल में सरकारी कर्मचारी बकाया डीए मांग रहे हैं। नौकरियां जाने से युवा सड़कों पर हैं। क्या देश व राज्य के मनीषियों ने ऐसे बंगाल की कल्पना की थी? किसी ने सोचा था कि सीमा पार कर आने वाले लोगों को धीरे-धीरे यहां के संसाधनों पर कब्जा करने की छूट मिल जाएगी और मूल निवासी खुद को दोयम दर्जे का समझने लगेंगे? भला हो एसआईआर का, जिसने बता दिया कि कहां-कहां घुसपैठियों को बंगाल में बस्तियां बसाने की जगह दी गई थी। वे झुग्गियां ही सत्ताधारियों की ‘राष्ट्रविरोधी’ करतूत का सबसे पुख्ता सबूत हैं।
शायद ही किसी ने सोचा होगा कि उद्योग लगाने से लेकर मारवाड़ियों, लाल गमछा बांधे दिन-रात पसीना बहाने और चिमनियों को जिंदा रखने वाले भोजपुरियों, या पीढ़ियों से बसे प्रवासी हिंदी भाषी अचानक बाहरी हो जाएंगे? महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित राज्य कहे जाने वाले बंगाल में एक के बाद एक हिंसक वारदातों का निदान या बचाव का एकमात्र उपाय क्या यही बताया जाएगा कि लड़कियां रात आठ बजे के बाद घर से बाहर न निकलें? किसी ने सोचा था कि झूठ-फरेब, गाली-गलौच, लड़ाने-भिड़ाने, लाठी-गोली, हिंसा-आगजनी राज्य का ‘राजनीतिक दर्शन’ बन जाएगा? ममता बनर्जी की हल्ला बोल राजनीति की झलक देश की जनता तबसे देख रही है, जब वे विपक्ष में थीं। मई 2011 में सत्ता संभालने के कुछ महीने बाद उन्होंने भवानीपुर पुलिस स्टेशन पर धावा बोलकर दंगा-आगजनी के आरोपी दो तृणमूल कार्यकर्ताओं को छुड़ा लिया था। यही पहला संदेश था पुलिस को, कि हमारे कार्यकताओं व हितों की रक्षा आपका पहला दायित्व है।
कोयला घोटाले में सीबीआई ने नवंबर, 2020 में प्राथमिकी दर्ज की, और मनी लॉन्ड्रिंग से तार जुड़ने पर ईडी ने जांच शुरू ही। पर तृणमूल इस बात से ज्यादा नाराज है कि इतने समय तक निष्क्रिय रहने के बाद ईडी ने विधानसभा चुनाव नजदीक देखकर भाजपा के इशारे पर यह कार्रवाई की है। हैरत की बात है कि खबर पाकर मुख्यमंत्री खुद आई पैक के मालिक प्रतीक जैन प्रतीक के घर गईं और वहां से फाइलें, मोबाइल और लैपटॉप लेकर चलती बनीं। उनके साथ सादे पोशाक में आई स्थानीय पुलिस ने ईडी वालों के हाथ से कागजात छीन लिए। अगर केंद्रीय बलों ने संयम से काम नहीं लिया होता, तो बड़ी अनहोनी हो सकती थी और तथाकथित तृणमूल ‘सिपाहियों’ के हाथों ईडी वालों का वही हश्र होता, जो संदेशखाली के कुख्यात शाहजहां के घर पर छापे के दौरान हुआ था।
बंगाल के 34 वर्षों के वाम शासन में इस राजनीतिक व्याधि के हल्के लक्षण दिखते थे। पुलिस का दुरुपयोग, सबसे पहले अपने कैडरों का हित, विपक्षियों का उत्पीड़न तब भी था, पर भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था के मामले में आज जैसी अराजकता व तुष्टिकरण की हद नहीं दिखी थी। इन बीमारियों का संस्थागत रूप लेना दीदी के खिलाफ जा रहा है। व्यवहार में राजनीतिक गरिमा का इतना अभाव तब नहीं था। केंद्र से लड़ते हुए भी ज्योति बसु और बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मुख्यमंत्री पद की मर्यादा पर आंच नहीं आने दी। कानून व व्यवस्था के मोर्चे पर विफलता ने ममता सरकार को काफी बदनाम किया है।
बहरहाल, आई पैक मामले में बंगाल सरकार ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ केस किया है। दीदी का दल सड़कों पर रहेगा और अदालती प्रक्रिया चलती रहेगी। न्याय होगा, पर इस ड्रामे से क्या कम नुकसान हुआ है?