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Faridabad News: जल समझौते के बीच जिले में बढ़ी पानी की चिंता, भूजल पर और दबाव पड़ने की आशंका
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25 लाख की आबादी वाले औद्योगिक शहर में रोज 120 एमएलडी पानी की कमी का अनुमान
22 रैनीवेल और 160 बोरवेल पर टिकी है पेयजल व्यवस्था
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। करीब 25 लाख की आबादी वाले औद्योगिक शहर फरीदाबाद में पानी का संकट हर साल गहराता जा रहा है। शहर को रोजाना करीब 450 मिलियन लीटर (एमएलडी) पानी की जरूरत बताई जाती है, जबकि उपलब्ध आपूर्ति करीब 330 एमएलडी के आसपास मानी जाती है यानी प्रतिदिन करीब 120 एमएलडी पानी की कमी का अनुमान है। ऐसे में हरियाणा और राजस्थान के बीच हथनीकुंड बैराज से अतिरिक्त मानसूनी जल राजस्थान भेजने के समझौते ने शहर में नई चिंता पैदा कर दी है। सरकार का दावा है कि इससे हरियाणा की जलापूर्ति प्रभावित नहीं होगी लेकिन जल विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में यमुना के प्रवाह पर असर पड़ा तो फरीदाबाद की रैनीवेल आधारित पेयजल व्यवस्था और भूजल पुनर्भरण दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
फरीदाबाद लंबे समय से केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की ओवर-एक्सप्लॉयटेड यानी अत्यधिक भूजल दोहन वाली श्रेणी में शामिल है। शहर के अधिकांश हिस्सों में भूजल स्तर करीब 40 मीटर से अधिक नीचे पहुंच चुका है, जबकि अरावली से सटे गांवों और कॉलोनियों में कई जगह पानी 200 फीट से भी अधिक गहराई पर मिल रहा है। इसके बावजूद शहर में भूजल का दोहन लगातार जारी है और उसे दोबारा भरने की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है।
शहर की पेयजल व्यवस्था मुख्य रूप से यमुना किनारे बने 22 रैनीवेल और करीब 160 सरकारी बोरवेल पर टिकी है। इन्हीं के जरिये सेक्टरों, कॉलोनियों और गांवों तक पानी पहुंचाया जाता है। गर्मियों में मांग बढ़ते ही कई इलाकों में जलापूर्ति प्रभावित होने लगती है और नगर निगम व जनस्वास्थ्य विभाग को टैंकरों के जरिये पानी पहुंचाना पड़ता है। ग्रेटर फरीदाबाद की कई सोसाइटियों में भी लोग नियमित आपूर्ति पूरी नहीं होने पर निजी टैंकरों पर निर्भर रहते हैं।
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बारिश होती है, लेकिन जमीन तक नहीं पहुंचता पानी
विशेषज्ञों का कहना है कि फरीदाबाद में जल संकट की सबसे बड़ी वजह केवल पानी की कमी नहीं बल्कि वर्षा जल का पर्याप्त संरक्षण न होना है। हर साल मानसून में करोड़ों लीटर पानी शहर की सड़कों, नालों और ड्रेनों से होकर यमुना में चला जाता है। जिस पानी से भूजल स्तर सुधर सकता है, वह जमीन में उतरने के बजाय बहकर निकल जाता है। शहर में सरकारी भवनों, संस्थानों और निजी परिसरों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था बनाई गई है लेकिन कई स्थानों पर इनके रखरखाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ग्रेटर फरीदाबाद की 50 से अधिक बहुमंजिला सोसाइटियों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग व्यवस्था पूरी क्षमता से काम नहीं करने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। इसका सीधा असर भूजल पुनर्भरण पर पड़ रहा है। वहीं प्रशासन की तरफ से 230 वाटर हार्वेस्टिंग को ठीक करवाने का काम करवाया जा रहा है लेकिन समय पर काम शुरू न होने के कारण इस साल इस परियोजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
बोतलबंद पानी और टैंकरों पर बढ़ती निर्भरता
