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Ghaziabad News: बच्चों की चुप्पी को न करें नजरअंदाज, हो सकता है ऑटिज्म
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गाजियाबाद। बच्चों का देर से प्रतिक्रिया देना, बात समझने में कठिनाई होना या अन्य बच्चों से घुलने-मिलने में परेशानी को अक्सर सामान्य व्यवहार मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार ये ऑटिज्म (स्वलीनता) के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।
ऑटिज्म के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। स्वास्थ्य विभाग ने बढ़ते मामलों को देखते हुए अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी है।
न्यूरोफिजिशियन डॉ. राकेश कुमार के अनुसार, ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक आजीवन तंत्रिका संबंधी स्थिति है। यह व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार, संवाद क्षमता और सोचने के तरीके को प्रभावित करती है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि दुनिया को देखने और समझने का एक अलग तरीका है। इसके लक्षण आमतौर पर बच्चे के जीवन के पहले दो-तीन वर्षों में दिखाई देने लगते हैं।
संयुक्त जिला अस्पताल में 24 बच्चों का चल रहा उपचार : संयुक्त जिला अस्पताल के अर्ली इंटरवेंशन सेंटर में वर्तमान में 24 बच्चों का उपचार किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका पूर्ण इलाज संभव नहीं है, लेकिन डेढ़ से दो वर्ष की उम्र में ही थेरेपी शुरू कर दी जाए तो एक-दो साल में बच्चे में काफी सुधार संभव है।
मोबाइल और टीवी से बढ़ सकती है समस्या : संयुक्त जिला अस्पताल के अर्ली इंटरवेंशन सेंटर की प्रभारी और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आम्रपाली सिन्हा के अनुसार, इस स्थिति में बच्चे का मानसिक विकास प्रभावित होता है।
कई बार यह समस्या गर्भावस्था के दौरान ही उत्पन्न हो जाती है। कई अभिभावक बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल या टीवी का सहारा लेते हैं, जो उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। ऐसे बच्चों को व्यवहार, वाणी (स्पीच), विशेष शिक्षा और दैनिक गतिविधियों से जुड़ी विभिन्न थेरेपी दी जाती हैं।
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ऑटिज्म के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर वर्ष दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। स्वास्थ्य विभाग ने बढ़ते मामलों को देखते हुए अभिभावकों को सतर्क रहने की सलाह दी है।
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न्यूरोफिजिशियन डॉ. राकेश कुमार के अनुसार, ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक आजीवन तंत्रिका संबंधी स्थिति है। यह व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार, संवाद क्षमता और सोचने के तरीके को प्रभावित करती है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि दुनिया को देखने और समझने का एक अलग तरीका है। इसके लक्षण आमतौर पर बच्चे के जीवन के पहले दो-तीन वर्षों में दिखाई देने लगते हैं।
संयुक्त जिला अस्पताल में 24 बच्चों का चल रहा उपचार : संयुक्त जिला अस्पताल के अर्ली इंटरवेंशन सेंटर में वर्तमान में 24 बच्चों का उपचार किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका पूर्ण इलाज संभव नहीं है, लेकिन डेढ़ से दो वर्ष की उम्र में ही थेरेपी शुरू कर दी जाए तो एक-दो साल में बच्चे में काफी सुधार संभव है।
मोबाइल और टीवी से बढ़ सकती है समस्या : संयुक्त जिला अस्पताल के अर्ली इंटरवेंशन सेंटर की प्रभारी और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आम्रपाली सिन्हा के अनुसार, इस स्थिति में बच्चे का मानसिक विकास प्रभावित होता है।
कई बार यह समस्या गर्भावस्था के दौरान ही उत्पन्न हो जाती है। कई अभिभावक बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल या टीवी का सहारा लेते हैं, जो उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। ऐसे बच्चों को व्यवहार, वाणी (स्पीच), विशेष शिक्षा और दैनिक गतिविधियों से जुड़ी विभिन्न थेरेपी दी जाती हैं।