शहर के कई इलाकों में भूजल की गुणवत्ता भी चिंता का विषय बनती जा रही है। एनआईटी, डबुआ, पर्वतीय कॉलोनी सहित कई क्षेत्रों में लोग पीने के लिए आरओ या बोतलबंद पानी खरीदने को मजबूर हैं। गर्मियों में निजी पानी के टैंकरों की मांग बढ़ जाती है जिससे परिवारों का मासिक खर्च भी बढ़ता है। नई विकसित आवासीय सोसाइटियों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है जहां आबादी तेजी से बढ़ी है लेकिन जलापूर्ति का ढांचा उसी अनुपात में मजबूत नहीं हो पाया।
राजस्थान के चूरू, सीकर और झुंझुनू तक पानी पहुंचाने की है योजना
हाल ही में हरियाणा और राजस्थान के बीच हुए समझौते के तहत हथनीकुंड बैराज से मानसून के दौरान उपलब्ध अतिरिक्त पानी को पाइप लाइन के जरिये राजस्थान के चूरू, सीकर और झुंझुनू जिलों तक पहुंचाने की योजना है। सरकार का कहना है कि इससे हरियाणा के हिस्से के पानी में कोई कटौती नहीं होगी क्योंकि केवल अतिरिक्त मानसूनी जल का उपयोग किया जाएगा।
फरीदाबाद पहले ही गंभीर जल संकट झेल रहा है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इस समझौते का शहर की पेयजल आपूर्ति और भूजल पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
- बलजीत कौशिक, जिलाध्यक्ष, कांग्रेस
यदि सरकार कह रही है कि केवल अतिरिक्त पानी भेजा जाएगा तो इसका तकनीकी अध्ययन और पूरा डेटा सार्वजनिक किया जाए ताकि लोगों की आशंकाएं दूर हो सकें।
- रविंद्र फौजदार, जिलाध्यक्ष, आप
फरीदाबाद जैसे औद्योगिक शहर के लिए दीर्घकालिक जल सुरक्षा नीति तैयार की जानी चाहिए। किसी भी नई जल परियोजना से पहले स्थानीय प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
- प्रदीप चौधरी, जिलाध्यक्ष, जजपा
गर्मी के मौसम में नगर निगम कार्यालय पर कई बार पानी को लेकर प्रदर्शन किया गया है, रोजाना आपूर्ति पूरी करने के लिए पहले काम किया जाना चाहिए।
- सुमित गौड़, प्रदेश सचिव, कांग्रेस
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22 रैनीवेल और 160 बोरवेल पर टिकी है पेयजल व्यवस्था
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। करीब 25 लाख की आबादी वाले औद्योगिक शहर फरीदाबाद में पानी का संकट हर साल गहराता जा रहा है। शहर को रोजाना करीब 450 मिलियन लीटर (एमएलडी) पानी की जरूरत बताई जाती है, जबकि उपलब्ध आपूर्ति करीब 330 एमएलडी के आसपास मानी जाती है यानी प्रतिदिन करीब 120 एमएलडी पानी की कमी का अनुमान है। ऐसे में हरियाणा और राजस्थान के बीच हथनीकुंड बैराज से अतिरिक्त मानसूनी जल राजस्थान भेजने के समझौते ने शहर में नई चिंता पैदा कर दी है। सरकार का दावा है कि इससे हरियाणा की जलापूर्ति प्रभावित नहीं होगी लेकिन जल विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में यमुना के प्रवाह पर असर पड़ा तो फरीदाबाद की रैनीवेल आधारित पेयजल व्यवस्था और भूजल पुनर्भरण दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
फरीदाबाद लंबे समय से केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की ओवर-एक्सप्लॉयटेड यानी अत्यधिक भूजल दोहन वाली श्रेणी में शामिल है। शहर के अधिकांश हिस्सों में भूजल स्तर करीब 40 मीटर से अधिक नीचे पहुंच चुका है, जबकि अरावली से सटे गांवों और कॉलोनियों में कई जगह पानी 200 फीट से भी अधिक गहराई पर मिल रहा है। इसके बावजूद शहर में भूजल का दोहन लगातार जारी है और उसे दोबारा भरने की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है।
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शहर की पेयजल व्यवस्था मुख्य रूप से यमुना किनारे बने 22 रैनीवेल और करीब 160 सरकारी बोरवेल पर टिकी है। इन्हीं के जरिये सेक्टरों, कॉलोनियों और गांवों तक पानी पहुंचाया जाता है। गर्मियों में मांग बढ़ते ही कई इलाकों में जलापूर्ति प्रभावित होने लगती है और नगर निगम व जनस्वास्थ्य विभाग को टैंकरों के जरिये पानी पहुंचाना पड़ता है। ग्रेटर फरीदाबाद की कई सोसाइटियों में भी लोग नियमित आपूर्ति पूरी नहीं होने पर निजी टैंकरों पर निर्भर रहते हैं।
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बारिश होती है, लेकिन जमीन तक नहीं पहुंचता पानी
विशेषज्ञों का कहना है कि फरीदाबाद में जल संकट की सबसे बड़ी वजह केवल पानी की कमी नहीं बल्कि वर्षा जल का पर्याप्त संरक्षण न होना है। हर साल मानसून में करोड़ों लीटर पानी शहर की सड़कों, नालों और ड्रेनों से होकर यमुना में चला जाता है। जिस पानी से भूजल स्तर सुधर सकता है, वह जमीन में उतरने के बजाय बहकर निकल जाता है। शहर में सरकारी भवनों, संस्थानों और निजी परिसरों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था बनाई गई है लेकिन कई स्थानों पर इनके रखरखाव को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ग्रेटर फरीदाबाद की 50 से अधिक बहुमंजिला सोसाइटियों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग व्यवस्था पूरी क्षमता से काम नहीं करने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। इसका सीधा असर भूजल पुनर्भरण पर पड़ रहा है। वहीं प्रशासन की तरफ से 230 वाटर हार्वेस्टिंग को ठीक करवाने का काम करवाया जा रहा है लेकिन समय पर काम शुरू न होने के कारण इस साल इस परियोजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
बोतलबंद पानी और टैंकरों पर बढ़ती निर्भरता
शहर के कई इलाकों में भूजल की गुणवत्ता भी चिंता का विषय बनती जा रही है। एनआईटी, डबुआ, पर्वतीय कॉलोनी सहित कई क्षेत्रों में लोग पीने के लिए आरओ या बोतलबंद पानी खरीदने को मजबूर हैं। गर्मियों में निजी पानी के टैंकरों की मांग बढ़ जाती है जिससे परिवारों का मासिक खर्च भी बढ़ता है। नई विकसित आवासीय सोसाइटियों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है जहां आबादी तेजी से बढ़ी है लेकिन जलापूर्ति का ढांचा उसी अनुपात में मजबूत नहीं हो पाया।
राजस्थान के चूरू, सीकर और झुंझुनू तक पानी पहुंचाने की है योजना
हाल ही में हरियाणा और राजस्थान के बीच हुए समझौते के तहत हथनीकुंड बैराज से मानसून के दौरान उपलब्ध अतिरिक्त पानी को पाइप लाइन के जरिये राजस्थान के चूरू, सीकर और झुंझुनू जिलों तक पहुंचाने की योजना है। सरकार का कहना है कि इससे हरियाणा के हिस्से के पानी में कोई कटौती नहीं होगी क्योंकि केवल अतिरिक्त मानसूनी जल का उपयोग किया जाएगा।
फरीदाबाद पहले ही गंभीर जल संकट झेल रहा है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इस समझौते का शहर की पेयजल आपूर्ति और भूजल पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
- बलजीत कौशिक, जिलाध्यक्ष, कांग्रेस
यदि सरकार कह रही है कि केवल अतिरिक्त पानी भेजा जाएगा तो इसका तकनीकी अध्ययन और पूरा डेटा सार्वजनिक किया जाए ताकि लोगों की आशंकाएं दूर हो सकें।
- रविंद्र फौजदार, जिलाध्यक्ष, आप
फरीदाबाद जैसे औद्योगिक शहर के लिए दीर्घकालिक जल सुरक्षा नीति तैयार की जानी चाहिए। किसी भी नई जल परियोजना से पहले स्थानीय प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
- प्रदीप चौधरी, जिलाध्यक्ष, जजपा
गर्मी के मौसम में नगर निगम कार्यालय पर कई बार पानी को लेकर प्रदर्शन किया गया है, रोजाना आपूर्ति पूरी करने के लिए पहले काम किया जाना चाहिए।
- सुमित गौड़, प्रदेश सचिव, कांग्रेस